आस इक भी अगर फली होती
जिन्दगी तू बहुत भली होती
यूँ थिरकती, महकती क्या ये हवा
बगिया माली ने गर छली होती
मांग लेते तुझे सितारों से
उसके आगे अगर चली होती
ढलती आँसू की बूंद मोती में
जो न अच्छी घड़ी टली होती
स्नेह-भर जो हमें मिला होता
फिर न कोई कमी खली होती
गर मिली यार की गली होती
शोख-चंचल मेरी तबियत हैं
लेखनी क्यों न मनचली होती
कौन झुकता यूँ तेरे आगे ‘श्याम’
उम्र तेरी जो न ढली होती
फ़ाइलातुन,मफ़ाइलुन,फ़ेलुन
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