मिलना है गर तुझको कभी सचमुच ही ग़म से जिन्दगी तो आके फिर तू मिल अकेले में यूं हमसे जिन्दगी हाँ आज हम इनकार करते हैं तेरी हस्ती से ही खुद मौत माँगोगे, जियेंगे अपने दम से जिन्दगी हर बार ही देखा तुझे है दूर से जाते हुए इक बार तो आजा मेरे आँगन में छम से जिन्दगी
सुलझा दिया इक बार तो सौ बार उलझाया हमें पाएं हैं ग़म कितने तेरे इस पेचो-खम से जिन्दगी नाहक नहीं हैं हम इसे सीने से चिपकाये हुए इस जख्म से सीखा है क्या-क्या पूछ हमसे जिन्दगी हैं ‘श्याम’ गर मेरा नहीं, तो है पराया भी नहीं कट जाएगी अपनी तो यारो, इस भरम से जिन्दगी
मुतफ़ाइलुन= चार बार
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