Friday, February 18, 2011

क्यों रुलाऊं धूप को- गज़ल किशन तिवारी

 आज मै अपने मित्र प्रसिद्ध गीतकार किशन तिवारी की गज़ल जो मुझे बहुत पसन्द है पोस्ट कर रहा हूं- देखें आपको कैसी लगती है

 चाहता हूँ भींचकर मुट्ठी में बांधू धूप को
धूप के बदले में केवल चाहता हूं धूप को

वो बुलाती   मुझको आंगन में कभी छत पर कभी
 सोचता हूं मैं कभी घर में बुलाऊं धूप को

 मुस्कराती है कभी हँसती ठहाका मारकर
मैं सुना अपनी कहानी क्यों रुलाऊं धूप को

मैं कभी बेचैन होता हूं  बहुत जब रात  को
है बहुत  हारी थकी अब क्यों जगाऊं धूप को

आपने चाहा मिटा दें रोशनी का ही वजूद
मेरी कोशिश है कि मैं बच्चों में बांटू धूप को




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Sunday, February 13, 2011

ये चुपके-चुपके ही आ बैठता है बस दिल में -गज़ल

१०n

उसे वहाँ कोई अपना नजर नहीं आता
तभी तो देर तलक वो भी घर नहीं आता

हमारे बीच ये दीवार क्यों है आन खड़ी
उधर मैं जाता नहीं,वो इधर नहीं आता

हमेशा जाती है मिलने नदी समुन्दर से
समुन्दर उससे तो मिलने मगर नहीं आता


 

तुझे है मुझसे मुहब्ब्त मैं मान लूँ कैसे
तेरी नजर में वो मंजर नजर नहीं आता

ये चुपके-चुपके ही आ बैठता है बस दिल में      
कि रंजो-ग़म कभी  देकर खबर नहीं आता

मैं खुद ही उससे मुलाकात को हूँ चल देता
कि मुझसे मिलने कभी ग़म अगर नहीं आता

हुई क्या बात कोई तो बताये ‘श्याम’ हमें
क्यों रात-रात तू घर लौटकर नहीं आता

 

मफ़ाइलुन. फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन

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Saturday, February 5, 2011

वक्त ने कुछ इस तरह मुझको छला था-gazal

 9[म.ऋ]

जिन्दगी को जिन्दगी से छीनना था
मौत का कैसा हसीं ये हौसला था


वक्त ने कुछ इस तरह मुझको छला था
था कभी मैं आदमी अब बुलबुला था

 हाय जादू कैसा ,तेरे हुस्न का था]
देखकर हर कोई जिसको मर मिटा था

थी जमीं महफ़िल वहाँ शे’रो-सुखन की
शे‘र जो भी था वो साँचे में ढला था   

रूठना मेरा      मनाना रोज उसका
सोचिये कितना हसीं वो सिलसिला था

बन रहा था सख्तजां बाहर से लेकिन
वो तो अन्दर से सरासर मोम सा था

थी हर इक रुख पर हँसी चिपकी हुई-सी
पर हर इक दिल में ही पसरा कर्बला था

उनकी महफिल का बयां अब क्या करें हम
जो भी था बजता हुआ इक झुनझुना था

सोचते होंगे     कभी वो भी तो यारब
‘श्याम’ को बरबाद करके क्या मिला था


फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,



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Sunday, January 30, 2011

तुम तो पहलू में थे मगर-gazal


इतने नाजुक  सवाल मत पूछो
क्यों हूँ   बरबादहाल मत पूछो

बात है    गाँव की तबाही की
बाढ़ थी या  अकाल मत पूछो

करो तदबीर   अब निकलने की
किसने डाला था जाल मत पूछो

तेग का वार,  गैर का था मगर
किसने छीनी थी ढाल मत पूछो

काम क्या आई धुप अँधेंरो में
जुगनुओं की मशाल मत पूछो

वक्त ने जिन्दगी को बख्शे हैं
कैसे -कैसे  वबाल मत पूछो

तुम भला क्या शिकस्त दे पाते
थी ये अपनों की चाल मत पूछो

देखकर    खुशगवार मौसम को
मन है कितना निहाल मत पूछो

तुम तो पहलू में थे मगर फिर भी
गम हुऐ   क्यों बहाल  मत पूछो

कैसे गुम हो गया शहर आकर
वो सितारों का थाल मत पूछो

श्यामसे पूछ लो जमाने की
सिर्फ उसका ही हाल मत पूछो 
[ फ़ाइलातुन,मफ़ाइलुन,फ़ेलुन ]



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Monday, January 24, 2011

उम्र गीली हो गई अपनी धुआं-सी जिन्दगी


7

भीड़ में रह कर भी है खाली मकां-सी जिन्दगी
दोस्तो हमको लगी है    इम्तिहां-सी जिन्दगी

लाश की मानिन्द ढोती   तू रही अक्सर मुझे
झाड़ कर पल्ला है क्यां हैरतकुनां-सी जिन्दगी

क्यों भटकती फिर रही है जा--जा कुछ तो बता
करके घर तामीर भी है   तू दुकां-सी जिन्दगी

गिर गये हैं जब से हम तेरी निगाहों से सनम
है लगे हमको तो अपनी  बदगुमां-सी जिन्दगी

गुफ्तगू जब से हुई है   खत्म अपनी, आपसे
रह गई है बन के गूंगे  का बयां-सी जिन्दगी

गाँव से आई थी, तोहफा सादगी का तब थी तू
शहर आकर  हो गई   तू हुक्मरां-सी जिन्दगी

थी तमन्नाश्यामकी बन शमअ-सा जलता रहे
उम्र गीली  हो गई अपनी     धुआं-सी जिन्दगी

फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलु


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Monday, January 17, 2011

इस जख्म से सीखा है क्या-क्या पूछ.......गज़ल

4
मिलना है गर तुझको कभी सचमुच ही ग़म से जिन्दगी
तो आके फिर तू मिल अकेले में ही हमसे जिन्दगी

हाँ आज हम इनकार करते हैं तेरी हस्ती को ही
खुद मौत माँगेंगे, जियेंगे अपने दम से जिन्दगी

हर बार ही देखा तुझे है दूर से जाते हुए
इक बार तो आजा मेरे आँगन में छम से जिन्दगी

सुलझा दिया इक बार तो सौ बार उलझाया हमें
पाएं हैं ग़म कितने तेरे इस पेचो-खम से जिन्दगी

नाहक नहीं हैं हम इसे सीने से चिपकाये हुए
इस जख्म से सीखा है क्या-क्या पूछ हमसे जिन्दगी

हैं ‘श्याम’ गर मेरा नहीं, तो है पराया भी नहीं
कट जाएगी अपनी तो यारो, इस भरम से जिन्दगी


मुस्तफ़इलुन= चार बार 


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Wednesday, January 12, 2011

यूँ थिरकती, महकती क्या ये हवा -gazal

6  [म.ऋ]

आस इक भी अगर फली होती
जिन्दगी तू बहुत भली होती

यूँ थिरकती, महकती क्या ये हवा
बगिया माली ने गर छली होती

मांग लेते तुझे सितारों से
उसके आगे अगर चली होती

ढलती आँसू की बूंद मोती में
जो न अच्छी घड़ी टली होती

स्नेह-भर जो हमें मिला होता 


फिर न कोई कमी खली होती

कोसता मैं न अपनी किस्मत को
गर मिली यार की गली होती

 शोख-चंचल मेरी तबियत हैं  
 लेखनी क्यों न  मनचली होती

कौन झुकता यूँ तेरे आगे ‘श्याम’
 उम्र तेरी जो न  ढली होती


फ़ाइलातुन,मफ़ाइलुन,फ़ेलुन


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Monday, January 10, 2011

फ़ुटकर शे‘र- श्याम सखा ‘श्याम’

जो शख्स दर्द की आबो-हवा को जानता है
वही तो आज के दौरे-खुदा को जानता है
है देखलेता है बिना खोले ही जो जख़्मो को
वही हरेक मरज़ की दवा को जानता है

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Tuesday, January 4, 2011

सादगी को कौन पूछे है यहाँ अब-gazal

 3

जिन्दगी है जब मियाँ तो गम भी होंगे
आज ज्यादा हैं तो कल ये कम भी होंगे

इन्तजार अब तो कयामत का हमें है
मौला होगा, तुम भी होंगे, हम भी होंगे

जिन्दगी होगी सुहानें गीत होंगे
आ गई गर मौत तो मातम भी होंगे

मेरे नग्मो में घुले- हैं रंजो-ग़म वो
सुनके जिनको नयन सबके नम भी होंगे

सादगी को कौन पूछे है यहाँ अब
गेसुओं में उसके पेचो-खम भी होंगे

है रकीबों का बसेरा गर यहाँ पर
साथ उनके  तो मेरे हमदम भी होंगे

हो गया चिथड़े सभी के साथ वो भी
बाँधे उसने तन पे अपने बम भी होंगे


फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन


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Thursday, December 30, 2010

है नया अन्दाज दिलबर तेरा--गज़ल

2

जिन्दगी से इक दुआ मांगी थी
मौत कब हमने भला मांगी थी

मौत से हमने दया मांगी थी
याने हाकिम से सजा मांगी थी

रूठ क्यों हमसे गई तू हवा
चुलबुली-सी इक अदा मांगी थी

है नया अन्दाज दिलबर तेरा
बेवफाई दी वफा मांगी थी

खिड़कियाँ सब खोल दीं उसने तो
रोशनी कुछ, कुछ हवा मांगी थी

बख्श दी क्यों मौत ही मौला
हमने तो तुमसे दवा मांगी थी

क्यों गिला तुमसे करेंश्याम हम
क्यों घुटन दे दी हवा मांगी थी
फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन, फ़ेलुन









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Saturday, December 25, 2010

ख्वाब बेगाने न दे मौला -गज़ल

1
गर खुदा खुद से जुदाई दे
कोई क्यों अपना दिखाई दे

काश मिल जाये कोई अपना
रंजो-गम से जो रिहाई दे

जब न काम आई दुआ ही तो
कोई फिर क्योंकर दवाई दे

ख्वाब बेगाने न दे मौला
नींद तू बेशक पराई दे

तू न हातिम या फरिश्ता है
कोई क्यों तुझको भलाई दे

डूबने को हो सफीना जब
क्यों किनारा तब दिखाई दे

आँख को बीनाई दे ऐसी
हर तरफ बस तू दिखाई दे

साथ मेरे तू अकेला हो
अपनी ही बस आश्नाई दे


फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन


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Sunday, December 19, 2010

देख लो तुम मुझे सजा देकर- गज़ल

5 [म.ऋ]
आज कुछ कर गुजरने वाला हूँ
बन के खुशबू बिखरने वाला हूँ

तोड़ दो कसमें, दो भुला वादे
मैं तो खुद भी मुकरने वाला हूँ

टूटकर बिखरा हूं इस तरह यारो
अब कहाँ मैं संवरने वाला हूँ


जिन्दगी कर दे हसरतें पूरी
खुदकुशी अब मैं करने वाला हूँ

देख लो तुम मुझे सजा देकर
मै भला कब सुधरने वाला हूँ


फ़ाइलातुन,मफ़ाइलुन,फ़ेलुन



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Wednesday, December 1, 2010

गुल गुलामी करे है मौसम की- दो शे‘र

सुनते हैं दिल में प्यार रहता है
फ़िर भी दिल बेकरार रहता है
गुल गुलामी करे है मौसम की
मस्त हर वक्त खार रहता है

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Monday, November 29, 2010

एक फुट्कर शेर

सुनते हैं दिल में प्यार रहता है
फ़िर भी दिल बेकरार रहता है
गुल गुलामी करे है मौसम की
मस्त हर वक्त खार रहता है
 




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Tuesday, September 21, 2010

बेवफ़ाई थी उसकी फ़ितरत में - gazal

 जिन्दगी कब है मो‘तबर बाबा
ये तो है आरज़ी सफ़र   बाबा

बेवफ़ाई थी उसकी फ़ितरत में
जान दी हमने  जानकर बाबा

मेरे अश्कों मेरे नालों का
आप पर भी हुआ असर बाबा

जिसके साये में प्यार पलता है
काट देंगे वही शजर  बाबा

खुशियां घटती नहीं हैं बँटने से
दर्द बढ़ता है   फ़ैलकर   बाबा

`श्याम’सच्चा है,सीधा सादा है
इसको आता नहीं हुनर बाबा

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Thursday, September 9, 2010

सबको खूब खला था वो- गज़ल

सबको खूब खला था वो
मानुष एक भला था वो

काटा जितनी बार गया
उतनी बार फला था वो

रीझ गई वृषभानुलली
आखिर नन्दलला था वो

जिसने जैसा ढाला था
वैसा ठीक ढ़्ला था वो

मन्जिल खुद ही आ पहुंची
गिर-गिर कर संभला था वो

सबके गम लेकर भागा
कह्ते सब पगला था वो

याद करे है अब भी ‘श्याम’
यू इक बार मिला था वो

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Thursday, August 26, 2010

दुनिया-भर के ग़म थे/ और अकेले हम थे-gazal


दुनिया-भर के ग़म थे
और अकेले हम थे

साथ न कैसे देते
ग़म भी आखिर ग़म थे

टीस बहुत थी सुर में
बस स्वर ही मद्घम थे

खुशियाँ दूर सदा ही
ग़म  मेरे हमदम थे

सपने भंग हुए क्या
दिल दरहम-बरहम थे

आँखें तो गीली थीं
सूखे मन-मौसम थे

'श्याम’ सँवरते कैसे
सब किस्मत के खम थे

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Thursday, August 19, 2010

काश मिल जाये कोई अपना -gazal


1
गर खुदा खुद से जुदाई दे
कोई क्यों अपना दिखाई दे

काश मिल जाये कोई अपना
रंजो-गम से जो रिहाई दे

जब न काम आई दुआ ही तो
कोई फिर क्योंकर दवाई दे

ख्वाब बेगाने न दे मौला
नींद तू बेशक पराई दे

तू न हातिम या फरिश्ता है
कोई क्यों तुझको भलाई दे

डूबने को हो सफीना जब
क्यों किनारा तब दिखाई दे

आँख को बीनाई दे ऐसी
हर तरफ बस तू दिखाई दे

साथ मेरे तू अकेला हो
अपनी ही बस आश्नाई दे

फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन फ़ा



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Tuesday, August 10, 2010

मैं गुनहगार न होता तो फरिश्ता होता-गज़ल

ख्वाब हर हाल में है यार भला सा होता
मैं गुनहगार न होता तो फरिश्ता होता

टूटता घर न हमारा यूं कभी भी जानम
दिल में तेरे भी अगर प्यार जरा सा होता

चाँद जैसा है बदन झील सी तेरी आंखें
तुझ पे हर कोई फिदा होता न तो क्या होता

तू चली आती है छत पर जो अकेली जानम
चाँद को ख्वाब सरीखा सा है धोखा होता

जिन्दगी भर है जिसे ख्वाब में पूजा मैने
रूबरू होता अगर वो तो करिश्मा होता

यार इलजाम भला  क्या  तू लगाता मुझपर
झांक कर दिल में कभी अपने  जो देखा होता


क्या बिगड़ते यूं सभी काम तुम्हारे हमदम
बात करने का अगर तुमको सलीका होता

बेवफ़ा‘श्याम’अगर होता नहीं  जो यारो
आठवां फिर तो वो दुनिया  का अजूबा होता


फ़ाइलातुन,फ़इलातुन.फ़इलातुन ,फ़ेलुन


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Sunday, August 1, 2010

चल रहा हूं अकेला दोस्तो= गज़ल

 खुशबुओं का सफर है जिन्दगी
अजनबी सी मगर है जिन्दगी

फ़िक्र तेरी मेरी सभी की है
खुद से पर बेखबर है जिन्दगी

साँस धड़कन ही सिर्फ है नहीं
 है कलेजा जिगर है जिन्दगी

सुर्खियों की ललक ने दी बना
हादसों की खबर है जिन्दगी

 औरतों के नसीब से लगा
बेबसी का नगर है जिन्दगी

चल रहा हूं अकेला दोस्तो
अब कहां हमसफर है जिन्दगी

मौत मन्जिल अगर है”श्याम जी’
साँस की बस डगर है जिन्दगी



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