1
गर खुदा खुद से जुदाई दे
कोई क्यों अपना दिखाई दे
काश मिल जाये कोई अपना
रंजो-गम से जो रिहाई दे
जब न काम आई दुआ ही तो
कोई फिर क्योंकर दवाई दे
ख्वाब बेगाने न दे मौला
नींद तू बेशक पराई दे
तू न हातिम या फरिश्ता है
कोई क्यों तुझको भलाई दे
डूबने को हो सफीना जब
क्यों किनारा तब दिखाई दे
आँख को बीनाई दे ऐसी
हर तरफ बस तू दिखाई दे
साथ मेरे तू अकेला हो
अपनी ही बस आश्नाई दे
फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन
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Saturday, December 25, 2010
Sunday, December 19, 2010
देख लो तुम मुझे सजा देकर- गज़ल
5 [म.ऋ]
आज कुछ कर गुजरने वाला हूँ
बन के खुशबू बिखरने वाला हूँ
तोड़ दो कसमें, दो भुला वादे
मैं तो खुद भी मुकरने वाला हूँ
टूटकर बिखरा हूं इस तरह यारो
अब कहाँ मैं संवरने वाला हूँ
जिन्दगी कर दे हसरतें पूरी
खुदकुशी अब मैं करने वाला हूँ
देख लो तुम मुझे सजा देकर
मै भला कब सुधरने वाला हूँ
फ़ाइलातुन,मफ़ाइलुन,फ़ेलुन
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आज कुछ कर गुजरने वाला हूँ
बन के खुशबू बिखरने वाला हूँ
तोड़ दो कसमें, दो भुला वादे
मैं तो खुद भी मुकरने वाला हूँ
टूटकर बिखरा हूं इस तरह यारो
अब कहाँ मैं संवरने वाला हूँ
जिन्दगी कर दे हसरतें पूरी
खुदकुशी अब मैं करने वाला हूँ
देख लो तुम मुझे सजा देकर
मै भला कब सुधरने वाला हूँ
फ़ाइलातुन,मफ़ाइलुन,फ़ेलुन
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Wednesday, December 1, 2010
गुल गुलामी करे है मौसम की- दो शे‘र
सुनते हैं दिल में प्यार रहता है
फ़िर भी दिल बेकरार रहता हैगुल गुलामी करे है मौसम की
मस्त हर वक्त खार रहता है
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Monday, November 29, 2010
एक फुट्कर शेर
सुनते हैं दिल में प्यार रहता है
फ़िर भी दिल बेकरार रहता हैगुल गुलामी करे है मौसम की
मस्त हर वक्त खार रहता है
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Tuesday, September 21, 2010
बेवफ़ाई थी उसकी फ़ितरत में - gazal
जिन्दगी कब है मो‘तबर बाबा
ये तो है आरज़ी सफ़र बाबा
बेवफ़ाई थी उसकी फ़ितरत में
जान दी हमने जानकर बाबा
मेरे अश्कों मेरे नालों का
आप पर भी हुआ असर बाबा
जिसके साये में प्यार पलता है
काट देंगे वही शजर बाबा
खुशियां घटती नहीं हैं बँटने से
दर्द बढ़ता है फ़ैलकर बाबा
`श्याम’सच्चा है,सीधा सादा है
इसको आता नहीं हुनर बाबा
dbgm68
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Thursday, September 9, 2010
सबको खूब खला था वो- गज़ल
सबको खूब खला था वो
मानुष एक भला था वो
काटा जितनी बार गया
उतनी बार फला था वो
रीझ गई वृषभानुलली
आखिर नन्दलला था वो
जिसने जैसा ढाला था
वैसा ठीक ढ़्ला था वो
मन्जिल खुद ही आ पहुंची
गिर-गिर कर संभला था वो
सबके गम लेकर भागा
सबके गम लेकर भागा
कह्ते सब पगला था वो
याद करे है अब भी ‘श्याम’
यू इक बार मिला था वो71/d b gm
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Thursday, August 26, 2010
दुनिया-भर के ग़म थे/ और अकेले हम थे-gazal
दुनिया-भर के ग़म थे
और अकेले हम थे
साथ न कैसे देते
ग़म भी आखिर ग़म थे
टीस बहुत थी सुर में
बस स्वर ही मद्घम थे
खुशियाँ दूर सदा ही
ग़म मेरे हमदम थे
सपने भंग हुए क्या
दिल दरहम-बरहम थे
आँखें तो गीली थीं
सूखे मन-मौसम थे
'श्याम’ सँवरते कैसे
सब किस्मत के खम थे
७२ dbg
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Thursday, August 19, 2010
काश मिल जाये कोई अपना -gazal
1
गर खुदा खुद से जुदाई दे
कोई क्यों अपना दिखाई दे
काश मिल जाये कोई अपना
रंजो-गम से जो रिहाई दे
जब न काम आई दुआ ही तो
कोई फिर क्योंकर दवाई दे
ख्वाब बेगाने न दे मौला
नींद तू बेशक पराई दे
तू न हातिम या फरिश्ता है
कोई क्यों तुझको भलाई दे
डूबने को हो सफीना जब
क्यों किनारा तब दिखाई दे
आँख को बीनाई दे ऐसी
हर तरफ बस तू दिखाई दे
साथ मेरे तू अकेला हो
अपनी ही बस आश्नाई दे
फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन फ़ा
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Tuesday, August 10, 2010
मैं गुनहगार न होता तो फरिश्ता होता-गज़ल
ख्वाब हर हाल में है यार भला सा होता
मैं गुनहगार न होता तो फरिश्ता होता
टूटता घर न हमारा यूं कभी भी जानम
दिल में तेरे भी अगर प्यार जरा सा होता
चाँद जैसा है बदन झील सी तेरी आंखें
तुझ पे हर कोई फिदा होता न तो क्या होता
तू चली आती है छत पर जो अकेली जानम
चाँद को ख्वाब सरीखा सा है धोखा होता
जिन्दगी भर है जिसे ख्वाब में पूजा मैने
रूबरू होता अगर वो तो करिश्मा होता
यार इलजाम भला क्या तू लगाता मुझपर
झांक कर दिल में कभी अपने जो देखा होता
क्या बिगड़ते यूं सभी काम तुम्हारे हमदम
बात करने का अगर तुमको सलीका होता
यार इलजाम भला क्या तू लगाता मुझपर
झांक कर दिल में कभी अपने जो देखा होता
क्या बिगड़ते यूं सभी काम तुम्हारे हमदम
बात करने का अगर तुमको सलीका होता
बेवफ़ा‘श्याम’अगर होता नहीं जो यारो
आठवां फिर तो वो दुनिया का अजूबा होता
फ़ाइलातुन,फ़इलातुन.फ़इलातुन ,फ़ेलुन
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Sunday, August 1, 2010
चल रहा हूं अकेला दोस्तो= गज़ल
खुशबुओं का सफर है जिन्दगी
अजनबी सी मगर है जिन्दगी
फ़िक्र तेरी मेरी सभी की है
खुद से पर बेखबर है जिन्दगी
साँस धड़कन ही सिर्फ है नहीं
है कलेजा जिगर है जिन्दगी
सुर्खियों की ललक ने दी बना
हादसों की खबर है जिन्दगी
औरतों के नसीब से लगा
बेबसी का नगर है जिन्दगी
चल रहा हूं अकेला दोस्तो
अब कहां हमसफर है जिन्दगी
मौत मन्जिल अगर है”श्याम जी’
साँस की बस डगर है जिन्दगीफ़ाइलुन,फ़ाइलुन,मफ़ाइलुन
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Saturday, July 17, 2010
सुलझा दिया इक बार तो सौ बार उलझाया हमें-gazal
मिलना है गर तुझको कभी सचमुच ही ग़म से जिन्दगी
तो आके फिर तू मिल अकेले में यूं हमसे जिन्दगी
हाँ आज हम इनकार करते हैं तेरी हस्ती से ही
खुद मौत माँगोगे, जियेंगे अपने दम से जिन्दगी
हर बार ही देखा तुझे है दूर से जाते हुए
इक बार तो आजा मेरे आँगन में छम से जिन्दगी
सुलझा दिया इक बार तो सौ बार उलझाया हमें
पाएं हैं ग़म कितने तेरे इस पेचो-खम से जिन्दगी
नाहक नहीं हैं हम इसे सीने से चिपकाये हुए
इस जख्म से सीखा है क्या-क्या पूछ हमसे जिन्दगी
हैं ‘श्याम’ गर मेरा नहीं, तो है पराया भी नहीं
कट जाएगी अपनी तो यारो, इस भरम से जिन्दगी
मुतफ़ाइलुन= चार बार
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तो आके फिर तू मिल अकेले में यूं हमसे जिन्दगी
हाँ आज हम इनकार करते हैं तेरी हस्ती से ही
खुद मौत माँगोगे, जियेंगे अपने दम से जिन्दगी
हर बार ही देखा तुझे है दूर से जाते हुए
इक बार तो आजा मेरे आँगन में छम से जिन्दगी
सुलझा दिया इक बार तो सौ बार उलझाया हमें
पाएं हैं ग़म कितने तेरे इस पेचो-खम से जिन्दगी
नाहक नहीं हैं हम इसे सीने से चिपकाये हुए
इस जख्म से सीखा है क्या-क्या पूछ हमसे जिन्दगी
हैं ‘श्याम’ गर मेरा नहीं, तो है पराया भी नहीं
कट जाएगी अपनी तो यारो, इस भरम से जिन्दगी
मुतफ़ाइलुन= चार बार
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Thursday, July 1, 2010
नहीं मिलती यहां पर मौत भी माँगे अगर कोई-गज़ल
चलो फूलों की इस बस्ती से यूँ दो पल चुरा लें हम
कभी भँवरो की भी मस्ती से यूँ दो पल चुरा लें हम
नहीं मिलती यहां पर मौत भी माँगे अगर कोई
चलो फिर तो जबरद्स्ती से यूँ दो पल चुरा लें हम
इशारे पर चलें जिसके हमेशा चाँद-तारे भी
भला क्यों न आज उस हस्ती से यूँ दो पल चुरा लें हम
बहुत महंगी हुईं हैं खिलवतें अबके बरस यारो
खड़ी इस भीड़ सस्ती यूँ दो पल चुरा लें हम
नहीं किस्मत हमारी ये कि हम पहुंचे किनारों पर
कि लहरों डूबती कश्ती से यूँ दो पल चुरा लें हम
भला क्या कोई पूछे है यहाँ ईमानदारी को
न क्यों मतलब परस्ती से यूं दो पल चुरा लें हम
लगा है ‘श्याम’तो करने खुराफाते नईं यारो
उसी की इस मटरगश्ती से यूँ दो पल चुरालें हम
मफ़ाईलुन,मफ़ाईलुन,मफ़ाईलुन,मफ़ाईलुन
कुछ दोस्तों को कश्ती व मटरगश्ती काफ़िये अटकेंगे वे इन्हे न पढें
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Tuesday, June 22, 2010
एक और इम्तिहान है-गज़ल
है जान तो जहान है
फ़िर काहे का गुमान है
क्या कर्बला के बाद भी
एक और इम्तिहान है
इतरा रहे हैं आप यूं
क्या वक्त मेहरबान है
हैं लूट राहबर रहे
जनता क्यों बेजुबान है
है ‘श्याम ’बेवफ़ा नहीं
हाँ इतना इत्मिनान है
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Monday, June 14, 2010
हैं उठ रहीं मेरे मन में खराब-सी बातें-gazal
हैं उठ रहीं मेरे मन में खराब-सी बातें
थीं करनी तुमसे मुझे बेहिसाब-सी बातें
हो तुम भी, हम भी हैं जब साफगो, उठीं फिर क्यों
हमारे बीच बताओ नकाब-सी बातें
बगैर जाम के मदहोश कर दिया उसने
रहा वो करता ही हर पल शराब-सी बातें
इलाही तुम ही हो क्या रूबरू मेरे ये कहो
हकीकतो में भी होती हैं ख्वाब-सी बातें
खुदा का जिक्र ही होता है कब जहाँ में अब
यहाँ तो होती हैं बस अब अजाब-सी बातें
समझना ‘श्याम’ को आसां नहीं कभी यारो
करे है वो तो सदा बस किताब-सी बातें
मफ़ाइलुन. फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन
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Friday, June 11, 2010
फ़ुटकर शे‘र-१२- श्याम सखा ‘श्याम‘
जिन्दगी भर जिन्दगी खेल दिखाती है रही
जीतकर भी हारना मुझको सिखाती है रही
फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ इ लातुन फ़ेलुन
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Friday, June 4, 2010
मर गया मैं तो कौन पूछेगा-gazal
चुप रहूँगा तो अनकही होगी
गर कहूँगा तो दिल्लगी होगी
आया होगा बुझाने को तब कौन
आग पानी में जब लगी होगी
सो रहा दिन है तानकर चादर
रात तो सारी शब जगी होगी
मर गया मैं तो कौन पूछेगा
जिन्दगी मिस्ले-खुदकुशी होगी
बम गिरेंगे कभी जो धरती पर
शोर के बाद खामुशी होगी
मौत पीछा करेगी निश्चय ही
साथ गर तेरे जि़न्दगी होगी
दिल रकीबों के जल गए होंगे
तुझसे जब भी नजर लड़ी होगी
प्यास जब जाएगी गुजर हद से
होगा सागर न फिर नदी होगी
जब भी देखेंगे 'श्याम’ की मैयत
दुश्मनों को बहुत खुशी होगी
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गर कहूँगा तो दिल्लगी होगी
आया होगा बुझाने को तब कौन
आग पानी में जब लगी होगी
सो रहा दिन है तानकर चादर
रात तो सारी शब जगी होगी
मर गया मैं तो कौन पूछेगा
जिन्दगी मिस्ले-खुदकुशी होगी
बम गिरेंगे कभी जो धरती पर
शोर के बाद खामुशी होगी
मौत पीछा करेगी निश्चय ही
साथ गर तेरे जि़न्दगी होगी
दिल रकीबों के जल गए होंगे
तुझसे जब भी नजर लड़ी होगी
प्यास जब जाएगी गुजर हद से
होगा सागर न फिर नदी होगी
जब भी देखेंगे 'श्याम’ की मैयत
दुश्मनों को बहुत खुशी होगी
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Monday, May 24, 2010
चल छैंयां-छैय़ां वाली इस पीढी को तो---gazal
फूल बुरा लगता है,पान बुरा लगता है
जब टूटे दिल तो भगवान बुरा लगता है
अब तो घर आया मेहमान बुरा लगता है
वक्त नया आया है,आये संस्कार नये
अब तो झूठ भला,ईमान बुरा लगता है
रिश्वत के इस अलबेले युग में,बिन रिश्वत के
मुझको काम हुआ आसान बुरा लगता है
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जब टूटे दिल तो भगवान बुरा लगता है
चल छैंयां-छैय़ां वाली इस पीढी को तो
मीरा पगली और,रसखान बुरा लगता है
देव अतिथि होता होगा मेरे यार कभी मीरा पगली और,रसखान बुरा लगता है
अब तो घर आया मेहमान बुरा लगता है
वक्त नया आया है,आये संस्कार नये
अब तो झूठ भला,ईमान बुरा लगता है
नव फ़्लैटों की झीनी-झीनी दीवारों में
सब कुछ सुनता सा यह कान बुरा लगता है
रिश्वत के इस अलबेले युग में,बिन रिश्वत के
मुझको काम हुआ आसान बुरा लगता है
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Monday, May 17, 2010
’मसीहा भी मुझको सजा दे गया
मुझे जिन्दगी की दुआ दे गया
मसीहा भी मुझको सजा दे गया
लगा डूबने बेखुदी में मैं जब
कोई मुझको तेरा पता दे गया
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मसीहा भी मुझको सजा दे गया
लगा डूबने बेखुदी में मैं जब
कोई मुझको तेरा पता दे गया
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Wednesday, May 12, 2010
हो गई फ़िर इक खता है- गज़ल
हो गई फ़िर से खता है
दिल तुझे जो दे दिया है

गम से बचकर है निकलना
प्यार ही बस रास्ता है
आ रही शायद वही है
दिल मेरा जो झूमता है
ढूंढता है ‘श्याम किसको
दिल हुआ क्या लापता है
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दिल तुझे जो दे दिया है

इश्क सचमुच इक बला है
खुद मजा है,खुद सजा हैइश्क सचमुच इक बला है
रोग भी खुद,खुद दवा है
गम से बचकर है निकलना
प्यार ही बस रास्ता है
आ रही शायद वही है
दिल मेरा जो झूमता है
है हसीं अपनी धरा ये
चाँद पीछे घूमता है
ढूंढता है ‘श्याम किसको
दिल हुआ क्या लापता है
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Monday, May 3, 2010
ये कैसी तकदीर लिखी मौला-गज़ल
ये कैसी तकदीर लिखी मौला
पावों जंजीर लिखी मौला मौला
इस बार नहीं हीर लिखी मौला
फ़ूलो की महफ़िल में क्यों तूने
कांटो की तसवीर लिखी मौला
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पावों जंजीर लिखी मौला मौला
सांसे दी ,धड़कन भी दी लेकिन
जीने की नहीं तदबीर लिखी मौला
ढूंढ़ रहा है बेचारा रांझाइस बार नहीं हीर लिखी मौला
नन्हे-मुन्नो की तख्ती पर क्यों
बात गुरू-गम्भीर लिखी मौला
फ़ूलो की महफ़िल में क्यों तूने
कांटो की तसवीर लिखी मौला
श्याम सखा’ की किस्मत में तो बस
हर बार वही पीर लिखी मौला
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