Friday, March 27, 2009

मन ढोलक की थाप हुआ



कुछ भी कहना पाप हुआ
जीना भी अभिशाप हुआ

मेरे वश में था क्या कुछ ?
सब कुछ अपने आप हुआ

तुमको देखा सपने में
मन ढोलक की थाप हुआ

कह कर कड़वी बात मुझे
उसको भी संताप हुआ

दर्द सुना जिसने मेरा
जब तक ना आलाप हुआ

शीश झुकाया ना जिसने
वो राना प्रताप हुआ

पैसा- पैसा- पैसा ही
सम्बन्धों का माप हुआ

इतना पढ़-लिखकर भी 'श्याम’
सिर्फ अगूंठा-छाप हुआ

Wednesday, March 25, 2009

वो सुधरने भी नहीं देता मुझे

4
दर्द तो जीने नहीं देता मुझे
और मैं मरने नहीं देता उसे

रूठने का गर मुझे होता पता
क्या न मैं खुद ही मना लेता तुझे

धड़कनों पर सख्त पहरा उसका है
खुदकुशी करने नहीं देता मुझे

पर कतर देता है मेरे इस तरह
वो कभी उडऩे नहीं देता मुझे

ख्वाब दिखलाता तो है उनमें मगर
रंग भी भरने नहीं देता मुझे

मैं अगर तुझको न करता प्यार तो
दिल ही तेरा खुद बता देता तुझे

थाम लेता है मुझे मेरा ज़मीर
शर्म से झुकने नहीं देता मुझे

खुद ही था जब चोर मेरे मन में तो
फिर भला कैसे गिला देता तुझे

याद आ-आकर उड़ा जाता है नींद
खुशनुमा सपने नहीं देता मुझे

मैं बिगड़ जाऊँ गवारा कब उसे
वो सुधरने भी नहीं देता मुझे

फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलुन
गैर-मुर्द्द्फ़ गज़ल

Saturday, March 21, 2009

**** दर्द को दिल से लब पे आना था

दर्द को दिल से लब पे आना था
बेवफ़ाई तो इक बहाना था

उनका रुख से नकाब हटाना था
देखता रह गया जमाना था

प्यार था प्यार का बहाना था
प्यार लेकिन किसे निभाना था

ग़मजदा खुद ही वो मिला हमको
जख्म दिल का जिसे दिखाना था

हां वो मेरा रकीब था लेकिन
कातिलों से उसे बचाना था

आज कहते वो खराब हैं मुझको
कल तलक तो मै खानखाना था

राज़ उजागर हुआ अचानक ही
लाख चाहा जिसे छुपाना था

प्यार करना पड़ा था मजबूरन
दोस्त मौसम बड़ा सुहाना था

तुमसे मिलकर झुकी नजर मेरी
चूकता कब तेरा निशाना था

मैं तो था तेरी कफ़स में महफ़ूज
और मुझपर तेरा निशाना था

रूह रौशन हुई मुहब्बत से
जिस्म बेशक बहुत पुराना था



राह समझा दी एक बार उसने
रास्ता खुद हमें बनाना था

ग़म चुराकर चला गया मेरे
श्याम’सचमुच बहुत सयाना था

या
दिल चुराने में‘श्याम' था माहिर
दिल उसी से हमें बचाना था

फ़ाइलातुन, मफ़ाइलुन फ़ेलुन
2122 ,1212,211 [22]

Wednesday, March 18, 2009

शुक्रिया जिन्दगी- गज़ल

गम दिये , दी खुशी
शुक्रिया जिन्दगी

तम हुआ खत्म तब
जब दिखी रोशनी

यूं जतन लाख थे
बात पर कब बनी

मर मिटे हैं सभी
वाह री सादगी

दर्द ज्यों-ज्यों बढ़ा
बढ़ गई बन्दगी


हर घड़ी बज रही 
धड़कने हैं सखा 
ध्यान से सुन ज़रा 
मौत की   दुंदभी 

सभ्यता खा गई
ये नई रोशनी


दे गई , मौत को 
मात फिर जिन्दगी 


है नहीं 'श्याम' क्या
सिरफ़िरा आदमी

Saturday, March 14, 2009

रोज़ हथेली पर उसकी -गज़ल

गीत, गज़ल या गाली लिख
बात मगर मतवाली लिख

गहमा-गहमी खूब हुई
अब तो खामखय़ाली लिख

काँटे लिख चाहे जितने
फूलों की भी डाली लिख

लिख तू अमावस ही चाहे
लेकिन दीपों-वाली लिख

लिख मुस्कानें अधरों पर
असली लिख या जाली लिख

मौसम खूब सुहाना है
कोई गजल निराली लिख

पूरा गुलशन चहकेगा
पत्तों पर खुशहाली लिख

रोज़ हथेली पर उसकी
गजलें मेंहदी-वाली लिख

स्वागत किया बहारों का
मौसम ने, हरियाली लिख

अपने कल पर मत इतरा
आज को गौरवशाली लिख

'श्याम अलग तू दुनिया से
बातें भी अनियाली लिख

फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ा

Monday, March 9, 2009

जिसने औढ़ा,प्रीत का पल्ला

6
यारो मैने खूब ठगा है
खुद को भी तो खूब ठगा है
पहले ठगता था औरों को
कुछ भी हाथ नहीं तब आया
जबसे लगा स्वयं को ठगने
क्या बतलाऊं,क्या-क्या पाया
पहले थी हर खुशी पराई
अब तो हर इक दर्द सगा है
किस-किस को फांसा था मैने
कैसे-कैसे ज़ाल रचे थे
अपनी अय्यारी से यारो
अपने बेगाने कौन बचे थे
औरों के मधुरिम-रंगो में
मन का कपड़ा आज रंगा है
जबसे अपने भीतर झांका
क्या बेगाने या क्या अपने
इक नाटक के पात्र सभी हैं
झूठे हैं जीवन के सपने
दुश्मन भी प्यारे अब लगते
इतना मन में प्रेम-पगा है
ऋषियो-मुनियों ने फरमाया है
माया धूर्त,महा ठगनी है
उनका हाल न पूछो हमसे
जिनको लगती यह सजनी है
जिसके मन में बसती है यह
उसके दिल में दर्द जगा है
जग की हैं बातें अलबेली
जन्म-मृत्यु की ये अठखेली
जिसने औढ़ा,प्रीत का पल्ला
पीर-विरह की उसने झेली
जीवन तो है सफर साँस का
मौत साँस के साथ दगा है

मित्रो आज होली की पूर्व संध्या पर एक गीत लेकर हाजिर हूं

Sunday, March 8, 2009

औरत ने कभी कोई धर्म ईजाद नहीं क्या क्यों भला ?

औरत को
कभी कोई धर्म ईजाद करने की जरूरत महसूस नहीं हुई।
100
औरत के बहुआयामी जीवन एवम्‌ व्यक्तित्व पर केन्द्रित एक गज़ल-
मेरा मानना है के स्त्री पृकृति की सबसे पूर्ण कृति है,पुरुष उसके सामने स्वय़ं को बौना पाता है,अधूरा महसूस करता है,इसीलिये वह कभी एट्म बम,कभी चंद्र्यान ,कभी किले,महल तो कभी नये-नये धर्म ईजाद करता दिखता है,
जबकि स्त्री शिशु को जन्म देकर, उसका पालन-पोषण कर जीवन की पूर्णता, पाकर संतुष्ट् हो जाती है इसीलिए उसे कभी कोई धर्म ईजाद करने की
जरूरत महसूस नहीं हुई।
श्याम सखा ‘श्याम’


काँच का बस एक घर है लड़कियों की जिन्दगी
और काँटों की डगर है लड़कियों की जिन्दगी

इस नई तकनीक ने तो है बना दी कोख भी
आह कब्रिस्तान भर है लड़कियों की जिन्दगी

बाप मां के बाद अधिकार है भरतार का
फर्ज का संसार भर है लड़कियों की जिन्दगी

किस धरम, किस जात में इन्साफ इसको है मिला
जीतती सब हार कर है लड़कियों की जिन्दगी

हो अहल्या या हो मीरा या हो बेशक जानकी
मात्रा चलना आग पर है लड़कियों की जिन्दगी
15
द्रोपदी हो, पद्मिनी हो, हो भले ही डायना
रोज लगती दाँव पर है लड़कियों की जिन्दगी
16
एक रजिया एक लक्ष्मी और इन्दिरा जी भला
क्या नहीं अपवाद-भर है लड़कियों की जिन्दगी

कर नुमाइश जिस्म की क्या खुद नहीं अब आ खड़ी
नग्नता के द्वार पर है लड़कियों की जिन्दगी
24
प्यार करने की खता जो कहीं करलें ये कभी
तब लटकती डाल पर है लड़कियों की जिन्दगी
25
जानती सब, बूझती सब, फिर भला क्यों बन रही
हुस्न की किरदार भर है लड़कियों की जिन्दगी
26
ठीक है आजाद होना, हो मगर उद्दण्ड तो
कब भला पायी सँवर है लड़कियों की जिन्दगी
ले रही वेतन बराबर,हक बराबर, पर नहीं
इतनी सी तकरार भर है लड़कियों की जिन्दगी
30
आदमी कब मानता इन्सान इसको है भला
काम की सौगात भर है लड़कियों की जिन्दगी
31
शोर करते हैं सभी तादाद इनकी घट रही
बन गई अनुपात भर है लड़कियों की जिन्दगी

32

ठान लें जो कर गुजरने की कहीं ये आज भी
पिफर तो मेधा पाटकर है लड़कियों की जिन्दगी
33
क्यों नहीं तैतीसवां हिस्सा भी इसको दे रहे,
आधे की हकदार गर है लड़कियों की जिन्दगी
34
देवता बसते वहाँ है पूजते नारी जहाँ
क्यों धरा पर भार भर है लड़कियों की जिन्दगी
35
हाँ, कहीं इनको मिले गर प्यारा थोड़ा दोस्तो
तब सुधा की इक लहर है लड़कियों की जिन्दगी
36
मैंने तुमने और सबने कह दिया सुन भी लिया
क्यों न फिर जाती सुधर है लड़कियों की जिन्दगी

तू अगर इसको कभी अपने बराबर मान ले
फिर तो तेरी हमसपफर है लड़कियों की जिन्दगी
37
माफ मुझको अब तू कर दें ऐ खुदा मालिक मेरे
हाँ यही किस्मत अगर है लड़कियों की जिन्दगी
38
‘कल्पना’ को ‘श्याम’ जब अवसर दिया इतिहास ने
उड़ चली आकाश पर है लड़कियों की जिेन्दगी

Friday, March 6, 2009

***उसकी किस्मत किसने लिक्खी ?

****उसकी किस्मत किसने लिक्खी ?

वो तो जब भी खत लिखता है
उल्फ़त ही उल्फ़त लिखता है

मौसम फूलों के दामन पर
ख़ुशबू वाले ख़त लिखता है

है कैसा दस्तूर शहर का
हर कोई नफ़रत लिखता है

बादल का ख़त पढ़कर देखो
छप्पर की आफ़त लिखता है

अख़बारों से है डर लगता
हर पन्ना दहशत लिखता है

यार मुहब्बत का हर किस्सा
अश्कों की उजरत लिखता है

रास नहीं आता आईना
वो सबकी फ़ितरत लिखता है

मन हरदम अपनी तख़्ती पर
मिलने की हसरत लिखता है

उसकी किस्मत किसने लिक्खी
जो सबकी क़िस्मत लिखता है

”श्याम’अपने हर अफ़साने में
बस, उसकी बाबत लिखता है

फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन

श्याम’अपने हर अफ़साने में
श्यामपने हर अफ़साने में,
इस प्रक्रिया को गज़ल छंद में अलिफ़-वस्ल होना या मदगम होना कहा जाता है

Wednesday, March 4, 2009

ये भी क्या दिलबरी हुई साहिब ?


घर
जला,रोशनी हुई साहिब
ये भी क्या जिन्दगी हुई साहिब
तू नहीं और ही सही साहिब
ये भी क्या दिलबरी हुई साहिब
है मुझको हुनर इबादत का
सर झुका, बन्दगी हुई साहिब
भूलकर खुद को जब चले हम ,तब
आपसे दोस्ती हुई साहिब
खुद से चलकर तो ये नहीं आई
दिल दुखा,शायरी हुई साहिब
जीतकर वो मजा नहीं आया
हारकर जो खुशी हुई साहिब
तुम पे मरकर दिखा दिया हमने
मौत की बानगी हुई साहिब
श्यामसे दोस्ती हुई ऐसी
सब से ही दुश्मनी हुई साहिब

फ़ा इलातुन,मफ़ाइलुन, फ़ेलुन
सब से ही दुश्मनी हुई साहिब
२ १ २ २ १ २
२ २ २

**भटका पल भर था

घर से बेघर था, क्या करता
दुनिया का डर था, क्या करता

जर्जर कश्ती टूटे चप्पू
चंचल सागर था, क्या करता

सच कहकर भी मैं पछताया
खोया आदर था, क्या करता

चन्दा डूबा, तारे गायब
चलना शब भर था, क्या करता

ठूंठ कहा था सबने मुझको
मौसम पतझर था, क्या करता

ख़ुद से भी तो छुप न सका वो
चर्चा घर-घर था, क्या करता

आख़िर दिल मैं दे ही बैठा
बाँका दिलबर था, क्या करता

ना थी धरती पाँव तले, ना
सर पर अम्बर था, क्या करता

मेरा जीना मेरा मरना
तुम पर निर्भर था, क्या करता

सारी उम्र पड़ा पछताना
भटका पल भर था, क्या करता

बादल बिजली बरखा पानी
टूटा छप्पर था, क्या करता

सब कुछ छोड़ चला आया मैं
रहना दूभर था, क्या करता

थक कर लुट कर वापिस लौटा
घर आख़िर घर था, क्या करता


यह भी फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन वज़्न पर आधारित गज़ल है
सुमित भारद्वाज के अनुरोध पर एक शे की तक्तीअ
सब कुछ छोड़ चला आया मैं
२१ १२
रहना दूभर था, क्या करता

Monday, March 2, 2009

इस घर पर बमबारी मत कर

हम जैसों से यारी मत कर
ख़ुद से यह गद्दारी मत कर

तेरे अपने भी रहते हैं
इस घर पर बमबारी मत कर

रोक छ्लकती इन आँखों को
मीठी यादें ख़ारी मत कर

हुक्म-उदूली का ख़तरा है
फ़रमाँ कोई जारी मत कर

आना-जाना साथ लगा है
मन अपना तू भारी मत कर

ख़ुद आकर ले जाएगा वो
जाने की तैयारी मत कर

सच कहने की ठानी है तो
कविता को दरबारी मत कर

‘श्याम’निभानी है गर यारी
तो फिर दुनियादारी मत कर

फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन

Thursday, February 26, 2009

तो पत्थर जनाब हम भी हैं


82
सवाल आप हैं गर तो जवाब हम भी हैं
हैं ईंट आप तो पत्थर जनाब हम भी हैं

शरीफ़ हम हैं शरीफ़ों के वास्ते साहिब
जो हो खराब कोई तो खराब हम भी हैं

नहीं है यूं तो जमीं आज अपने पाँव तले
फ़लक को छूलें,सँजोए ख्वाब हम भी हैं

न बाज़ आए अगर आप जुल्म ढ़ाने से
तो अपने दिल में लिये इन्किलाब हम भी हैं

बहेलिये से यूं बचकर चली कहाँ चिड़िया
तेरी फिराक में बैठे उकाब हम भी हैं

बहुत गुमान है शब को सियाह चादर का
तो जान ले वो कि इक आफ़ताब हम भी हैं


आज हम एक और वज्न-जो सभी शायरों

बहुत पसन्दीदा वज्न है पर बात कर रहे हैं

इस में अनेक फ़िल्मी गीत भी लिखे गये हैं


मफ़ाइलुन,फ़इलातुन,मफ़ाइलुन,फ़ेलुन

२ २ २ २ २
लाल रंग वाले लघु अनिवार्य रहेंगे

Wednesday, February 25, 2009

***** दर्द दिल में है पर मुस्करा

***** दर्द दिल में है पर मुस्करा

दर्द दिल में है पर मुस्करा
साँस खुलकर ले और खिलखिला

कर्ज तेरा है तू ही चुका
सर मगर अपना तू मत झुका

हाँ गिले-शिकवे होंगे सदा
तोड़ मत प्यार का सिलसिला

गर नहीं दम कि सच कह सके
बैठ तू बन कर इक झुनझुना

मत जुबाँ सी, अरे ‘श्याम’ तू
चोट खाई है तो बिलबिला

फ़ाइलुन,फ़ाइलुन,फ़ाइलुन
2111, 2111, 2111,

इस बार हम एक और रुक्न[खण्ड] पर गज़ल की तकतीअ कर देखते हैं।

दर्द दिल में है पर मुस्करा
२१ २२ , २ १ १ १ ११ १ २
दर=२ मुस्करा में हम मुस इकट्ठा बोलते हैं अत: ११=२ याने गुरू इस के बाद है क जो खुद ही लघु है,है की मात्रा गिर कर लघु हो गया है। और को अर पढा गया है गज़ल का सारा दारोमदार-ध्वनि पर आधारित है अगर आप लय में गुन्गुनायेंगे तो और अर ही बोल पायेंगे ,इसे गज़ल में जायज करार दिया गया है जैसे हिन्दी गीतो में और को ‘औ’गाया जाता है

Saturday, February 21, 2009

**औरत होना है बरबादी

कहने को हम दुनिया आधी
फ़िर भी हैं मर्दों की बांदी

गहने जेवर की सूरत में
बेड़ी ही हमको पहना दी

बिट्या रानी घर की शोभा
कहकर कीमत खूब चुका दी

डोली उठी पिता के घर से
पी के घर में चिता सजा दी

घर की साज-संवार करें हम
इतनी सी बस है आजादी

जन्म दिया आदम को हमने
जनम-जनम की हम अपराधी

बात बड़ी है सीधी सादी
औरत होना है बरबादी

घर तेरा है या है मेरा
असली बात यही बुनियादी

आधा हक ले के है रहना
बात आज तुम्हें यूं समझादी

अनाम को-‘बेरदीफ़ मुस्लसल’गज़ल गज़ल
वज्न-फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन-काफ़िया ‘ई
मुस्लसल=आम तौर पर गज़ल का हर शे‘र आजाद होता है
यानि हर शे‘र में अलग विषय रहता है यही सर्वमान्य तथ्य है
लेकिन एक विषय पर आधारित गज़ल जिसे मुस्लसल’गज़ल
कहा जाता है,कहने की परम्परा भी है।

Friday, February 20, 2009

जख्म मेरे खुले खिड़कियों की तरह

14

दोस्तो पिछली बार हमने रुक्न फ़ऊलुन पर आधारित गज़ल पढी थी
आज एक और रुक्न याने फ़ाइलुन पर गज़ल देखें


घूमना है बुरा तितलियों की तरह
घर भी बैठा करो लड़कियों की तरह

दिल में उतरी थी वो बिजलियों की तरह
जब गई तो गई,आँधियों की तरह

उनकी बातें लगीं झिड़कियों की तरह
जख्म मेरे खुले खिड़कियों की तरह

आ लिखें ,फ़िर से खत ,एक दूजे को हम
बालपन में लिखीं तख्तियों की तरह

देखकर,आपको धड़कने ,हैं हुई
कूदती,फाँदती हिरनियों की तरह

जल गये मेरे अरमां सभी के सभी
फूंक डाली गईं झुग्गियों की तरह

छोड़ कर चल दिये वो हमें दोस्तो
आम की चूस लीं गुठलियों की तरह

बात अपनी कहो कुछ मेरी भी सुनो
शोख चंचल खिली लड़कियों की तरह

जिन्दगी फिर रही है तड़पती हुई।
जाल में फँस गई मछलियों की तरह

प्यार करना ही है गर तुम्हें तो करो
मीरा, राधा या फिर गोपियों की तरह


काश हो जाते हम नामवर दोस्तो
मिट गई प्यार में हस्तियों की तरह

चाहते आप ही बस नहीं हैं हमें
घूमता है जहां फिरकियों की तरह

आज मायूस है क्यों वो, कल तक जो थी
खेलती कूदती हिरनियों की तरह

माफ कर दें इन्हें आप भी ‘श्याम’ जी
आपकी अपनी ही गलतियों की तरह

फ़ाइलुन,फ़ाइलुन,फ़ाइलुन,फ़ाइलुन

Saturday, February 14, 2009

***उर्दू और हिन्दी गज़ल में मोटे तौर पर मात्र दो बातों का अन्तर है

गज़ल कहना या लिखना शुरू करते हैं
उर्दू और हिन्दी गज़ल में मोटे तौर पर मात्र दो बातों का अन्तर है
एक-
क्लिष्ट उर्दू शब्दों का प्रयोग [अगर संस्कृतनिष्ठ हिन्दी शब्दों का प्रयोग होगा तो]हिन्दी भी क्लिष्ट
हो जाएगी।[ क्लिष्ट शब्द ,वे शब्द जो आम बोलचाल की भाषा में प्रयोग नहीं होते और आम आदमी की
समझ में उनका अर्थ नहीं आता=आम आदमी का मतलब किसी आबादी का बहुमत
चाहे पढ़ा-लिखा हो या
अनपढ ]
दो-
उर्दू समास का प्रयोग यथा= काबिले-गौर-हिन्दी व्याकरण में हम इसे गौर के काबिल ही कहेंगे।और
कुछ लोगों का मानना है कि इस समास प्रयोग के बिना गज़ल लिखना संभव नहीं।पर ऐसा नहीं है
आगे चल कर हम इसके उदाहरण भी देंगे।


उर्दू में गज़ल लिखने का कि बजाय गज़ल कहना ज्यादा सही,नफ़ासत की बात मानी जाती है।क्यों ?
शायरों का मानना है कि गज़ल [मैं तो कहूंगा हर कविता दिल में निर्झर की तरह फूटे तभी मर्म को छूने
वाली रचना हो सकती है,अत: वे कहते हैं लिखी तो ‘इमला’ जाती है, गज़ल तो कही जाती है।
तो गज़ल कहने के लिये रुक्न [खण्ड] जानना आवश्यक पर सारे लगभग ३० रूक्नों का ज्ञान कतई जरूरी नहीं है।
कुल आठ-दस भी रूक्न जान कर कोई भी बखूबी गज़ल कह सकता है।
ये आठ दस रुक्न हैं ये
पहले हम फ़ऊलुन को लेते हैं,फिर इन१० रुक्नों को बारी-बारी लेंगे
फ़ऊलुन=चलाचल=१ २ २
इस रुक्न को दो,तीन या चार बार दोहरा कर गज़ल बन सकती है यथा- १२२,१२२,=१० मात्रा या१२२, १२२,१२२, =१५ मात्रा या१२२, १२२, १२२,१२२= २० मात्रा,कभी-कभी इनके अन्त में फ़ऊ=१२ भी जोड़ा जा सकता है
तब बह्र का वज्न होगा
यथा- १२२,१२२,१३=१३ मात्रा या१२२, १२२,१२२,१२ =१८ मात्रा या१२२, १२२, १२२,१२२ १२= २३ मात्रा।
अब इस बहर की एक गज़ल की गणना कर के देखते हैं।

बने फिरते थे जो जमाने मे शातिर
पहाड़ों तले आये वे ऊंट आखिर

छुपाना है मुशकिल इसे मत छुपा तू
हमेशा मुह्ब्बत हुई यार जाहिर

बना क़ैस ,रांझा बना था कभी मैं
मेरी जान सचमुच मैं तेरी ही खातिर

खुदा को भुलाकर तुझे जब से चाहा
हुआ है खिताब अपना तब से ही काफिर

बनी को बिगाड़े, बनाये जो बिगड़ी
कहें लोग हरफ़न में उस को तो माहिर

मुझे छोड़कर तुम कहां जा रहे हो
हमीं दो तो हैं इस सफर के मुसाफिर

तेरी खूबियां 'श्याम' सब ही तो जाने
खुशी हो कि ग़म तू हरदम है शाकिर

गणना या तकतीअ
बने फिर ते थे जो जमाने मे शातिर
१२ २, २ २ १ २ २ २ २
पहाड़ों तले आ ये वे ऊंट आखिर
१ २ २, १२ २, २ २. १ २ ११=२

छुपाना है मुशकिल इसे मत छुपा तू
१२ २, २ २ ११ २ २
हमेशा मु ह्ब्बत हुई या जाहिर
१२ २, १ २ २ १ २ २ ११

बना क़ै स ,रांझा बना था कभी मैं
१२ २, १ २ २ १ २ २ १ २ २
मेरी जा न सचमुच मैं तेरी ही खातिर
१२ २, १ २ २ २ २ २ २

खुदा को भुलाकर तुझे जब से चाहा
१२ २, १ २ ११ १ २ ११ २ २
हुआ है खिताब अप ना तब से ही काफिर
१२ २, १ २ २ २ २ १ २ २

यहां खिता के बाद ब+अप=बप और ना कि मात्रा गिर जाएगी
हुआ है खिताबप ना तब से ही काफ़िर
१ २ २ १ २ ११ १ ११ २ ११
इस क्रिया को मदग्म होना कहा जाता है
यानि किसी लघु के बाद अगर स्वर अ,आ,इ,ई उ,ऊ,ओ,औ,आ जाये तो
वह दोनो मिल सकते हैं और देखें याद आता वैसे २१२२,=७ मात्रा है
लेकिन इसे यादाता=२२२= ६ मात्रा भी किया जा सकता है गज़ल नियमनुसार=संगीत
नियमानुसार भी



बनी को बिगाड़े, बनाये जो बिगड़ी
१ २ २ १ २ २ १ २ २ २ २
कहें लो ग हरफ़न में उस को तो माहिर
१ २ २ १ १ १ १ १ १ २ १ २ ११
मुझे छो ड़कर तुम कहां जा र हे हो
१ २ २ ११ ११ १ २ २ १ २ २
हमीं दो तो हैं इस सफर के मुसाफिर
१ २ २ ११११ २ १ २ ११
तेरी खू बियां 'श्या म' सब ही तो जाने
१ २ २ २ २ १ १ २ १ २ २
खुशी हो कि हो ग़म तू हरदम है शाकिर
१ २ २ १ २ ११ ११११ १ २ ११

मित्रो एक बात और जहां
लाल रंग में है,वहाँ न केवल लघु अनिवार्य है अपितु वह गिरा कर भी बनाया जा सकताहैउसी तरह नीले रंग में चिह्नित दो लघुओं को गुरू गिना जा सकता है
जैसे अन्तिम पंक्ति मे
हरदम के चार लघु कोगुरू या शाकिर के किर को दो लघु के स्थान पर एक गुरू
आगे चलकर हम एक और बह्र पर बात करेंगे।

Thursday, February 12, 2009

अंग सभी पुखराज तुम्हारे

मनमोहक अन्दाज तुम्हारे
सचमुच बेढ़्ब नाज तुम्हारे

मेरे मन के ताजमहल में
निशि-दिन गूंजें साज तुम्हारे

खजुराहो के बिम्ब सरीखे
अंग सभी पुखराज तुम्हारे

डर कर भागे चांद सितारे
जब देखे आगाज़ तुम्हारे

अपने दिल में हमने छुपाये
पगली कितने राज़ तुम्हारे

सुनना भूले गीत ग़ज़ल हम
सुन मीठे अल्फ़ाज तुम्हारे

कल थे हम,हां कल भी रहेंगे
जैसे हम हैं आज तुम्हारे

जब तक दिल में ‘श्याम’रखो तुम
हैं तब तक सरताज तुम्हारे

लो गौतम जी-बहर
फ़ेलुन,फ़ेलुन फ़ाल या फ़ेल फ़ऊलुन
२२,२२,२१,१२२

Tuesday, February 10, 2009

गज़ल क्या है


गज़ल क्या है ?


बहुत लोगों ने बहुत कुछ कहा है लेकिन उलझा -उलझा ,
मुझे
जनाब निश्तर खान्काही साहिब यह उदाहरणसबसे सटीक लगा

बदला-बदला देख पिया को चुनरी भीगे सावन में
बस यह हुआ कि उसने तक्ल्लुफ़ से बात की
रो-रो के रात हमने दुपट्टे भिगो लिये
या

मेरी उम्र से दुगनी हो गई
बैरन रात जुदाई की


ये थी हमारी किस्मत कि विसाले यार होता
अगर और जीते रहते ,यही इन्तजार होता

जाग-जागकर काटूँ रतियां
सावन जैसी बरसें अँखियां

उठाके पाय़ँचे चलने का वो हंसी अन्दाज
तुम्हारी याद में बरसात याद आती है

अब देखिये इन तीनो उदाहरणों मे नंबर गीत हैं और गज़ल हैं
जबकि भाव एक ही हैं।यानि हम कह सकते हैं कि गीत में स्त्रैण कोमलता है
,जबकि गज़ल कहने में पुरुषार्थ झलकता है।
या
गीत सीधे-सरल राह से अभिव्यक्ति का माध्यम है,वहीं गज़ल एक पहाडी घुमावदार पगडंडी है।
जैसे पहाड़ी पगडंडी पर पहली बार सफ़र कर रहे मुसाफ़िर को यह पूर्व अनुमान नहीं होता कि
अगले मोड़ पर पगडंडी दाईं तरफ़ मुड़ेगी या बाईं तरफ़,ऊपर की और पहाड़ पर चढ़ेगी
या आगे ढ़्लान मिलेगा
इसी तरह शे के पहले मिस्रे[पंक्ति] को सुन या पढकर श्रोता या पाठक जान ही नहीं पाता कि
अगले
मिस्रे मेंशायर क्या कहेगा।और अनेक बार दूसरा मिस्रा श्रोता को चमत्कृत कर जाता

इन्हें पढें और चमत्कृत हुआ महसूस करें
ये शे’र जनाब शहरयार साहिब के हैं।[उमराव जान फ़ेम वाले ]

अपनी सुबह के सूरज उगाता हूँ खुद
[अब आगे सोचिये क्या कहा जा सकता है]

जब्र का जहर कुछ भी हो पीता नहीं
[अब आगे सोचिये क्या कहा जा सकता है]


जमीन तो जैसी है वैसी ही रहती है लेकिन

अब ये तीनो शे’र पूरे पढ़ें और देखें आप चमत्कृत होते हैं या नहीं

पनी सुबह के सूरज उगाता हूं खुद
मैं चरागों की सांसो से जीता नहीं

जब्र का जहर कुछ भी हो पीता नहीं
मैं जमाने की शर्तों पे जीता नहीं

जमीन तो जैसी है वैसी ही रहती है लेकिन
जमीन बाँटने वाले बदलते रहते हैं


यति और गति या ग्त्यात्मकता और लयात्मक्ता के बिना गज़ल का अस्तित्व ही नहीं हो सकता।क्योंकि गज़ल की बुनियाद सरगम की तरह संगीत के आधार पर[और कहें तो गणित के आधार पर] टिकी है।गज़ल का हर शे‘र अपने आप में सम्पूर्ण तो होता ही है,
वह श्रोता या पाठक को अद्भुत,आकर्षक,अनजाने और एक निराले अर्थपूर्ण अनुभव तक ले आने में सक्षम होता है।
देखें कुछ उदाहरण

चाँद चौकीदार बनकर नौकरी करने लगा
उसके दरवाजे के बाहर रोशनी करने लगा

चाँद को चौकीदार केवल गज़ल का शायर ही बना सकता है

बाल खोले नर्म सोफ़े पर पड़ी थी इक परी
मेरे अन्दर एक फ़रिश्ता खुद्कुशी करने लगा

अब बतलाएं फ़रिश्ते को खुद्कुशी करवाना शायर ,गज़ल के शायर् के अलावा और किसके वश में है
ऐसा विचित्र एवम चमत्कृत करने वाला अनुभव साहित्य की किस विधा में मिल सकता है
कुछ और उदाहरण देखें
तुझे बोला था आँखे बंद रखना
खुली आँखों से धोखा खा गया ना
मेरे मरने पे कब्रिस्तान बोला
बहुत इतरा रहा था आ गया ना
(जनाब-महेश दर्पण)
मित्रो एक बात और गज़ल की सारी कमनीयता,सौष्ठव व चमत्कृत करने की क्षमता बहर या छंद पर ही टिकी है.
हम कह सकते हैं कि गज़ल शब्दों की कलात्मक बुनकरी है ।
अगर हम उपरोक्त शेर को बह्र के बिना लिखें
मरने पे मेरे कब्रिस्तान बोला
इतरा रहा था
बहुत आ गया ना

आप ही कहें सारे शब्द वही हैं ,केवल उनका थोड़ा सा क्रम बदलने से क्या वह आनन्द जो पहली बुनकरी में था,गायब नहीं हो गया।बस इसी लिये बहर का ज्ञान आवश्यक है



अगली बार हम बह्रों की बात करेंगे।आप अपनी टिपण्णी दें।गज़ल के विद्वान इस लेख में अगर कुछ त्रुटि पायें तो
उसे ठीक करने हेतु लिखें ।हम उनके आभारी होंगे

गज़ल बनाम गज़लकार

दोस्तो !
यह सर्वविदित तथ्य है कि कविता का जन्म संसार की सभी भाषाओं में छंद के रूप में हुआ तथा छान्दसिक कविता ने न केवल कविता को अपितु हर भाषा एवं संस्कृति को समृद्ध क्या और संस्कृतियों के इतिहास को भी सहेज-समेट कर रखा है।
पिछले कुछ बरसों से मुक्तछंद बनाम छंदमुक्त कविता ने श्रोता तथा पाठकों को कविता से इतना विमुख कर दिया था कि कविता की मृत्यु की घोषणा होने लगी थी ।
श्रोता,पाठकों को ही नहीं अपितु कविता तथा कवियों को भी नवजीवन देने का श्रेय निःसन्देह गज़ल को जाता है।आज हर भाषा में गज़ल लिखी जा रही है,सुनी-पढी जा रही है।
इसके पीछे एक कारण जहां इसका गेय होना है, वहीं गज़ल के हर शे’र में अलग बात कहने की सुविधा है और यह केवल सुविधा ही नहीं गज़ल का आवश्यक अंग भी है ।
एक और जहां गज़ल सर्वसाधारण की चहेती बन रही है ,वहीं गज़ल व उर्दू भाषा के तथाकथित पैरोकार या स्वयंभू ठेकेदार गज़ल को दुरूह बनाने में जुटे हैं और नवगज़लकारों को अरबी-फ़ारसी शब्दों के जाल में उलझाकर भटका रहे हैं।
यह ब्लाग गज़ल-प्रेमियों को न केवल एक मंच देने ,बल्कि गज़ल की बारीकियों को सरल सहज ढंग से समझाने का प्रयास भर है। आप सभी का इस पर स्वागत है ।हम यह भी चाहेंगे कि गज़ल के विद्वान अगर इसमें कुछ सुधार की जरूरत महसूस करें तो निसंकोच अपनी सलाह टिप्पणी में लिखें अगर ठीक पाई गई तो उसे मूल लेख में लिखा जायेगा और हम ऐसे विद्वानो के अनुग्रहित होंगे
हम शुरूआत गज़ल के प्रारूप से करेंगे

समझें रुक्नों के समकक्ष हिन्दी शब्द

कुछ मित्र ,गज़ल छंद में प्रयुक्त फ़ारसी शब्दावली से घबरा जाते हैं उनके लिये रुक्नो [खण्डों] में हम ये समकक्ष शब्दावली दे रहे हैं केवल छंद
के ध्वनि रूप को ्समझने हेतु है,हम कोई नई शब्दवली गढ़्ने का प्रयास नहीं कर रहे।आगे चलकर केवल उर्दू रुक्न भी दिये जा रहे हैं वज्न सहित

फ़ अल= च,मन [चमन] १,२ लघु,गुरू

फ़ा= बो या आ २ गुरू
फ़ाअ या फ़ेल=बोल=२,१ गुरू,लघु
फ़ेलान= बो ला न = २२१
फ़ाइलात या फ़ाइलान=बोलचाल=२,१,२,१
फ़ाइलातुन=वो चला मन या चलचलाचल=२१२२ गुरू लघु गुरू गुरू[इस अन्तिम गुरू की जगह दो लघु यथा चल आ सकते हैं।
फ़ाइलुन=आचमन=२,१,११ या २,१,११ यहाँ२ के बाद आये लघु के बाद ,[कोमा] इस बात को बतलाता है कि यहाँ आने वाला वर्ण हर हालत में लघु
होना चाहिये स्वयंमेव या मात्रा गिरा कर जबकि इस लघु के बाद भी दो लघु हैं पर इनके बीच मे,कोमा न रहने से
इन दोलघु के स्थान पर गुरू आ सकता है पर हम यहाँ पहले और दूसरे लघु को मिला कर गुरू नहीं ला सकते,यह बात आगे आने वाले पाठ में भी जारी रहेगी यानि जिस लघुके बाद कोमा का
प्रयोग है वहाँ अनिवार्य लघु आयेगा ]

फ़,इ,लात=च,न,बोल= १,१,२१
फ़,इ,लातुन=च,न,ओमन=१,१,२११ या १,१,२२

फ़,इ,लुन=च,न,मन=१,१,११ या १,१,२

फ़ऊ=चलो= १,२
फ़ऊल=च,लो,न,=१,२,१
फ़ऊलुन= च,लोचल=१२११=१२२
फ़ेलुन= आचल=२११ या २२ [१के बाद कोमा न आने से २ यानि गुरू का प्रयोग भी उचित माना जाता है ]
[रोक बरसती इन आँखों को,मीठी यादें खारी मत कर यहाँ रो [क ब] रसती या मत कर सभी २२ हैं]

म,फ़ा,इ,ल,तुन=चला च,न,मन=१२,१,१,११ या १,२,१,१,२=लघु,गुरू,लघु,लघु,गुरू
मफ़ाइलुन=चला चमन,१,२,१,११
मफ़ाईल , फ़ ऊलान = चलाआम= १,२,२,१
मफ़ाईलुन= चला आ मन=१,२,२,२ या १,२,२,११
मफ़ऊल=मन बोल=११२.१, या २२.१,
मफ़ऊलात=मन बोला म=११२२१,या २२२,१.[यहाँ अन्तिम लघु अनिवार्य है]

मफ़ऊलातुन=मनबोलमन= ११२२११

मफ़ऊलुन=मनओमन=११२११
मुतफ़ाइलुन=चनआचमन=१,१,२,१,११=१,१,२,१,२ लघु लघु गुरू लघु गुरू [या दो लघू]
मुतफ़इलुन =च न च न मन=१,१,१,१,२ [या ११दो लघू]
मुस्तफ़इलुन=मन मन च मन=११,११ १, ११=२२ १