Monday, May 24, 2010

चल छैंयां-छैय़ां वाली इस पीढी को तो---gazal

फूल बुरा लगता है,पान बुरा लगता है
जब टूटे दिल तो भगवान बुरा लगता है

चल छैंयां-छैय़ां वाली इस पीढी को तो
मीरा पगली और,रसखान बुरा लगता है

देव अतिथि होता होगा मेरे यार कभी
अब तो घर आया मेहमान बुरा लगता है

वक्त नया आया है,आये संस्कार नये
अब तो झूठ भला,ईमान बुरा लगता है

नव फ़्लैटों की झीनी-झीनी दीवारों में
सब कुछ सुनता सा यह कान बुरा लगता है

रिश्वत के इस अलबेले युग में,बिन रिश्वत के
मुझको काम हुआ आसान बुरा लगता है


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Monday, May 17, 2010

’मसीहा भी मुझको सजा दे गया

मुझे जिन्दगी की दुआ दे गया
मसीहा भी मुझको सजा दे गया


लगा डूबने बेखुदी में मैं जब
कोई मुझको तेरा पता दे गया


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Wednesday, May 12, 2010

हो गई फ़िर इक खता है- गज़ल

हो गई फ़िर से खता है
दिल तुझे जो दे दिया है













इश्क सचमुच इक बला है
खुद मजा है,खुद सजा है

इश्क सचमुच इक बला है
रोग भी खुद,खुद दवा है


गम से बचकर है निकलना
प्यार ही बस रास्ता है  



आ रही शायद वही है
दिल मेरा जो झूमता है


है हसीं अपनी धरा ये 
चाँद पीछे     घूमता    है



ढूंढता है ‘श्याम किसको
दिल हुआ क्या लापता है





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Monday, May 3, 2010

ये कैसी तकदीर लिखी मौला-गज़ल

ये कैसी तकदीर लिखी मौला
पावों जंजीर लिखी मौला मौला

सांसे दी ,धड़कन भी दी लेकिन
जीने की नहीं तदबीर लिखी मौला

 ढूंढ़ रहा है बेचारा रांझा
इस बार नहीं हीर लिखी मौला

नन्हे-मुन्नो की तख्ती पर क्यों
बात गुरू-गम्भीर लिखी मौला

फ़ूलो की महफ़िल में क्यों तूने
कांटो की तसवीर लिखी मौला 

श्याम सखा’ की किस्मत में तो बस
हर बार वही पीर लिखी मौला


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Tuesday, April 27, 2010

कोई तो मतलब होगा- gazal

होने को तो सब होगा
लेकिन जाने कब होगा

चाहेगा जब रब यारा
मिलना अपना तब होगा

जब तब खत लिखता है जो
कोई खैरतलब होगा

दंगो की फसलों का तो
बीज सदा मजहब होगा

नाहक मिलता वो कब है
कोई तो मतलब होगा

‘श्याम’ मिलेगा जब हमको
सचमुच यार गजब होगा


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Tuesday, April 20, 2010

वक्त मज़े में गुजरेगा- gazal

गिर-गिर कर तू सँभलना सीख
पल-पल रंग बदलना सीख

क्या पाया हँसकर अब तक
यार हसद में जलना सीख

दुनिया छलती है सबको
तू दुनिया को छलना सीख

पाँवों से सब चलते हैं
सर के बल तू चलना सीख

वक्त मज़े में गुजरेगा
हर  साँचे में ढलना सीख

हर साजिश को कर दे खाक
शोला बनकर जलना सीख

`श्याम' कभी बालक बन कर
मेले बीच मचलना सीख


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Monday, April 12, 2010

जिस्म तो तूने नवाजा, खूबसूरत है उसे

कोई मेरे जख्म सी दे, चैन आये तब कहीं

कोई मेरे गम खरीदे, चैन आये तब कहीं


जिस्म तो तूने नवाजा, खूबसूरत है उसे
गर कहीं से रूह भी दे, चैन आये तब कहीं


सूखकर सहरा हुए हैं, नैन मेरे देख तो
इनको सुख की भी नमी दे, चैन आये तब कहीं


छू रहे हैं दुश्मनों  के  हौसले आकाश को
उनको भी तू इक गमी दे चैन आये तब कहीं


है लबालब झोली मौसम की गमों से भर रही
फूलों को भी तू हँसी दे, चैन आये तब कहीं


हैं लगी लाशें भी अपना चैन खोने आजकल
मौत को भी जिंदगी दे चैन आये तब कहीं


अश्क तो तूने बहुत मुझको दिये हैं ऐ खुदा
पर लबों को तू हँसी दे चैन आये तब कहीं





फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन, फ़ाइलुन

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Tuesday, April 6, 2010

रोज लड़े हम तुम--gazal

राहत के दो पल
आंखो से ओझल

रोज लड़े हम तुम
निकला कोई हल

न्यौता देतीं नित
दो आंखे चंचल





झेल नहीं पाए
हम अपनो के छल

भीड़ भरे जग से
दूर कहीं ले चल

मौन तुझे पाकर
चुप है कोलाहल

कितने गहरे हैं
रिश्तों के दलद्ल

`श्याम' मिलेंगे ही
आज नहीं तो कल

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Wednesday, March 31, 2010

फ़रेब छल,झूठ आप रखिये सँभाल साहिब-gazal

रहेंगे हम, घर में अपने ही मेहमान कब तक
रखेंगे यूं बन्द ,लोग अपनी जुबान कब तक

फ़रेब छल,झूठ आप रखिये सँभाल साहिब
भरोसे सच के भला चलेगी दुकान कब तक

चलीं हैं कैसी ये नफ़रतों की हवायें यारो
बचे रहेंगे ये प्यार के यूं मचान कब तक

हैं कर्ज सारे जहान का लेके बैठे हाकिम
चुकाएगा होरी,यार इनका लगान कब तक

इमारतों पर इमारतें तो बनायी तूने
करेगा तामीर प्यार का तू मकान कब तक

रही है आ विश्व-भ्रर से कितनी यहां पे पूंजी
मगर रहेंगे लुटे-पिटे हम किसान कब तक

रहेगा इन्साफ कब तलक ऐसे पंगु बन कर
गवाह बदलेंगे आखिर अपना बयान कब तक

दुकान खोले कफ़न की बैठा है 'श्यम' तो अब
भला रखेगा 'वो' बन्द अपने मसान कब तक


मफ़ाइलुन फ़ा,मफ़ाइलुन फ़ा,मफ़ाइलुन फ़ा



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Tuesday, March 23, 2010

खुदकुशी ठान ली चिरागों ने-गज़ल



 दिल में लेकर जो  प्यास बैठीं हैं
क्यों समन्दर के पास बैठी हैं

 

पालकी के यूं पास बैठी हैं
सारी सखियां उदास बैठी है

खुदकुशी ठान ली चिरागों ने
ऑंधियां बदहवास बैठी हैं


मौत ने खत्म कर दिये शिकवे
सौतनें आस पास बैठी हैं

बेटे आफ़िस,बहुएं गईं दफ़्तर
घर सँभाले तो सास बैठी हैं

हो गई खत्म नस्ल रांझों की
हीर सारी उदास बैठी हैं

‘श्याम’ के आसपास बैठी हैं
गोपियां कर के रास बैठी हैं

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Monday, March 15, 2010

मत जुबाँ सी, अरे ‘श्याम’ तू

दर्द दिल में है पर मुस्करा
साँस खुलकर ले और खिलखिला


कर्ज तेरा है तू ही चुका
सर मगर अपना तू मत झुका

हाँ गिले-शिकवे होंगे सदा
तोड़ मत प्यार का सिलसिला

गर नहीं दम कि सच कह सके
बैठ तू बन कर इक झुनझुना

मत जुबाँ सी, अरे ‘श्याम’ तू
चोट खाई है तो बिलबिला

फ़ाइलुन,फ़ाइलुन,फ़ाइलुन
2111, 2111, 2111,



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-थप्पड़-----कहानी

   

    झूठी कहानी लिखना, मेरे वश की बात नहीं है । क्योंकि झूठी कहानी लिखने वाले को, सच का गला घोंट कर मारना पड़ता है ।  वैसे सच कभी नहीं मरता । सच न पहले मरा है न आगे कभी मरेगा । मरता है सिर्फ झूठ बोलने वाला और चूंकि मैं अभी मरना चहीं चाहता इसलिए झूठी कहानियाँ नहीं लिखता ।
                                               आपने प्रेम की अनेक कहानियाँ पढ़ी होंगी और उसमें भी 'प्लेटोनिक लव' यानि वह प्रेम जिसमें शारीरिक संबन्ध नहीं होता की कहानियाँ भी पढ़ी होंगी । हो सकता है समय, मजबूरी, संस्कारों के कारण या अपनी कायरतावश या मौके की नजाकत की वजह से या किन्हीं और कतिपय कारणों से यह संबन्ध स्थापित न हुए हों । लेकिन उन स्त्री-पुरुष दोस्तों के मन में जो एक-दूसरे को चाहते रहे हैं कभी भी शारीरिक संबन्धों की इच्छा पैदा न हुई हो मैं नहीं मानता ।
                        मैं आपसे पहले ही कह चुका हूँ कि मैं झूठी कहानी नहीं कहता । उम्र के इस पड़ाव तक अनेक संबन्ध जिए हैं मैंने तथा अनेक संबन्धों में मरा भी हूँ । जो संबन्ध जितने अधिक निकट थे वे उतनी जल्दी गल-सड़ गए तथा मर गए । यह केवल मेरे साथ ही हुआ हो ऐसा नहीं है । हम में से अनेक लोग समझौतों की राख इन गन्धाते संबन्धों पर डालकर जीने का नाटक करते हुए मरते रहते हैं । हाँ, तो मैं कह रहा था कि ऐसे अनेक संबन्ध मैंने भी जिए हैं । यहाँ मैं अपने पहले संबन्ध की बात करना चाहूँगा । $िजक्र उस वक्त का है, जब हर किशोर की मसें भीगने लगती हैं । मन में एक अजीब-सी गुदगुदी होने लगती है और शरीर की बोटियाँ किसी को आलिंगन में कसने को आतुर हो उठती हैं
                             इसी तरह का परिवर्तन किशोरियों में भी आता है । उसे अंग्रेजी में 'प्यूबरटी' कहते हैं । उनके शरीर के अवयव अचानक उभरने लगते हैं । आँखें लज्जा से झुकने लगती हैं, कनखियों से हमउम्र लड़कों को देखना उनका स्वभाव बन जाता है । शरीर बार-बार चाहता है कि कोई अपनी बलिष्ठ बाहों के आलिंगन में लेकर मन की इस अबूझ प्यास को बुझा दे ।
                           सो बात उन्हीं गधा-पचीसी के दिनों की है,  जब मैं सीनियर सैकेन्डरी के इम्तिहान देकर ननिहाल आया हुआ था । उस जमाने में सभी बच्चे छुट्टियों में अपने मामा-नाना के यहाँ जाते थे । क्योंकि वही एक मात्र स्थान होता था जहाँ छुट्टियाँ आनन्द पूर्वक बिताई जा सकती थी ।  न तो माँ-बाप की डाँट-डपट की फ्रिक होती थी और न ही कोई काम-धाम बताया जाता था ।
                             मेरे बड़े मामा का लड़का सुखबीर मेरी उम्र का था । अत: हम दोनों में मित्रभाव पैदा होना स्वाभाविक था और हम बेझिझक वे सब बातें करते थे जो इस उम्र में देहाती लड़के करते हैं । हमारी बातों के विषय क्या हो सकते हैं इसके बारे में विस्तार से बताने की जरूरत नहीं है ।
                                                            क्योंकि आप समझदार व्यक्ति हैं जो मेरी कहानी पढ़ते-पढ़ते इतनी दूर तक आ पहुँचे हैं तथा या तो आप इस उम्र और हालात से गुजर चुके हैं या गुजर रहे हैं । अगर आप इस उम्र से छोटे हैं तो आप इस कहानी को आगे ना पढ़े यह मेरा आपसे विनम्र निवेदन है । वरना जिस तरह कोई प्राइमरी पास व्यक्ति सीनियर सैकेन्डरी के पाठ्ïयक्रम को नहीं समझ सकता । उसी तरह आगे की कहानी आपकी समझ और पाठ्ïयक्रम से बाहर की बात होगी । मामा का लड़का सुखबीर दसवीं फेल होकर पढऩा छोड़ चुका था और ट्रैक्टर लेना चाहता था खेती करने के लिए । जबकि मामा का विचार था कि पहले वह काम करके दिखाए फिर ट्रैक्टर ले । वह फौज में भरती होने की भी सोचता था तथा मामा के मना करने के बावजूद कोशिश भी कर चुका था । परन्तु नाकाम रहा था । रात को हम दोनों नोहरे (पुरुषों की बैठक) की छत पर सोते थे और रात जाने कब तक बतियाते रहते थे ? इधर-उधर की बात होने के बाद हमारी बातें इस उम्र के लड़कों की तरह लड़कियों पर केंद्रित हो जाती थीं । मैं चूंकि शहर से आया था इसलिए लड़कियों के बारे में इस तरह खुली-उज्जड़ बातें मुझे अच्छी नहीं लगती थी । मगर धीरे-धीरे सुखबीर ने मुझे भी अपने रंग में रंग लिया था । वह अपने खेतों में काम करने वाली अनेक स्त्रियों और लड़कियों के बारे में अपने संबन्धों की बातें बड़े चस्के लेकर करता था । मगर पड़ोस में रहने वाली फूलाँ मौसी की लड़की बिमला के हाथ न आने का मलाल उसे बहुत अधिक था ।
                                                              बिमला फौजी बाप की बेटी थी । उसके पिता का निधन एक दुर्घटना में हो चुका था और रिश्ते-नाते बिरादरी के दबाव के बावजूद फूलाँ ने अपने अनपढ़ जेठ का लत्ता ओढऩे से साफ इन्कार कर दिया था । लत्ता ओढऩा हरियाणा के गाँव-देहात में विधवा विवाह का रूप था । पति के किसी भाई से विवाह करने का एक आम रिवाज था । फूलाँ मौसी को सुखबीर मौसी इसलिए कहता था क्योंकि सुखबीर की माँ और बिमला की माँ एक ही गाँव की रहने वाली थीं और इसी रिश्ते की वजह से उसका आना-जाना फूलाँ के घर लगा रहता था । हालाँकि वह जाता बिमला की वजह से ही था । बिमला दसवीं पास करके पढऩे के लिए कालेज जाने लगी थी । कालेज मामा के गाँव से लगभग दस किलोमीटर दूर था व पढऩे वाले सभी बच्चे लोकल बस से शहर जाते थे । मैंने बिमला को देखा था, वह वास्तव में ही बड़ी सुन्दर लड़की थी । सुखबीर के बारम्बार कहने का असर था या बिमला की सुन्दरता का कि मैं चाहे-अनचाहे बिमला पर नजर रखने लगा था ।
                                  आप शायद जानते होंगे कि स्त्रियों में एक प्रकृति प्रदत्तगुण होता है कि चाहे आपकी नजर उनके किसी पिछले अंग पर ही पड़े उन्हें मालूम हो जाता है कि कोई उन्हें देख रहा है । अपने इसी गुण के कारण बिमला ने कई बार मुझे स्वयं को ताकते हुए पकड़ा भी । शुरूआत में उसकी न$जर मुझे स्वयं को धिक्कारती नजर आई । मैं थोड़ा घबरा भी गया था, मैंने उसे चोरी से देखना छोड़ा तो नहीं परन्तु कम $जरूर कर दिया था । वह कालेज से आते-जाते मेरे मामा के नोहरे के आगे से गुजरती थी । जहाँ मैं पहले बाहर बैठकर उसे देखता था वहीं अब बंद दरवाजे के सुराखों से उसे आते-जाते देखने लगा था । कुछ दिनों बाद मैंने देखा कि मुझे बाहर बैठा न पाकर वह खाली दरवाजे की तरफ झाँकने लगी थी । स्त्रियाँ अपनी उपेक्षा को सहन नहीं कर सकतीं । हालाँकि मैं बिमला की उपेक्षा नहीं कर रहा था । लेकिन हो सकता है उसे ऐसा ही महसूस हुआ हो । उधर सुखबीर मुझे उकसाता रहता था कि मैं बिमला से मित्रता करूँ  और आखिर एक दिन मेरी उससे मित्रता हो गई ।
        हुआ यूँ कि एक दिन शहर के बस अड्डे पर वह गाँव जाने के लिए खड़ी थी गाँव जाने वाली आखिरी बस जा चुकी थी मैं मोटरसाईकिल पर ननिहाल आ रहा था । जब मैंने उससे गाँव चलने के लिए कहा तो थोड़े से संकोच के बाद वह मोटरसाईकिल पर बैठ गई । उसके बाद तो सिलसिला चल पड़ा । मैं शहर के चक्कर ज्यादा लगाने लगा और वह जान-बूझकर बस का टाईम निकालने लगी ।
                     हाँ, एतिहात के तौर पर हम गाँव की पक्की सड़क से न होकर नहर की पटरी से गाँव पहुँचते थे और बिमला गाँव पहुँचने से पहले ही मोटरसाईकिल से उतर जाती थी । हवा का चिंगारी से साथ और आग का घी से साथ क्या गुल खिलाता है ये आप जानते ही हैं वही गुल खिलने लगा और एक दिन इसकी खबर का कहर मुझ पर और बिमला दोनों पर टूट पड़ा । जब बिमला ने शक जाहिर किया कि वह माँ बनने वाली है ।
        नादान उम्र की वजह से हम दोनों ने इस संभावित खतरे की ओर ध्यान नहीं दिया था अब हमारे पाँव के नीचे से धरती खिसक गई थी और सिर पर आसमान टूट पड़ा था । न तो मैं और न बिमला ही उस वक्त उस हालात में विवाह के बारे में सोच सकते थे । सुखबीर से सलाह करके फैसला हुआ कि गर्भ गिरा दिया जाए । तथा जब हम दोनों पढ़कर अपने पाँवों पर खड़े हो जाएं तो विवाह कर लें । इस वक्त तो ऐसा करना किसी भी हालात में संभव नहीं था । गाँव-देहात की जात-बिरादरी में यह बात उस जमाने में असंभव थी । मैंने और सुखबीर ने शहर में एक लेडी डाक्टर से बात की तथा एक दिन बिमला कालेज ना जाकर मेरे साथ लेडी डाक्टर के पास गई तथा अर्बाशन करवा लिया । खून अधिक बह जाने से लेडी डाक्टर छुट्टी नहीं देना चाहती थी पर मैं तथा बिमला छुट्टी करवाकर लौट चले,मजबूरी थी,भेद खुलने की । रास्ते में, मैंने अनेक बार कसम खाकर बिमला को विश्वास दिलाया कि पढ़ाई खत्म कर नौकरी लगते ही हम कोर्ट मैरिज कर लेंगे । मैं मोटरसाईकिल पर बिमला को लिए वापिस आ रहा था नहर के रास्ते से । सड़क के रास्ते से देख लिए जाने का खतरा था। खतरा तो नहर के रास्ते पर भी था मगर सड़क से कम ही था, बिमला ने खेस ओढ़ रखा था जिससे भम्र रहता कि वह मरद थी। किसी तरह गाँव पहुँचे। बिमला को गाँव के बाहर उतार कर मैं शहर आ गया । अगले दिन ननिहाल गया । दो-तीन घंटे मुश्किल से कटे तथा अपना बोरिया-बिस्तरा उठाकर घर भाग आया ।
        उस दिन के बाद मैंने मुड़कर भी ननिहाल की तरफ मुँह नहीं किया ।  ब्याह-शादी तो दूर नानी के मरने पर भी बीमारी का बहाना करके रह गया । पेट-दर्द का बहाना बहुत कारगर होता है । उसे डाक्टर भी नहीं कह सकता कि सच है कि झूठ कोई थर्मामीटर थोड़े ही है पेट दर्द नापने का । यह नहीं है कि मुझे बिमला याद  नहीं आई,  याद आई बिमला उसकी बड़ी-बड़ी शर्मीली आँखें, उसका नर्सिंग होम में बलि का बकरे सा चेहरा मेरी नींद हराम करता रहा बरसों तक।  मगर मैं उसे दिल के अन्धेरे में धकेलता रहा था । अपनी कसमें जो मैंने बिमला को दी थी, मैं कब, कैसे, भूल गया सचमुच आज तक मुझे उसका अफसोस है । 
        अब पचास पार कर जब इस शहर में कर्नल बन कर आया तो ननिहाल से अनेक लोग मिलने आते रहे कुछ फौज में भरती होने की सिफारिश लेकर कुछ महज पुराने रिश्ते नए करने तो मुझे बिमला की याद आई । पर मैं किससे पूछता? बिमला तो विधवा माँ की अकेली बेटी थी, न भाई, न बहन । एक दिन मैंने ननिहाल के गाँव जाने की ठानी । ठानी क्या पहुँच ही गया फौजी जीप में । मेले जैसा माहौल हो गया था ननिहाल में।  लगभग सारा गाँव उमड़ पड़ा था मुझसे मिलने ।  वैसे भी मैंने गाँव के लगभग दस-बारह गबरू जवान फौज में भरती करवा दिए थे ना एक ही साल में । मेरे छुटके मामा गाँव वालों से बतिया रहे थे । गाँव के अनेक जवान जहाँ आगे फौज भरती की आशा से जमा थे । वहीं अनेक अधेड़ बुजुर्ग, औरत-मरद, गाँव की बेटी के होनहार सपूत से मिलने आर्शिवाद देने पहुँचे थे ।
                       मेरी आँखें बार-बार फूलाँ  मौसी, बिमला की माँ को ढूँढ रही थीं । अधेड़ तो मौसी मेरी जवानी में ही थी अब तो बूढ़ी-फूस हो गई होंगी । मेरा दिल किया किसी से पूछूँ पर अपनी पुरानी बात याद कर हिम्मत नहीं हुई ।
                                      दो-तीन घंटे यूँ ही बिता कर मैं जीप में बैठ कर लौट रहा था कि फूलाँ मौसी, बूढ़ी-फूस फूलाँ मौसी मुझे एक पेड़ के नीचे खड़ी दिखाई दी । मुझे लगा कि जैसे वह मेरे इन्तजार में खड़ी थी । मैंने ड्राईवर को जीप रोकने को कहा और जीप से उतर कर मौसी के पास पहुँचा और उनके पैर छूते हुए कहने लगा कि मौसी आशीर्वाद दो। मगर फूला मौसी ने पैर पीछे हटा लिए । जब सिर ऊपर उठाया तो देखा कि मौसी मुझे अजीब निगाह से देख रही थी ।
                                     उसके बाएं हाथ में एक लाठी थी जिसके सहारे वह खड़ी थी, अचानक उसका दायां हाथ ऊपर उठा, मुझे लगा कि वह मेरे सिर पर हाथ रखकर आर्शीवाद देना चाहती है, मगर ये क्या हुआ कि दाएं हाथ का एक जोरदार थप्पड़ मेरे बाएँ गाल पर पड़ा । इससे पहले मैं संभलता फूला मौसी लाठी टेकती हुई झाडिय़ों में गुम हो चुकी थी । सुखबीर मेरे मामा का बेटा जो अब तक मेरे पास आ खड़ा हुआ था मेरे कंधे पर हाथ रख कर बोला,  ''रमेश! ये फूलाँ मौसी नहीं उसकी पगली बेटी बिमला है । अगर उस वक्त धरती फट जाती और मैं उसमें समा जाता तो मुझे कोई अफसोस नहीं होता । 

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Thursday, March 11, 2010

सुनकर सच कोई पास नहीं आया




मुझको झूठ कभी रास नहीं आया
 सुनकर सच कोई पास नहीं आया



समझे कौन भला  अब दुख हाकिम का
 हुक्म बजाने  को   दास नहीं आया

भूखे पेट  सदा  सोये  हम   यारो
करना लेकिन उपवास नहीं आया

पाँव  बुजुर्गों  के  दाबे  हैं   हमने
यार हुनर यह अनायास नहीं आया

ईद  दिवाली    होली  त्यौहार गए 
अम्मा हिस्से अवकाश नहीं आया 

यार महाभारत बच जाता,करना
पाँचाली को उपहास नहीं आया

आम‘ सभी बिकते  हैं   बेभाव   यहाँ 
`श्याम `कभी बिकने खास‘ नहीं आया


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Monday, March 8, 2010




मुझको झूठ कभी रास नहीं आया
 सुनकर सच कोई पास नहीं आया



समझे कौन भला  अब दुख हाकिम का
 हुक्म बजाने  को   दास नहीं आया

भूखे पेट  सदा  सोये  हम   यारो
करना लेकिन उपवास नहीं आया

पाँव  बुजुर्गों  के  दाबे  हैं   हमने
यार हुनर यह अनायास नहीं आया

ईद  दिवाली    होली  त्यौहार गए 
अम्मा हिस्से अवकाश नहीं आया 

यार महाभारत बच जाता,करना
पाँचाली को उपहास नहीं आया

आम‘ सभी बिकते  हैं   बेभाव   यहाँ 
`श्याम `कभी बिकने खास‘ नहीं आया

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Tuesday, March 2, 2010

सच बोलना आदत रही कब है मेरी



माना तेरे हाथों में कोई पत्थर न था
पर क्या तेरी हर बात में नश्तर न था


सच बोलना आदत  रही  कब  है   मेरी
पर झूठ कहने का  वहां अवसर न था

बीवी मेरी बच्चे मेरे मैं भी तो था
था तो मकां भी मेरा लेकिन घर न था

जलथल हुआ था शहर मेरे दोस्तो
बादल लेकिन वहां बरसा जमकर न था
मौजूद था महफ़िल में यूं तो“श्याम’ भी
पर उसका वो पहले जैसा  तेवर न था‘

मुस्तफ़इलुन,मुस्तफ़इलुन,मुस्तफ़इलुन






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Monday, March 1, 2010

तू आए तो मने दीवाली मेरे दिल की खोली में

 करता हूं  हर साल
तेरा इन्तजार होली में






तू आए तो मने दीवाली
मेरे दिल की खोली में













और फ़िर ऐ जानेमन
आए मुन्ना या मुन्नी
हर साल तेरी झोली में







 जो बात है तेरी आंखो में
कहां वो किसी बन्दूक की गोली में








राधा का श्याम है वो तो-मीरा का श्याम है
गोपियों मे मिल जाएगी इक आध मुझे भी
यह सोच के बना था  मैं ‘श्याम सखा’ ग्वाल टोली में







पर मीरां राधा ही नही
फ़िदा थीं सब गोपियां श्याम पर
नहीं टपका कोई हसीन आम मेरी झोली में











बुरा न माने कोई गोपी
और ‘श्याम’ जी आप भी

मुझको चढी है इस बार भी भांग होली में









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Saturday, February 27, 2010

यही तो होली की मस्ती है

  देखूं तुमको भांग जो पीके
अबीर गुलाल लगें सब फ़ीके












मोतियाबिन्दी नयनो  में काजल
्नित करता मुझको है पागल










अदन्त मुंह और हंसी तुम्हारी
इसमे दिखता ब्रह्माण्ड है प्यारी










तेरा मेरी प्यार है जारी
 जलती हमसे दुनिया सारी




क्या समझे ये दुध-मुहें बच्चे
कैसे होते प्रेमी सच्चे







दिखे न आंख को कान सुने ना
हाथ उठे ना पांव चले ना





पर मन तुझ तक दौड़ा जाए
ईलू-इलू का राग सुनाए


हंसते क्यों हैं पोता-पोती
क्या बुढापे में न मुहब्ब्त होती



सुनलो तुम भी मेरे प्यारे
कहते थे इक चच्चा हमारे



कौन कहता है बुढापे में मुहब्ब्त का सिलसिला नहीं होता
आम भी तब तक मीठा नहीं होता जब तक पिलपिला नहीं होता






होली में तो गजल-हज्ल सब चलती है
                                                      दोस्त खुश हैं जलने दो गर दुनिया जलती है
यही तो होली की मस्ती है









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Tuesday, February 23, 2010

हमने जिस जालिम को चाहा----gazal

55
दोस्त लुत्फे इन्तजार अपना यूं ही जाता रहा
हाय! वो कमबख्त हरदम वक्त पर आता रहा

जिसके भी हाथों में गुलदस्ते हम थमाते रहे
उसके ही हाथों में पत्थर बारहा आता रहा

जुल्म ढ़ाकर भी उसे था इस कदर हम पर यकीं
अपने हक में वो गवाही हमसे दिलवाता रहा

वो था मानिन्दे कसम तो मैं भी वादे की तरह
बारी-बारी वक्त, हम दोनो को चटकाता रहा

बात उसकी तो हर इक थी अपने सर-माथे.मगर
मेरी हर अर्जे-तमन्ना पर वो झुंझलाता रहा

ऐ मुहब्बत! मेहरबानी खूब है हम पर तेरी
हमने जिस जालिम को चाहा,वो ही तड़पाता रहा

‘श्याम’बज़्मे-जिन्दगी में इक शिकस्ता दिल लिये
बांसुरी पर दिल की,नग्मे दर्द के गाता रहा



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Friday, February 19, 2010

जिसको भी मारा अपनो ने मारा है-gazal

१२१

खारा है सागर सचमुच खारा है 

नदिया ने फ़िर भी सब कुछ वारा है

सातों के सातों सुर हैं उसकी मुठ्ठी में
कहने को वो बेचारा इक तारा है

जीत सदा सच की होती कहने भर को
सच बेचारा द्वापर में भी हारा है

बेशक यह  सुन्दर और गठीली भी है
देह मगर कहते सांसो की कारा है


यह तो
कोई बात नहीं  है श्याम नई
जिसको भी मारा अपनो ने मारा है


फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ा

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Monday, February 15, 2010

मेरी जां मुझको बस अपना कहो ना-gazal


नहीं कहना अगर सहरा को सहरा

वही किस्सा पुराना सा कहो ना
बहुत प्यारा है दोबारा कहो ना


नहीं कहना अगर सहरा को सहरा

इसे तुम रेत का दरिया कहो ना


जरूरत है कहां रिश्तों की हमको

मेरी जां  मुझको बस अपना कहो ना


नहीं अच्छा घुमाकर बात करना

जो भी कहना है बस सीधा कहो ना


मिले हैं आज हम तुम जो अचानक
है 
ये सच या कोई सपना कहो ना

सदा जो नाचती बंशी की धुनपर

उसे राधा कहो श्यामा कहो ना


फ़िरे है श्याम खुद को ढूंढ़ता सा
उसे पागल या दीवाना कहो ना


मफ़ाएलुन,मफ़ाएलुन,फ़ऊलुन


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