Monday, March 15, 2010

-थप्पड़-----कहानी

   

    झूठी कहानी लिखना, मेरे वश की बात नहीं है । क्योंकि झूठी कहानी लिखने वाले को, सच का गला घोंट कर मारना पड़ता है ।  वैसे सच कभी नहीं मरता । सच न पहले मरा है न आगे कभी मरेगा । मरता है सिर्फ झूठ बोलने वाला और चूंकि मैं अभी मरना चहीं चाहता इसलिए झूठी कहानियाँ नहीं लिखता ।
                                               आपने प्रेम की अनेक कहानियाँ पढ़ी होंगी और उसमें भी 'प्लेटोनिक लव' यानि वह प्रेम जिसमें शारीरिक संबन्ध नहीं होता की कहानियाँ भी पढ़ी होंगी । हो सकता है समय, मजबूरी, संस्कारों के कारण या अपनी कायरतावश या मौके की नजाकत की वजह से या किन्हीं और कतिपय कारणों से यह संबन्ध स्थापित न हुए हों । लेकिन उन स्त्री-पुरुष दोस्तों के मन में जो एक-दूसरे को चाहते रहे हैं कभी भी शारीरिक संबन्धों की इच्छा पैदा न हुई हो मैं नहीं मानता ।
                        मैं आपसे पहले ही कह चुका हूँ कि मैं झूठी कहानी नहीं कहता । उम्र के इस पड़ाव तक अनेक संबन्ध जिए हैं मैंने तथा अनेक संबन्धों में मरा भी हूँ । जो संबन्ध जितने अधिक निकट थे वे उतनी जल्दी गल-सड़ गए तथा मर गए । यह केवल मेरे साथ ही हुआ हो ऐसा नहीं है । हम में से अनेक लोग समझौतों की राख इन गन्धाते संबन्धों पर डालकर जीने का नाटक करते हुए मरते रहते हैं । हाँ, तो मैं कह रहा था कि ऐसे अनेक संबन्ध मैंने भी जिए हैं । यहाँ मैं अपने पहले संबन्ध की बात करना चाहूँगा । $िजक्र उस वक्त का है, जब हर किशोर की मसें भीगने लगती हैं । मन में एक अजीब-सी गुदगुदी होने लगती है और शरीर की बोटियाँ किसी को आलिंगन में कसने को आतुर हो उठती हैं
                             इसी तरह का परिवर्तन किशोरियों में भी आता है । उसे अंग्रेजी में 'प्यूबरटी' कहते हैं । उनके शरीर के अवयव अचानक उभरने लगते हैं । आँखें लज्जा से झुकने लगती हैं, कनखियों से हमउम्र लड़कों को देखना उनका स्वभाव बन जाता है । शरीर बार-बार चाहता है कि कोई अपनी बलिष्ठ बाहों के आलिंगन में लेकर मन की इस अबूझ प्यास को बुझा दे ।
                           सो बात उन्हीं गधा-पचीसी के दिनों की है,  जब मैं सीनियर सैकेन्डरी के इम्तिहान देकर ननिहाल आया हुआ था । उस जमाने में सभी बच्चे छुट्टियों में अपने मामा-नाना के यहाँ जाते थे । क्योंकि वही एक मात्र स्थान होता था जहाँ छुट्टियाँ आनन्द पूर्वक बिताई जा सकती थी ।  न तो माँ-बाप की डाँट-डपट की फ्रिक होती थी और न ही कोई काम-धाम बताया जाता था ।
                             मेरे बड़े मामा का लड़का सुखबीर मेरी उम्र का था । अत: हम दोनों में मित्रभाव पैदा होना स्वाभाविक था और हम बेझिझक वे सब बातें करते थे जो इस उम्र में देहाती लड़के करते हैं । हमारी बातों के विषय क्या हो सकते हैं इसके बारे में विस्तार से बताने की जरूरत नहीं है ।
                                                            क्योंकि आप समझदार व्यक्ति हैं जो मेरी कहानी पढ़ते-पढ़ते इतनी दूर तक आ पहुँचे हैं तथा या तो आप इस उम्र और हालात से गुजर चुके हैं या गुजर रहे हैं । अगर आप इस उम्र से छोटे हैं तो आप इस कहानी को आगे ना पढ़े यह मेरा आपसे विनम्र निवेदन है । वरना जिस तरह कोई प्राइमरी पास व्यक्ति सीनियर सैकेन्डरी के पाठ्ïयक्रम को नहीं समझ सकता । उसी तरह आगे की कहानी आपकी समझ और पाठ्ïयक्रम से बाहर की बात होगी । मामा का लड़का सुखबीर दसवीं फेल होकर पढऩा छोड़ चुका था और ट्रैक्टर लेना चाहता था खेती करने के लिए । जबकि मामा का विचार था कि पहले वह काम करके दिखाए फिर ट्रैक्टर ले । वह फौज में भरती होने की भी सोचता था तथा मामा के मना करने के बावजूद कोशिश भी कर चुका था । परन्तु नाकाम रहा था । रात को हम दोनों नोहरे (पुरुषों की बैठक) की छत पर सोते थे और रात जाने कब तक बतियाते रहते थे ? इधर-उधर की बात होने के बाद हमारी बातें इस उम्र के लड़कों की तरह लड़कियों पर केंद्रित हो जाती थीं । मैं चूंकि शहर से आया था इसलिए लड़कियों के बारे में इस तरह खुली-उज्जड़ बातें मुझे अच्छी नहीं लगती थी । मगर धीरे-धीरे सुखबीर ने मुझे भी अपने रंग में रंग लिया था । वह अपने खेतों में काम करने वाली अनेक स्त्रियों और लड़कियों के बारे में अपने संबन्धों की बातें बड़े चस्के लेकर करता था । मगर पड़ोस में रहने वाली फूलाँ मौसी की लड़की बिमला के हाथ न आने का मलाल उसे बहुत अधिक था ।
                                                              बिमला फौजी बाप की बेटी थी । उसके पिता का निधन एक दुर्घटना में हो चुका था और रिश्ते-नाते बिरादरी के दबाव के बावजूद फूलाँ ने अपने अनपढ़ जेठ का लत्ता ओढऩे से साफ इन्कार कर दिया था । लत्ता ओढऩा हरियाणा के गाँव-देहात में विधवा विवाह का रूप था । पति के किसी भाई से विवाह करने का एक आम रिवाज था । फूलाँ मौसी को सुखबीर मौसी इसलिए कहता था क्योंकि सुखबीर की माँ और बिमला की माँ एक ही गाँव की रहने वाली थीं और इसी रिश्ते की वजह से उसका आना-जाना फूलाँ के घर लगा रहता था । हालाँकि वह जाता बिमला की वजह से ही था । बिमला दसवीं पास करके पढऩे के लिए कालेज जाने लगी थी । कालेज मामा के गाँव से लगभग दस किलोमीटर दूर था व पढऩे वाले सभी बच्चे लोकल बस से शहर जाते थे । मैंने बिमला को देखा था, वह वास्तव में ही बड़ी सुन्दर लड़की थी । सुखबीर के बारम्बार कहने का असर था या बिमला की सुन्दरता का कि मैं चाहे-अनचाहे बिमला पर नजर रखने लगा था ।
                                  आप शायद जानते होंगे कि स्त्रियों में एक प्रकृति प्रदत्तगुण होता है कि चाहे आपकी नजर उनके किसी पिछले अंग पर ही पड़े उन्हें मालूम हो जाता है कि कोई उन्हें देख रहा है । अपने इसी गुण के कारण बिमला ने कई बार मुझे स्वयं को ताकते हुए पकड़ा भी । शुरूआत में उसकी न$जर मुझे स्वयं को धिक्कारती नजर आई । मैं थोड़ा घबरा भी गया था, मैंने उसे चोरी से देखना छोड़ा तो नहीं परन्तु कम $जरूर कर दिया था । वह कालेज से आते-जाते मेरे मामा के नोहरे के आगे से गुजरती थी । जहाँ मैं पहले बाहर बैठकर उसे देखता था वहीं अब बंद दरवाजे के सुराखों से उसे आते-जाते देखने लगा था । कुछ दिनों बाद मैंने देखा कि मुझे बाहर बैठा न पाकर वह खाली दरवाजे की तरफ झाँकने लगी थी । स्त्रियाँ अपनी उपेक्षा को सहन नहीं कर सकतीं । हालाँकि मैं बिमला की उपेक्षा नहीं कर रहा था । लेकिन हो सकता है उसे ऐसा ही महसूस हुआ हो । उधर सुखबीर मुझे उकसाता रहता था कि मैं बिमला से मित्रता करूँ  और आखिर एक दिन मेरी उससे मित्रता हो गई ।
        हुआ यूँ कि एक दिन शहर के बस अड्डे पर वह गाँव जाने के लिए खड़ी थी गाँव जाने वाली आखिरी बस जा चुकी थी मैं मोटरसाईकिल पर ननिहाल आ रहा था । जब मैंने उससे गाँव चलने के लिए कहा तो थोड़े से संकोच के बाद वह मोटरसाईकिल पर बैठ गई । उसके बाद तो सिलसिला चल पड़ा । मैं शहर के चक्कर ज्यादा लगाने लगा और वह जान-बूझकर बस का टाईम निकालने लगी ।
                     हाँ, एतिहात के तौर पर हम गाँव की पक्की सड़क से न होकर नहर की पटरी से गाँव पहुँचते थे और बिमला गाँव पहुँचने से पहले ही मोटरसाईकिल से उतर जाती थी । हवा का चिंगारी से साथ और आग का घी से साथ क्या गुल खिलाता है ये आप जानते ही हैं वही गुल खिलने लगा और एक दिन इसकी खबर का कहर मुझ पर और बिमला दोनों पर टूट पड़ा । जब बिमला ने शक जाहिर किया कि वह माँ बनने वाली है ।
        नादान उम्र की वजह से हम दोनों ने इस संभावित खतरे की ओर ध्यान नहीं दिया था अब हमारे पाँव के नीचे से धरती खिसक गई थी और सिर पर आसमान टूट पड़ा था । न तो मैं और न बिमला ही उस वक्त उस हालात में विवाह के बारे में सोच सकते थे । सुखबीर से सलाह करके फैसला हुआ कि गर्भ गिरा दिया जाए । तथा जब हम दोनों पढ़कर अपने पाँवों पर खड़े हो जाएं तो विवाह कर लें । इस वक्त तो ऐसा करना किसी भी हालात में संभव नहीं था । गाँव-देहात की जात-बिरादरी में यह बात उस जमाने में असंभव थी । मैंने और सुखबीर ने शहर में एक लेडी डाक्टर से बात की तथा एक दिन बिमला कालेज ना जाकर मेरे साथ लेडी डाक्टर के पास गई तथा अर्बाशन करवा लिया । खून अधिक बह जाने से लेडी डाक्टर छुट्टी नहीं देना चाहती थी पर मैं तथा बिमला छुट्टी करवाकर लौट चले,मजबूरी थी,भेद खुलने की । रास्ते में, मैंने अनेक बार कसम खाकर बिमला को विश्वास दिलाया कि पढ़ाई खत्म कर नौकरी लगते ही हम कोर्ट मैरिज कर लेंगे । मैं मोटरसाईकिल पर बिमला को लिए वापिस आ रहा था नहर के रास्ते से । सड़क के रास्ते से देख लिए जाने का खतरा था। खतरा तो नहर के रास्ते पर भी था मगर सड़क से कम ही था, बिमला ने खेस ओढ़ रखा था जिससे भम्र रहता कि वह मरद थी। किसी तरह गाँव पहुँचे। बिमला को गाँव के बाहर उतार कर मैं शहर आ गया । अगले दिन ननिहाल गया । दो-तीन घंटे मुश्किल से कटे तथा अपना बोरिया-बिस्तरा उठाकर घर भाग आया ।
        उस दिन के बाद मैंने मुड़कर भी ननिहाल की तरफ मुँह नहीं किया ।  ब्याह-शादी तो दूर नानी के मरने पर भी बीमारी का बहाना करके रह गया । पेट-दर्द का बहाना बहुत कारगर होता है । उसे डाक्टर भी नहीं कह सकता कि सच है कि झूठ कोई थर्मामीटर थोड़े ही है पेट दर्द नापने का । यह नहीं है कि मुझे बिमला याद  नहीं आई,  याद आई बिमला उसकी बड़ी-बड़ी शर्मीली आँखें, उसका नर्सिंग होम में बलि का बकरे सा चेहरा मेरी नींद हराम करता रहा बरसों तक।  मगर मैं उसे दिल के अन्धेरे में धकेलता रहा था । अपनी कसमें जो मैंने बिमला को दी थी, मैं कब, कैसे, भूल गया सचमुच आज तक मुझे उसका अफसोस है । 
        अब पचास पार कर जब इस शहर में कर्नल बन कर आया तो ननिहाल से अनेक लोग मिलने आते रहे कुछ फौज में भरती होने की सिफारिश लेकर कुछ महज पुराने रिश्ते नए करने तो मुझे बिमला की याद आई । पर मैं किससे पूछता? बिमला तो विधवा माँ की अकेली बेटी थी, न भाई, न बहन । एक दिन मैंने ननिहाल के गाँव जाने की ठानी । ठानी क्या पहुँच ही गया फौजी जीप में । मेले जैसा माहौल हो गया था ननिहाल में।  लगभग सारा गाँव उमड़ पड़ा था मुझसे मिलने ।  वैसे भी मैंने गाँव के लगभग दस-बारह गबरू जवान फौज में भरती करवा दिए थे ना एक ही साल में । मेरे छुटके मामा गाँव वालों से बतिया रहे थे । गाँव के अनेक जवान जहाँ आगे फौज भरती की आशा से जमा थे । वहीं अनेक अधेड़ बुजुर्ग, औरत-मरद, गाँव की बेटी के होनहार सपूत से मिलने आर्शिवाद देने पहुँचे थे ।
                       मेरी आँखें बार-बार फूलाँ  मौसी, बिमला की माँ को ढूँढ रही थीं । अधेड़ तो मौसी मेरी जवानी में ही थी अब तो बूढ़ी-फूस हो गई होंगी । मेरा दिल किया किसी से पूछूँ पर अपनी पुरानी बात याद कर हिम्मत नहीं हुई ।
                                      दो-तीन घंटे यूँ ही बिता कर मैं जीप में बैठ कर लौट रहा था कि फूलाँ मौसी, बूढ़ी-फूस फूलाँ मौसी मुझे एक पेड़ के नीचे खड़ी दिखाई दी । मुझे लगा कि जैसे वह मेरे इन्तजार में खड़ी थी । मैंने ड्राईवर को जीप रोकने को कहा और जीप से उतर कर मौसी के पास पहुँचा और उनके पैर छूते हुए कहने लगा कि मौसी आशीर्वाद दो। मगर फूला मौसी ने पैर पीछे हटा लिए । जब सिर ऊपर उठाया तो देखा कि मौसी मुझे अजीब निगाह से देख रही थी ।
                                     उसके बाएं हाथ में एक लाठी थी जिसके सहारे वह खड़ी थी, अचानक उसका दायां हाथ ऊपर उठा, मुझे लगा कि वह मेरे सिर पर हाथ रखकर आर्शीवाद देना चाहती है, मगर ये क्या हुआ कि दाएं हाथ का एक जोरदार थप्पड़ मेरे बाएँ गाल पर पड़ा । इससे पहले मैं संभलता फूला मौसी लाठी टेकती हुई झाडिय़ों में गुम हो चुकी थी । सुखबीर मेरे मामा का बेटा जो अब तक मेरे पास आ खड़ा हुआ था मेरे कंधे पर हाथ रख कर बोला,  ''रमेश! ये फूलाँ मौसी नहीं उसकी पगली बेटी बिमला है । अगर उस वक्त धरती फट जाती और मैं उसमें समा जाता तो मुझे कोई अफसोस नहीं होता । 

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Thursday, March 11, 2010

सुनकर सच कोई पास नहीं आया




मुझको झूठ कभी रास नहीं आया
 सुनकर सच कोई पास नहीं आया



समझे कौन भला  अब दुख हाकिम का
 हुक्म बजाने  को   दास नहीं आया

भूखे पेट  सदा  सोये  हम   यारो
करना लेकिन उपवास नहीं आया

पाँव  बुजुर्गों  के  दाबे  हैं   हमने
यार हुनर यह अनायास नहीं आया

ईद  दिवाली    होली  त्यौहार गए 
अम्मा हिस्से अवकाश नहीं आया 

यार महाभारत बच जाता,करना
पाँचाली को उपहास नहीं आया

आम‘ सभी बिकते  हैं   बेभाव   यहाँ 
`श्याम `कभी बिकने खास‘ नहीं आया


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Monday, March 8, 2010




मुझको झूठ कभी रास नहीं आया
 सुनकर सच कोई पास नहीं आया



समझे कौन भला  अब दुख हाकिम का
 हुक्म बजाने  को   दास नहीं आया

भूखे पेट  सदा  सोये  हम   यारो
करना लेकिन उपवास नहीं आया

पाँव  बुजुर्गों  के  दाबे  हैं   हमने
यार हुनर यह अनायास नहीं आया

ईद  दिवाली    होली  त्यौहार गए 
अम्मा हिस्से अवकाश नहीं आया 

यार महाभारत बच जाता,करना
पाँचाली को उपहास नहीं आया

आम‘ सभी बिकते  हैं   बेभाव   यहाँ 
`श्याम `कभी बिकने खास‘ नहीं आया

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Tuesday, March 2, 2010

सच बोलना आदत रही कब है मेरी



माना तेरे हाथों में कोई पत्थर न था
पर क्या तेरी हर बात में नश्तर न था


सच बोलना आदत  रही  कब  है   मेरी
पर झूठ कहने का  वहां अवसर न था

बीवी मेरी बच्चे मेरे मैं भी तो था
था तो मकां भी मेरा लेकिन घर न था

जलथल हुआ था शहर मेरे दोस्तो
बादल लेकिन वहां बरसा जमकर न था
मौजूद था महफ़िल में यूं तो“श्याम’ भी
पर उसका वो पहले जैसा  तेवर न था‘

मुस्तफ़इलुन,मुस्तफ़इलुन,मुस्तफ़इलुन






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Monday, March 1, 2010

तू आए तो मने दीवाली मेरे दिल की खोली में

 करता हूं  हर साल
तेरा इन्तजार होली में






तू आए तो मने दीवाली
मेरे दिल की खोली में













और फ़िर ऐ जानेमन
आए मुन्ना या मुन्नी
हर साल तेरी झोली में







 जो बात है तेरी आंखो में
कहां वो किसी बन्दूक की गोली में








राधा का श्याम है वो तो-मीरा का श्याम है
गोपियों मे मिल जाएगी इक आध मुझे भी
यह सोच के बना था  मैं ‘श्याम सखा’ ग्वाल टोली में







पर मीरां राधा ही नही
फ़िदा थीं सब गोपियां श्याम पर
नहीं टपका कोई हसीन आम मेरी झोली में











बुरा न माने कोई गोपी
और ‘श्याम’ जी आप भी

मुझको चढी है इस बार भी भांग होली में









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Saturday, February 27, 2010

यही तो होली की मस्ती है

  देखूं तुमको भांग जो पीके
अबीर गुलाल लगें सब फ़ीके












मोतियाबिन्दी नयनो  में काजल
्नित करता मुझको है पागल










अदन्त मुंह और हंसी तुम्हारी
इसमे दिखता ब्रह्माण्ड है प्यारी










तेरा मेरी प्यार है जारी
 जलती हमसे दुनिया सारी




क्या समझे ये दुध-मुहें बच्चे
कैसे होते प्रेमी सच्चे







दिखे न आंख को कान सुने ना
हाथ उठे ना पांव चले ना





पर मन तुझ तक दौड़ा जाए
ईलू-इलू का राग सुनाए


हंसते क्यों हैं पोता-पोती
क्या बुढापे में न मुहब्ब्त होती



सुनलो तुम भी मेरे प्यारे
कहते थे इक चच्चा हमारे



कौन कहता है बुढापे में मुहब्ब्त का सिलसिला नहीं होता
आम भी तब तक मीठा नहीं होता जब तक पिलपिला नहीं होता






होली में तो गजल-हज्ल सब चलती है
                                                      दोस्त खुश हैं जलने दो गर दुनिया जलती है
यही तो होली की मस्ती है









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Tuesday, February 23, 2010

हमने जिस जालिम को चाहा----gazal

55
दोस्त लुत्फे इन्तजार अपना यूं ही जाता रहा
हाय! वो कमबख्त हरदम वक्त पर आता रहा

जिसके भी हाथों में गुलदस्ते हम थमाते रहे
उसके ही हाथों में पत्थर बारहा आता रहा

जुल्म ढ़ाकर भी उसे था इस कदर हम पर यकीं
अपने हक में वो गवाही हमसे दिलवाता रहा

वो था मानिन्दे कसम तो मैं भी वादे की तरह
बारी-बारी वक्त, हम दोनो को चटकाता रहा

बात उसकी तो हर इक थी अपने सर-माथे.मगर
मेरी हर अर्जे-तमन्ना पर वो झुंझलाता रहा

ऐ मुहब्बत! मेहरबानी खूब है हम पर तेरी
हमने जिस जालिम को चाहा,वो ही तड़पाता रहा

‘श्याम’बज़्मे-जिन्दगी में इक शिकस्ता दिल लिये
बांसुरी पर दिल की,नग्मे दर्द के गाता रहा



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Friday, February 19, 2010

जिसको भी मारा अपनो ने मारा है-gazal

१२१

खारा है सागर सचमुच खारा है 

नदिया ने फ़िर भी सब कुछ वारा है

सातों के सातों सुर हैं उसकी मुठ्ठी में
कहने को वो बेचारा इक तारा है

जीत सदा सच की होती कहने भर को
सच बेचारा द्वापर में भी हारा है

बेशक यह  सुन्दर और गठीली भी है
देह मगर कहते सांसो की कारा है


यह तो
कोई बात नहीं  है श्याम नई
जिसको भी मारा अपनो ने मारा है


फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ा

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Monday, February 15, 2010

मेरी जां मुझको बस अपना कहो ना-gazal


नहीं कहना अगर सहरा को सहरा

वही किस्सा पुराना सा कहो ना
बहुत प्यारा है दोबारा कहो ना


नहीं कहना अगर सहरा को सहरा

इसे तुम रेत का दरिया कहो ना


जरूरत है कहां रिश्तों की हमको

मेरी जां  मुझको बस अपना कहो ना


नहीं अच्छा घुमाकर बात करना

जो भी कहना है बस सीधा कहो ना


मिले हैं आज हम तुम जो अचानक
है 
ये सच या कोई सपना कहो ना

सदा जो नाचती बंशी की धुनपर

उसे राधा कहो श्यामा कहो ना


फ़िरे है श्याम खुद को ढूंढ़ता सा
उसे पागल या दीवाना कहो ना


मफ़ाएलुन,मफ़ाएलुन,फ़ऊलुन


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Saturday, February 13, 2010

श्याम सखा-साहित्य अकादमी हरियाणा का सदस्य मनोनीत

प्रिय मित्रो
आप को यह जानकर खुशी होगी कि
आप सरीखे मित्रों की दुआओं से मुझे
साहित्य अकादमी हरियाणा का तीन वर्ष के लिये सदस्य मनोनीत किया गया है-यह दूसरी बार है कि आपके इस नाचीज मित्र को सदस्य बनायागया है।
इसके अलावा आपका यह मित्र पंजाबी साहित्य अकादमी हरियाणा चंडीगढ़ का सदस्य भी दूसरी बार मनोनीत हुआ है
 समय होने पर इस पोस्ट के नीचे पोस्ट हुई गज़ल व यह पोस्ट भी देखें

मुझको नशे से ज्यादा नशा,

बीमार कर सकती है टिप्पणी--सावधान हो जाएं

 




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Thursday, February 11, 2010

मुझको नशे से ज्यादा नशा,

यूं तो वो हमेशा ही दिल के पास में रहा
पर,उसका जल्वा मुस्तकिल कयास में रहा

उसको ही ढूंढते रहे,कैसे थे बेखबर
हर वक्त ही जो अपने आस-पास में रहा

खुशबू बसी हुई है जिस तरह से फूल में
ऐसे ही कुछ वो मेरी सांस-सांस में रहा


वो जिन्दगी से दूर, बहुत दूर जा बसे
ता-उम्र मुन्तजिर मैं जिनकी आस में रहा

पीने को लोग ओक से भी पी गये मगर
उलझा हुआ मैं बोतलो-गिलास में रहा

पीने के बाद भी मेरी ,मिटती नहीं तलब
मुझको नशे से ज्यादा नशा,प्यास में रहा

फ़नकार अपने बीच नहीं है तो क्या हुआ
उसका वजूद कैद कैनवास में रहा

तौबा को तोड़ पी थी जिन्होने ,वो सब थे धुत
था रिन्द ही जो होश और हवास में रहा

तल्खी में हकीकत की मिला जो मजा
यारो कहां वो झूठ की मिठास में रहा

सूरज तो जल के मर गया अपनी ही आग में
पर चांद जिन्दा,उसके ही उजास में रहा


जो चापलूस बन न सका,उम्दा किस्म का
दरबारे शाह में वो कहां खास में रहा

समझेगा किस तरह वो गरीबों के दर्द को
शाही ठाठ-बाट शाही निवास में रहा


नंगे खड़े थे दोस्त सभी तो हमाम में
तू ही अकेला किसलिये लिबास में रहा


बारीकियां अदब की कहां सीख सका वो
उलझा हुआ जो हर घड़ी छ्पास में रहा

राधा का‘श्याम’ भी था वो मीरा का‘श्याम’ भी
जो गोपियों के साथ मस्त,रास में रहा



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Saturday, February 6, 2010

रसभरी ---(किशोर प्रेम की कोमलांगी कहानी)


इसी कहानी के दो अंश-
१-- [एक अजीब मिठास लिये रसभरियों का, कसैला स्वाद मुझे कभी नहीं भाया था। हाँ उन्हें देखना अलबत्ता मुझे अच्छा लगता था; उन्हें देख मुझे यूँ लगता था जैसे कोई गदराया बदन, कल्फ लगी मलमल की साड़ी से बाहर निकला जा रहा हो। मुझे रसभरी के झीने मुलायम कवच को छूना भी भला लगता था। उसके चिकने बदन पर हाथ फिराना मुझे एक अजीब किस्म का सुख देता था, जिसे शायद फ्रायड महाशय ही शब्द दे पाएँगे।]
२-हे राम ! रसभरी फ्रिज में, मेरा दिल बैठ गया। मैं भागा रसोई की और।
मुझे फ्रिज में रखे फल व मारचरी [शव] ग्रह में रखी लाश में, एक अदभुत साम्य का अहसास होता है। मुझे लगता है कि फ्रिज में जाकर फल-सब्जियां मर जाती हैं। उनमें अपना स्वाद, अपनी खूशबू न रहकर फ्रिज का ठण्डापन हावी हो जाता है। शायद यह मेरे देहात में बीते बचपन के कारण हो। वहां तो बस ताजा फल-सब्जियां खाने का रिवाज होता था। पर इधर कुछ बरसों से, काम की भरमार, जिम्मेदारियों के बोझ तथा पत्नी के अनुशासन के नीचे दबकर, मैं अपने आप को खो बैठा था।

रस-भरी- कहानी


बहुत दिनों बाद इस शहर में रसभरी बिकती देखी। मैं कार चला रहा था, पत्नी व बच्चे भी साथ थे किसी उत्सव में शामिल होने जा रहे थे। रसभरी खरीदने खाने की इच्छा थी परन्तु पत्नी ने साज-सिंगार मे इतनी देर कर दी थी कि अगर मैं गाड़ी रोकता तो और देर हो जाती, इसलिये चाहकर भी गाड़ी नहीं रोक सका।
हालाँकि तथा-कथित अभिजात्य वर्ग में शामिल होकर, मशीनी जिन्दगी जीते-जीते, मैं भी इन सब्जियों-फलों को जो अक्सर गाँव-देहात या कस्बों में मिलती है, का स्वाद लगभग भूल ही चुका था। फिर भी मन में दबी रसभरी दो दिन से मेरे पीछे लगी थी। मैं अस्पताल आते-जाते उसी सड़क से तीन बार गुजर चुका था और हर बार मेरी निगाहें उस रेहड़ी वाले को ढूंढ़ती रही थीं, फल-सब्जी की दुकान पर भी पता किया पर रसभरी नहीं मिलीं।
आज अचानक दोपहर को अस्पताल से एक सीरियस मरीज़ देखने का बुलावा आने पर मैं अस्पताल जा रहा था कि वो रसभरी की रेहड़ी ठेलता हुआ सामने से आता दिखा। मैंने गाड़ी रोकी तब तक वह काफी दूर निकल गया था। आज तो मेरा बचपना मुझ पर हावी था, मैंने उसकी और दौड़ते हुए आवाज दी 'ओ! रसभरी!'
उसके लगभग दौड़ते पाँव थम गये। मैं उसके पास पहुंचा ही था कि उसने तराजू तान दी बोला 'कितनी'?
मैने बिना सोचे कहा 'आधा-किलो।'
उसने तोलकर कागज के लिफाफे में डालकर मुझे पकड़ाते हुए कहा 'बाइस रुपये'। मैंने पचास का नोट दे दिया। वह गल्ले से पैसे निकाल रहा था तो मैने पूछा 'रसभरी और कहीं नहीं मिली शहर में तुम कहां से लाते हो' उसने पैसे वापिस करते हुए कहा 'दिल्ली से' और चलता बना जैसे उसे किसी की परवाह ही न हो। देखा तो वह रेहड़ी धकियाए काफी दूर जा चुका था।
अस्पताल से घर लौटने पर मरीज देखने के चक्कर में रसभरियों को भूल ही गया। रात सोने लगा तो अचानक याद आया तो मुहं से निकला 'अरे! मेरी गाड़ी में रसभरियां थी उनका क्या हुआ? पत्नी ने करवट बदलते हुए कहा 'नौकर ने निकालकर फ्रिज में रख दी होगी'।
हे राम ! रसभरी फ्रिज में, मेरा दिल बैठ गया। मैं भागा रसोई की और।
मुझे फ्रिज में रखे फल व मारचरी [शव] ग्रह में रखी लाश में, एक अदभुत साम्य का अहसास होता है। मुझे लगता है कि फ्रिज में जाकर फल-सब्जियां मर जाती हैं। उनमें अपना स्वाद, अपनी खूशबू न रहकर फ्रिज का ठण्डापन हावी हो जाता है। शायद यह मेरे देहात में बीते बचपन के कारण हो। वहां तो बस ताजा फल-सब्जियां खाने का रिवाज होता था। पर इधर कुछ बरसों से, काम की भरमार, जिम्मेदारियों के बोझ तथा पत्नी के अनुशासन के नीचे दबकर, मैं अपने आप को खो बैठा था।
पर आज रसभरी का फ्रिज में रखा जाना सुनकर मेरा दिल दहल गया था। क्या सचमुच रसभरी की लाश मिलेगी फ्रिज में? वितृष्णा सी होने लगी।
पर मैंने, भुलक्कड़ नौकर को धन्यवाद दिया, जब रसभरी का लिफाफा, रसोई की सिलपर रखा देखा।
लिफाफा उठाकर, वापिस बेडरूम में आ गया और लिफाफे से, निकालकर रसभरी मुँह में रखी। आ हा! क्या रस की फुहार फूटी मेरे मुँह में, अजीब सा मीठा खटास, ना नीम्बू, ना सन्तरा, ना आम, रसभरी का स्वाद, रसभरी खाये
बिना नहीं जाना जा सकता।
पत्नी ने मेरी और करवट लेकर कहा 'अरे! कम से कम, धो तो लेते।' अब उसे कौन समझाए कि ऐसे बाँगरू देहाती फलों को स्नान नहीं करवाया जाता? उनके ऊपर पड़ी धूल की परत का अपना स्वाद है, अपना आनन्द है।
मनुष्य की एक आदत बड़ी अजीब है। किसी को भूलता है तो ऐसे जैसे उसका कोई अस्तित्व ही नहीं था। याद करने पर आता है तो छोटी सी बात, छोटी सी घटना को उम्रभर कलेजे से लगाये-चिपकाए जीए चला जाता है।
रसभरी खाते-खाते मेरी एक पुरानी टीस जो यादों की सन्दूक में कहीं बहुत नीचे छुप-खो गई थी, उभर आई।
बचपन जिस कस्बे में बीता था, वह उस जमाने में फलों के बागों के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। उस दिन से पहले मुझे रसभरी कभी अच्छी नहीं लगी थी जबकि घर-घर क्या कस्बे के अधिकांश लोग, रसभरियों के पीछे पागल थे और अनवर मियां के बाग की मोटी रसभरियां तो ऐसे बिकती थीं, जैसे कर्फ्यू के दिनों में दूध।
एक अजीब मिठास लिये रसभरियों का, कसैला स्वाद मुझे कभी नहीं भाया था। हाँ उन्हें देखना अलबत्ता मुझे अच्छा लगता था; उन्हें देख मुझे यूँ लगता था जैसे कोई गदराया बदन, कल्फ लगी मलमल की साड़ी से बाहर निकला जा रहा हो। मुझे रसभरी के झीने मुलायम कवच को छूना भी भला लगता था। उसके चिकने बदन पर हाथ फिराना मुझे एक अजीब किस्म का सुख देता था, जिसे शायद फ्रायड महाशय ही शब्द दे पाएँगे।
उस दिन चैम्बर वाली धर्मशाला के सामने वह रेहड़ीवाले से रसभरी तुलवा रही थी और साथ-साथ रसभरी छील-छीलकर खाती जा रही थी। उसने कल्फ लगा, कॉटन का सफेद स्कर्ट व सन्तरी रंग की टॉप पहन रखी थी, मुझे उसमें और रसभरी में एक अजीब समता लगी थी ।
वह मेरा पहला प्यार थी। इस बात का यह मतलब कतई नहीं है कि मैने बहुत से प्यार किये हैं। वह यानी 'मेरा पहला प्यार' हमारे घर से थोड़ी दूर पर रहती थी। आपने रेलवे रोड़ पर सचदेवा जनरल स्टोर तो देखा होगा, जिसका गोरा-चिट्टा मालिक, बालों को खिज़ाब से रंगकर, पत्थर की प्रतिमा सा, काउंटर पर बैठा रहता था। उसके चेहरे के स्थितप्रज्ञ भाव केवल किसी खास अमीर ग्राहक के आने पर ही बदलते थे। वरना वह एक आँख से दुकान के नौकरों व दूसरी से सड़क पर अपना अबोल हुक्म चलाता प्रतीत होता था।
उसकी दुकान सबसे साफ-सुथरी व व्यवस्थित दुकान थी, हर चीज इतने करीने रखी सजी होती थी, दुकान के नौकर भी वर्दी पहने होते थे, इन सब बातों के होते आम ग्राहक तो डर के मारे दुकान पर चढ़ते ही नहीं थे।
उसी सचदेवा जनरल स्टोर के सामने एक होटल था, जी हाँ, सारे शहर में यही एक होटल था उन दिनों,बाकी सारे वैष्णो ढाबे थे। इस होटल के बाहर जालीदार छींके में मुर्गी के झक-सफेद अंडे टंगे रहते थे और शीशे के दरवाजे के भीतर हरी गद्दियों वाली कुर्सीयां, लाल रंग के मेजपोशों वाली मेजों के साथ लगी दिखती थी। कुल मिलाकर हमें वह फिल्मों वाला नजारा लगता था। मुझे बहुत बाद मालूम हुआ कि वह होटल नहीं, रेस्तराँ था। पर तब वह शहर का एक मात्र होटल था जहाँ सामिष भोजन मिलता था।
वह इसी होटल के ऊपर रहती थी। मैं तब दसवीं कक्षा में पढ़ता था, नई-नई मसें भीगीं थी। मन में एक अजीब हलचल रहने लगी थी, जिन लड़कियों को मैं पहले घास भी नहीं डालता था अब उन्हें नजर चुराकर देखना मुझे अच्छा लगने लगा था। उन्हीं दिनों मैंने भाटिया वीर पुस्तक भँडार से किराये पर लेकर चन्द्रकान्ता व चंद दीगर जासूसी उपन्यास पढ़ डाले थे।
मुझे वह चंद्रकान्ता लगने लगी थी। उसकी चाल में एक अजीब मादकता थी, मैं उसकी एक झलक पाने के लिये बिना बात बाजार के चक्कर लगाने लगा था, तथा जब वह रसभरी खरीदकर, अपने चौबारे चढ़ जाती थी, तो मैं रेहड़ी से रसभरी लेने पहुँच जाता था। रसभरी अब मुझे सभी फलों से अच्छी लगने लगी थी। पर मुसीबत यह थी कि रसभरी साल में दो तीन महीने आती थी।
वह कौन सी कक्षा में पढ़ती थी? मुझे पता नहीं था, पर उसे रिक्शा में पढ़ने जाते देखना, मेरा रोज का काम हो गया था, हमारे मुहल्ले की इस उम्र की लड़कियों ने या तो पढ़ना छोड़ दिया था या उनका पढ़ना छुड़वा दिया गया था और वे घर-घुस्सू हो गई थीं। पर यह लड़की रिफ्यूजी याने पाकिस्तान से विस्थापित थी। और इन रिफ्यूजियों मे एक खास खुलापन था। वह रिकशा में ऐसे बैठती थी, जैसे कोई रानी रत्न-जड़ित रथ पर या कोई मेम विक्टोरिया में बैठी हो। सचदेवों का बड़ा लड़का सुरेन्द्र, मेरे साथ पढ़ता था, वह शाम को कभी-कभार अपनी दुकान पर बैठ जाता था, मैंने उसे अक्सर सुरेन्द्र से बातें करते देखा था, मैं उसका नाम भी नहीं जानता था, पर शर्म के मारे सुरेन्द्र से भी नहीं पूछ पाया था। वैसे भी सुरेन्द्र शोहदों की टोली में था और मैं किताबचियों की टोली में।
शायद अब उसे भी पता चल गया था कि मैं उसे देखता रहता हूँ। अब वह भी कभी-कभी पलट कर मुझे देखने लगी थी। एक दिन मैं, रेलवे-क्रासिंग बन्द होने के कारण, फाटक के बाजू में पैदल-यात्रियों हेतु बने चरखड़े से, साइकिल निकाल रहा था, कि वह भी दूसरी और से उसमें से निकलने लगी। हमारी नजरें मिलीं, एक पहचान पल-भर के लिये कौंधी। फिर वह, मेरे हाथ पर हाथ रख कर चरखड़े से निकल गई। मैं सुन्न खड़ा रह गया था, उस छुअन के अहसास से। अगर पी़छे आता राहगीर मुझे न धकियाता, तो शायद मैं उम्र-भर वहीं खड़ा रह जाता।
मैं वहाँ से चला तो गुनगुनाने लगा था 'हम उनके दामन को छूकर आये हैं,हमें फूलों से तोलिये साहिब'।
अनेकों बार सूंघा था मैंने अपने उस हाथ को। मैंने तो अपने उस हाथ को चूमना भी चाहा था, पर मैं यह सोचकर नहीं चूम सका कि वह यह जानकर नाराज न हो जाये। आज उन बचकानी बातों को सोचकर हँसी आती है।
हमारी नजरें मिलने का सिलसिला लगभग दो साल चला। वह सामने से आती दिखती तो मैं जान-बूझकर आहिस्ता चलने लगता कि उसे ज्यादा देर तक देख सकूं। वह भी मौका मिलते ही मुड़-मुड़कर मुझे देखती तथा किसी के आ जाने पर अपनी गर्दन को हल्का सा झटका देती जैसे अपनी जुल्फें सँभाल रही हो।
एक बार तो पीछे मुड़कर देखते हुए वह मुस्कराई भी थी। उस वक़्त उसकी साफ-शफ़्फ़ाक बिल्लोरी आँखों मे एक चमक थी, एक पहचान थी, एक राज़ था, एक साझेदारी थी और भी जाने क्या-क्या था, शायद प्यार भी था। मुझपर कई दिन, एक अजीब सा नशा छाया रहा। फिर मुझे मेडिकल ऐन्ट्रेंस टेस्ट देने पटियाला जाना पड़ा। तीन दिन बाद ही लौट पाया था।
ट्रेन रात को पहुँच। स्टेशन से मेरे घर का छोटा रास्ता दूसरा था पर मै उसके घर की तरफ से लौट रहा था । उसके घर में एक कमरे की बत्ती जल रही थी, मैं खड़ा हो गया। मैं वहीं खड़ा उस खिड़की को देखने लगा। बाजार के चौकीदार के टोकने पर ही घर गया था।
उस रात के बाद वह मुझे कभी दिखाई नहीं दी। वह घर भी बन्द रहने लगा। मैं जाने क्यों उदास रहने लगा। वक़्त मेरी उदासी से बेखबर अपनी रफ़्तार से चलता गया।
एक दिन मैंने देखा कि डाकिया उसके घर की सीढीयां चढ़ रहा था। फिर उसने एक खत उनके बरमदे में फेंक दिया और चलता बना। मैं शाम होने पर, सीढियों पर चढ़कर बरामदे में पहुँचा, वहाँ बेंत की दो टूटी कुर्सियां पड़ी थीं। पर खत शायद हवा उड़ा ले गई थी। एक कुर्सी पर एक छोटा सा चिथड़ा सा पड़ा था, उठाकर देखा तो वह एक जनाना रुमाल था। अनजाने में, मैं उसे सूंघ बैठा; मुझे उसमें वही गंध महसूस हुई, जो उसके छूने पर अपने हाथ मे आई थी।
हालांकि वह रुमाल किसी और का भी हो सकता था। पर तब मुझे यकीन था कि वह उसी का है। उस रुमाल पर लाल व हरे रंग का फूल काढ़ा हुआ था। मैंने उसे अपनी किताब ग्रे'ज अनाटमी में रख लिया था। अनाट्मी का कोर्स खत्म होने पर भी मैने वह किताब नहीं बेची, हालांकि कई बार मुझे पैसे की किल्लत भी हुई थी।
बरस पर बरस बीतते गये। यादों के आइने पर वक़्त की धूल की परत चढ़ गई और उसकी याद भी उसी की तरह खो गई थी। आज अगर रसभरी न खरीदता, खाता तो बचपन के मीठे कसैले, अतृप्त, असफल, अधूरे प्रेम की याद कैसे आती।


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Monday, February 1, 2010

चुप भी तो रह पाना मुश्किल-gazal-








अपनों को समझाना मुश्किल
चुप भी तो रह पाना मुश्किल

खोना मुश्किल पाना मुश्किल
खाली मन बहलाना मुश्किल

मौन रहें, तो बात बने कब
कहकर भी सुख पाना मुश्किल

बैरी सावन बरसे रिमझिम
रातों का कट पाना मुश्किल

सुलझों को उलझाना आसां
उलझों को सुलझाना मुश्किल





dbgm-3
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Thursday, January 28, 2010

क्या खबर थी कि वो इक रोज पराया होगा

जब हुनर उसको खुदा ने ये सिखाया होगा
एक कतरे में समन्दर जा समाया होगा

दिल  मेरा उसने कभी जो यूं दुखाया होगा
उसको भी यार नहीं  चैन तो आया होगा

उसको मालूम था जब इसका उजागर होना
प्यार  क्यों उसने जमाने से छुपाया होगा

आज मौजूद नहीं था वो हसीं तो यारो
रंग महफिल में भला किसने जमाया होगा

बन के धड़कन जो धड़कता था रहा दिल में“श्याम‘
क्या खबर थी कि वो इक रोज पराया होगा


फ़ाइलातुन,फ़ इ लातुन,फ़ इ लातुन,फ़ेलुन


यहां कोहरे पर  दो नवगीत देखें
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Sunday, January 24, 2010

एनकाउंटर—-ए लव स्टोरी

इस कहानी पर पहला कमेन्ट----कहानी कमेन्ट के बाद शुरू है

डॉ टी एस दराल said...

डॉक्टर साहब , क्या कहें। समझ नहीं पा रहा हूँ कहाँ से शुरू करूँ।
आरम्भ में उत्सुकता --धीरे धीरे सस्पेंस ---फिर तो कहर ढाने वाला सस्पेंस ---पूरी कहानी एक सांस में पढ़ गया।
सांस भी इसलिए नहीं ली की कहीं प्रवाह टूट जाये।
इत्तेफाक देखिये --अज सुबह मैं भी अपने प्री-मेडिकल के समय की कुछ ऐसी ही यादों में डूब सा गया था।
फर्क सिर्फ इतना था की कोई कहानी थी ही नहीं, बस नायिका थी ।
वक्त सचमुच बड़ा बेरहम होता है।
इसलिए ख्यालों में ही जो तस्वीर रहती है , वही रहे तो कितना सुख मिलता है।

बहुत अच्छा लगा , यह कहानी पढ़कर। मार्मिक, दिलचस्प और धारा-प्रवाह।
शानदार।




(मित्रो अब तक आप मेरी गज़लों को पसन्द कर मेरा हौसला बढाते रहे हैं ,ँ सेआज मैं बतला दूं कि मैं मूलत: कथाकार हू और मा शारदे की अनुकम्पा से अब तक १२५-१३० कहानी लिख पाया हूं। आप सरीखे मित्रों की दुआओं १०-१२ कहानियां पुरस्कृत भी हुईं। वहीं एक उपन्यास को M.A final ke sylabus जगह पाने के लायक समझा गया हिन्द पाकेट बुक्स से प्रकाशित है व कुरुक्षेत्र विश्व .वि .के कोर्स में शामिल है।आज मैं आपके सामने अपनी एक कहानी लेकर हाजिर हूं । जानता हूं कि नेट पाठकों के पास वक्त कम होता है फ़िर भी मेरा विश्वास है यह कहानी आपको आह्लाद प्रदान करेगी और आपका वक्त जाया न जाएगा। कहानी हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा वर्ष १९९८ में सर्वश्रेष्ठ पुस्तक से पुरस्कृत कथा संग्रह -अकथ से जिसे बाद में श्री दिव्य रजत अलंकरण भोपाल से भी नवाजा गया।)

एनकाउंटर-ए लव स्टोरी
श्याम सखा

बात कुछ यूँ शुरू हुई, कि तकरीबन दो महीने से, हमारे टेलीफोन की घण्टी बजती और जैसे ही,

हम टेलीफोन उठाते, हैलो कहते मगर, फिर दूसरी तरफ से कोई बोलता नहीं। परन्तु हमें ये अहसास होता कि टेलीफोन कटा नहीं, बल्कि कोई हमारी आवाज सुन रहा है और बोलता नहीं। एक दिन तो कुछ नहीं हुआ, हमने इसे टेलीफोन लाइन या एक्सचैंज की कोई गड़बड़ मान लिया। टेलीफोन या तो लगभग ग्यारह बजे रात या सुबह पांच बजे आता था। फिर हमें लगने लगा कि कोई जानबूझकर ऐसा कर रहा है। यह भी महसूस होता कि दूसरी तरफ जो भी कोई है कुछ कहना चाहता है परन्तु झिझक के कारण, कुछ कह नहीं पाता। एक उत्सुकता सी रहती थी कि कौन होगा ! जाने क्यों ऐसा लगता है कि कोई अपना है जो चाहकर भी बात नहीं कर पा रहा ! उत्सुकता के साथ यह विचार भी आता, कि आखिर उसे ऐसी क्या मजबूरी है !
अब अक्सर ऐसा होने लगा, कि रात को टेलीफोन की तरफ, मैं सोने लगा। एक दिन घण्टी बजी, मैं उन्नीदा-सा बोला, ‘‘हैलो’’ उधर से आवाज आई- ‘‘हैलो कौन’’?
‘‘आप कौन’’ और फोन कट गया।
मैंने सोचा, गलत नम्बर होगा।
दो दिन बाद, फिर ऐसा ही हुआ। उधर से आवाज आई- ‘‘हैलो’’
मैंने कहा-‘‘हैलो कौन’’?
‘‘मैं‘‘
‘‘आप कौन?‘‘
‘‘मैं डाक्टर नवल‘‘
फोन कट गया।
अब सिलसिला चल निकला कि फोन की घण्टी बजती, अगर पत्नी फोन उठाती तो उधर से कोई आवाज नहीं आती और अगर मैं उठाता तो, दो-एक जुमलों के बाद फोन कट जाता। हालांकि रात, वक्त-बेवक्त, फोन आता था। पर जाने क्यों झुंझलाहट या चिड़ कभी नहीं हुई ! पत्नी ने एक दो-बार पूछा कौन था? मैं यह कहकर टाल गया, कि गलत नम्बर था। यह सोचकर कि औरतें, बात में से बात निकालती हैं और फिर पता नहीं, बात किधर जा निकले। अब भी फोन पर खुलकर बात नहीं हो पाती थी। हाँ, एक आध जुमला अवश्य, इधर-उधर हो जाता था। मसलन एक सुबह फोन बजा। मैं उठा, बोला- हैलो !
‘हैलो, डाक्टर नवल, गुड़ मार्निंग!‘‘
‘‘जी, बेनाम हसीना।‘‘
‘‘आपने हसीना कैसे कहा?‘‘
‘‘जैसे आपने डॉ० नवल।‘‘
‘‘पर आप तो डॉ० नवल हैं।‘‘
‘‘और आप बेनाम भी हैं, हसीन भी।‘‘
फोन कट गया।
मैं दिमाग लगाता रहा, कि आखिर कौन हो सकती है मोहतरमा, पर न तो जान-पहचान में से यह स्वर मालूम हुआ, न ही श्रीमती जी की कोई सहेली लगी। फिर आखिर कौन थी?
एक बात अवश्य थी, कि फोन लगातार आ रहे थे तथा तकरीबन उसी संख्या में, आ रहे थे। हाँ, तरतीब कोई नहीं थी। किसी दिन, दिन में दो बार तो कभी-कभी दो दिन भी नहीं। हाँ, दो-तीन बार से अधिक ऐसा नहींं हुआ। पत्नी फोन उठाती तो, कोई आवाज नहीं आती और मेरे फोन उठाने पर, उसी तरह सरगोशी के लहजे में, थोड़ी बहुत बात होती, फिर फोन कट जाता। एक हिचक-सी दूसरी ओर से बात करने वाले के मन में मुझे महसूस होती रही। एक बार रात डेढ़ बजे फोन आया-मैंने कहा-
हैलो !
~……….उधर से कोई आवाज नहीं।
हैलो, मैं डॉ० नवल।
………
हैलो, मैं फोन रख रहा हूँ।
ना, ऐसा ना करें।
तुम कौन हो ?
……..
इस वक्त, फोन क्यों करती हो ?
……….‘‘
पत्नी के फोन उठाने पर, जवाब क्यों नहीं देती ?
……….‘‘
‘‘अच्छा ! मैं फोन रख रहा हूँ
‘‘……….‘‘
फोन कट जाता है। मेरी नींद, कोसों दूर चली गई है। रह-रहकर सोचता हूँ। कौन हो सकती है ! परन्तु कोई भी सूत्रा नहीं पकड़ा जाता। आवाज भी, पहचानी नहीं जाती।
पर जाने क्यों, बार-बार महसूस होता, कि है कोई जान पहचान वालों में से। और जैसे, बहुत कुछ कहना चाहती है, पर कह नहींं पाती। मेरी शादी घरवालों ने तय की थी तथा पहले मेरा किसी से, प्यार-व्यार का चक्कर भी नहीं था। न ही, इतने सालों की नौकरी, करते हुए किसी से, घनिष्ठता हुई थी। फिर कौन हो सकता है? मैं थककर सो गया। दस, पन्द्रह दिन तक कोई फोन नहीं आया। परन्तु मैं, जागते-सोते, फोन का, इन्तजार करने लगा। मैं कोशिश करता कि फोन, मैं ही उठा। कहीं ऐसा न हो, कि फोन पर वही हो। फोन न आने पर, मैं बेचैन रहने लगा। ऐसा लगा कि, मेरा कोई अभिन्न मित्रा, मुझसे छूट गया हो। आखिर एक दिन फोन बजा, ठीक रात के दो बजे। पत्नी ने फोन उठाया-‘‘हैलो, हैलो‘‘ और पटक दिया। बोली आप इसको ठीक करवाइए, कहीं क्रास फाल्ट है और घण्टी यहाँ बजती रहती है। मैंने कुछ नहीं कहा। परन्तु इन्तजार करने लगा। लगभग बीस मिनट बाद, घण्टी बजी। मैंने जल्दी से रिसीवर उठाया। पत्नी सो चुकी थी।
‘‘हां कहो!‘‘ मैंने कहा।
‘‘मैं बोल रहा हूँ।‘‘
तुम कल रात दिल्ली आ सकते हो ?
‘‘क्यों?‘‘
‘‘तुम कल दिल्ली आ सकते हो?‘‘
‘‘रात को रुकना भी पड़ेगा, पता नोट कर लें।‘‘
‘‘लोधी होटल, लाबी में, रिसेप्शन के पास।‘‘
‘‘तुम हो कौन?‘‘
‘‘मैं तुम्हारा इन्तजार करूँगी।‘‘
‘‘मगर तुम हो कौन ‘‘
‘‘देख लेना‘‘
और फोन कट गया।
मेरी नींद उड़ गई। रह-रहकर जाने कैसे-कैसे विचार आ रहे थे ? कौन होगी वह? मुझे ही टेलीफोन क्यों करती है? कहीं कोई षड~यन्त्र तो नहीं। मैं अब तक, शहर का नामी चिकित्सक हो चुका था। हालांकि मेरा, अब तक किसी से झगड़ा या बैर नहीं हुआ था। परन्तु आजकल के माहौल, को देखते हुए, जाने कैसे-कैसे उतार-चढ़ाव मन में आने लगे ! जितना, मैं इस गुत्थी को सुलझाने का प्रयास करता, उतनी ही और उलझ जाती। कालेज के दिनों मैडिकल कालेज हस्पताल में, नौकरी के दौरान मेरा, कितनी ही लड़कियों व नर्सों से सम्पर्क हुआ, लेकिन घनिष्ठता किसी से नहीं हुई थी। मैंने मन ही मन सोचा कि मैं नहीं जाऊंगा। अगर उसका फोन, फिर आया तो जवाब भी नहीं दूँगा। इस उम्र में मेरा यह खिलंदरापन ठीक नहीं है। हो सकता है, कोई मित्र बेवकूफ बनाना चाहता हो और किसी से, फोन करवा रहा हो। खैर ! मन में पक्का निश्चय ‘न जाने का‘ करने के बाद कुछ धीरज-सा हुआ। मैं सो गया। सोचा, आज चौबीस तारीख है और फर्स्ट अप्रैल के सात दिन बाकी हैं।
चार-पांच दिन, कोई फोन नहीं आया। मैंने भी, कुछ अधिक ध्यान नहीं दिया। छठे दिन, रात लगभग दो बजे फिर फोन आया-‘‘हैलो।
‘‘………………….‘‘ मैं चुप रहा।
‘‘हैलो, डॉ० साहब आप क्यों नहीं आए?Þ
‘‘…………………….Þ
‘‘बोलिए न मुझे पता है, फोन पर आप ही हैं’
मैंने फोन रख दिया।
घण्टी फिर बजी।
‘‘हैलो, डॉ० साहब! कल आप जरूर आइएगा, आप किसी अनर्थ की ना सोचं।”
आवाज में अनुनय था। ‘‘मेरा आपसे मिलना जरूरी है। मेरा एक वायदा है आपसे, बरसों पुराना। देखिए ! मैं बहुत दूर, दूसरे देश से आई हूं। हैलो!”
मुझे मजाक सूझा। ‘‘कहीं इन्द्रलोक से तो नहीं आई हैं आप‘‘ उसने सुना-अनसुना कर के कहा ‘‘आप जरूर आएँ। मेरा आप पर, वश तो नहीं है। पर विनती जरूर है कि आप आएँ।‘‘
फोन कट गया।
मैं, पहले से भी उद्विग्न हो गया। रात-भर, कई तरह के सोच विचार किए और न जाने की सोच कर सो गया।
सुबह उठते ही मस्तिष्क ने फिर उसी तरह सोचना, शुरू कर दिया। मैंने पत्नी से कहा कि अटैची लगा दे। मुझे एक-दो दिन के लिए, दिल्ली जाना पड़ेगा। पत्नी को थोड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि मैं, अक्सर बाहर जाने का प्रोग्राम, इतनी जल्दी नहीं बनाता। बल्कि कई दिन पहले ही मेरे जाने की चर्चा घर में गूँजने लगती है। चाहे आफिशियल काम हो या संस्था के काम से अथवा निजी घूमने वगैरा के चक्कर में। लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। चुपचाप अटैची में कपड़े सहेजने लगी। मेरे मन में चोर था, अत: स्पष्टीकरण देने लगा, कि रात राजू का टेलीफोन आया था। उसे कुछ काम है, शायद इसीलिए बुलाया है। राजू मेरा लंगोटिया यार था। साल में दो-चार बार आकर मेरे यहाँ रुकता था। मैं भी साल में एक बार उसके पास जरूर जाता था।
सारा दिन, सफर पता नहीं, कितना लम्बा लगता रहा। गाड़ी होटल के पोर्च में रुकी। दरबान ने, अभिवादन कर बड़े अन्दाज से, दरवाजा खोला, पर मुझपर जैसे किसी आसेब का साया था। बिना जवाब दिए, अन्दर दाखिल हो गया। इन फाइव स्टार होटलों के बेयरे, दरबान, बड़े खुर्राट किस्म के जीव होते हैं। मानो मनुष्य की जून में घडियाल। ऐसी छोटी-मोटी तोहीन को जरा से कन्धे उचकाकर झाड़ देना, शायद उनकी ट्रेंनिग में शामिल होता है। खैर ! मैं लाबी में पहुँचा और बीचों-बीच बनाए गए खूबसूरत फव्वारे, की बांईं तरफ के सोफे पर बैठ गया। कसमसाकर दो-चार मिनट पहलू बदले होंगे, कि वेटर एक बढ़िया तश्तरी में, एक लिफाफा लेकर, मौजूद हुआ। लिफाफे के साथ ही, तश्तरी में उसे खोलने के लिए, खूबसूरत चाकू रखा था। इन होटलों में चोचलों की भरमार रहती है। मैं अधिकतर लोगों की तरह लिफाफा फाड़कर पत्र निकालने का आदी हूँ। परन्तु होटल के माहौल तथा उस बावर्दी बेयरे की मौजूदगी में, ऐसा कर सका और चाकू से लिफाफा खोलने लगा। मैं खुद को सिमटा सा महसूस कर रहा था, क्योंकि इस तरह लिफाफा खोलना मेरे लिए काफी कोफ्त का काम था। खैर पत्र निकाल कर, लिफाफा चाकू तथा टिप बेयरे की तश्तरी के हवाले की। बेयरा दो कदम पीछे हटकर खड़ा हो गया।
मैं पत्र पढ़ने लगा। लिखा था कृपया बेयरे के साथ चले आएँ ‘बेनाम’। मैंने बेयरे पर नजर डाली, वह झुककर व्यावसायिक मुस्कराहट चेहरे पर ले आया। मैं उठ खड़ा हुआ। आगे चलकर लिफ्ट में दाखिल होकर उसने बटन दबाया और लिफ्ट ऊपर सरकने लगी। लिफ्ट तीन ओर से पारदर्शी शीशे की बनी हुई थी। मैं इसमें पर जाते हुए ऐसा महसूस कर रहा था कि जैसे बीच बाजार में, मेरी नुमाइश लगी हो।
ऊपर पहुंचकर, हम कुछ देर गद्देदार गलीचों से ढके, गलियारे से होकर, एक कमरे के सामने पहुँचे। बेयरे ने घण्टी बजाई, फिर कुछ देर रुक कर दरवाजा खोल दिया। मैं अन्दर आ गया। बैरा, बिना कुछ बोले दरवाजा बन्द करके, चला गया। कुछ देर तो मैं, अहमक सा बना खड़ा रहा, फिर आगे बढ़कर कमरे का मुआयना करने लगा। कमरा फाइव स्टार होटल के अच्छे कमरों में से था। एक तरफ बैठने की जगह थी, जहाँ तीन भव्य कुर्सियाँ पड़ी थीं तथा बीच में काफी टेबुल। दूसरी तरफ झीना सा पर्दा था। उसके उस पार एक डबल बैड था, जिसकी समु्द्र फेन सी, सफेद चादर पर पड़ी् सिलवटें बतला रहीं थीं कि इस, बेड से उठकर अभी कोई गया है। मैं एक कुर्सी पर बैठ गया। कWाफी टेबुल पर एक फूलदान था जिसमें बड़ी खूबसूरती से हल्के पीले व गहरे नीले रंगे के फूल थे। मैं तो इन फूलों का नाम भी नहींं जानता था। फूलदान के पास एक खूबसूरत लिफाफा रखा था, जिस पर मेरा नाम लिखा था। मैंने लिफाफा उठा लिया और खोलने लगा। एक भीनी सी खुशबू मेरे जहन में उतर गई। पत्रा में लिखा था कुछ पल और प्रतीक्षा करें, मैं शावर में हूँ। तब तक आप पाइप पीजिए। पाइप दराज में है। मैं कभी पाइप पीता था, पर अब मुझे पाइप छोड़े हुए बरसों बीत गए थे। फिर भी मैंने दराज खोला उसमें एक चायनीज पाइप, प्रिंस हेनरी का तम्बाकू तथा लाइटर रखे थे।
मैंने पुराने अभ्यास वश, पाइप को भरा और लाइटर से सुलगाकर एक लम्बा कश लिया। अब तक मैं संयत हो चुका था तथा हर किसी होनी अनहोनी के लिए तैयार था। पर मैं हैरान था, कि मेरे बारे में इतना जानने वाली कौन है आखिर !
तभी टेबुल पर रखे फोन की घण्टी बजी। मैंने रिसीवर उठाया, तो वही आवाज आई, जो इतने दिनों फोन पर सुनता आ रहा था। वह बोल रही थी ‘खुशामदीद किन अलफाज से शुक्रिया करूँ ! बस आ रही हूँ, दो मिनट में। उसकी आवाज के साथ शावर के पानी गिरने की आवाज आ रही थी।
अचानक वह फोन पर हँसने लगी। उसकी खिलखिलाहट तो बहुत जानी-पहचानी थी। अरे ! शेगी तुम ! मैं कह उठा। उसकी खिलखिलाहट और तेज हो गई, जैसे उस पर हँसी का दौरा पड़ गया हो।
मुझे रोमांच हो आया, शेगी उर्फ शुभांगी, मेरी स्कूल तथा कालेज की सहपाठी थी। प्री-मेडिकल तक। हम दोनों में काफी दोस्ताना था, लगाव था, जो शायद प्रेम में बदल जाता। परन्तु उसके पिता फ़ॉरेन चले गए थे, सबको लेकर। और फिर यादों के आइने पर धूल की परत चढ़ गई। मैं सोच भी नहींं सकता था कि इतने बरसों, लगभग बीस बरसों बाद उससे मुलाकात होगी और वह भी इस रहस्यमय तरीके से।
यह शुभांगी की बचपन की आदत है। वह पहले भी, लोगों को अक्सर अचम्भित करती रहती थी।
वह कहने लगी, सीधी रोम से आ रही हूँ। फोन भी वहीं से करती थी। मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था, किसी किशोर दिल की मानिन्द, जो पहली बार अपनी प्रेमिका से मिलने आया हो। थूक और सांस गले में अटकते से महसूस हुए। फिर यह सोच कर कि शुभांगी मुझसे बात करते हुए नहा रही थी, मेरे माथे की नसें फटने को हो आई। शुभांगी मेरी कक्षा की सबसे सुन्दर लड़की थी। इतनी सुन्दर कि उससे बात करते हुए आम लड़के हकलाने लग जाते थे। वह अपनी तरह की एक ही थी, बेलौस बेबाक।
हम क्योंकि, बचपन से इकट्ठे एक ही कालोनी तथा एक ही स्कूल में थे, अत: मुझ में उसके प्रति कोई काम्पलेक्स नहीं था। मात्रा एक बार, जब वे लोग देश छोड़कर जा रहे थे, तो मुझे लगा था, कि मेरे भीतर का कोई अहम~हिस्सा टूटकर जा रहा हो। उन दिनों मैं काफी उदास हो गया था। जाने से पहले दिन, कालोनी के पार्क में हम दोनों मिले थे, तब मुझे लगा था कि शुभांगी को भी, मेरी तरह ही कुछ खोने का अहसास था। हम दोनों पार्क की बैंच पर, अँधेरा होने तक बैठे रहे थे। जब जाने के लिए उठे, तो शुभांगी ने अचानक मेरा चेहरा हाथों में लेकर चूम लिया था। इससे पहले कि मैं इस अनायास झटके से बाहर आता, वह भाग ली थी। मैं उसके पीछे भागा‘ठहर, मेरी उधार देकर जा।’ बचपन से ही हम एक-दूसरे की पीठ पर घूँसे जमाते आए थे और जो घूँसा लगाकर भाग जाता था तो दूसरा उसे उधारी मान लेता था। उस दिन जाते-जाते शुभांगी कह गई थी, उधार अगले मिलन पर। पर अगला मिलन कभी नहीं हुआ। उधर शुभांगी फोन पर कह रही थी कि कहाँ खो गए, तुम्हारी उधार देने आई हूँ। मैं कह उठा, बाहर तो आओ, सूद समेत वसूल करूंगा। उसने फोन रख दिया। मैं एक अजीब उन्माद में फँसा, शुभांगी की प्रतीक्षा करने लगा। जाने कितनी अतृप्त इच्छाएँ जागृत हो उठीं। फिर इस माहौल व एकान्त की मादकता का भी प्रभाव रहा होगा। शुभांगी ने टेलीफोन का रिसीवर, शायद हैंगर पर टाँग दिया था, क्योंकि पानी की कलछल के साथ, उसके गुनगुनाने की आवाज भी मुझे फोन पर सुनाई दे रही थी। शुभांगी का स्वर, आरम्भ से ही मीठा एवं लय लिए हुए था।
मैं दिवास्वप्न में डूब गया। शुभांगी का उस शाम का चेहरा, जब हम आखिरी बार पार्क में बैठे थे, मेरी आँखों के सामने तैर गया। वह हमेशा से ही चंचल, चुलबुली, अलबेली, मस्त-मौला रही है। पर उस शाम पार्क में वह खोई सी अनमनी-सी बैठी रही थी। मात्रा मैं जो बहुत कम बोलने वाला समझा जाता हूँ, बोलता रहा था। वह हाँ ना में जवाब देकर अपनी उँगलियाँ उमेठती बैठी थी। फिर अचानक उठकर मुझे चूमकर भाग निकली थी।
वही था हमारा, आखिरी मिलन। यही उधार थी जिसे चुकाने का इशारा वह टेलीफोन पर कर रही थी। मुझ पर एक अजीब रोमांच हावी था। तभी हल्के से, बाथरूम का दरवाजा खुला। खुशबू का एक रेला तैर कर मुझ तक पहुँच गया। शायद यह आगे आने वाले खुशबुओं के तूफान का नामवर था। फिर शुभांगी बाहर आई। उसके ब्वायकट बाल, उसका थुल-थुल बदन, उसके लगभग पारदर्शी गाउन से बाहर निकल पड़ रहा था। अधेड़ उम्र उसके शरीर ही नहीं चेहरे तथा आँखों पर भी, धावा बोल चुकी थी। मैं भौचक्का सा रह गया।
शुभांगी आकर सामने बैठ गई। कहने लगी,‘बहुत दिन तड़पाया है तुमने।’ टेलीफोन पर भी नहीं पहचाना। और सुनाओ।
मैं केवल यह कह पाया सब ठीक है। फिर हाथ मुंह धोने की कहकर, बाथरूम भाग लिया। बाथरूम में आकर एक लम्बी साँस ली और वाश-बेसिन के नल को खोल, सिर उसके नीचे रख दिया और सोचने लगा। हे राम ! कहाँ फँस गया इस बबाल में। कुछ देर पानी चलता रहा था। सिर में ठण्डक पड़ी। मैंने सिर ऊपर उठाया तो सामने आइने में अपनी सूरत दिखलाई पड़ी-ओह, तो क्या शुभांगी भी यही कुछ नहींं सोच रही होगी। वह क्या किसी खल्वाट लिए, पेट निकले अधेड़ की उधार चुकाने आई थी ?
वक्त, किसी को नहीं छोड़ता। मात्र हम स्वयं, अतीत से चिपके रहते हैं। चलो बाहर चलकर देखा जाए, क्या होता है ?
शुभांगी वहीं, उसी कुर्सी पर बैठी थी। उसने होल्डर लगी सिग्रेट सुलगा रखी थी। बीयर की बोतल खुली पड़ी थी। दो गिलास भरे पड़े थे पर शायद वह भी इस मुलाकात के सदमे को सहन नहीं कर पाई थी। अत: शिष्टाचार को ताक पर रखकर बीयर पीने लग गई थी। मुझे बाहर आया देखकर कहने लगी, ओ‘आओ नरेश ! बैठो और सुनाओ, क्या हाल है ? क्या वक्त सचमुच बेरहम नहीं है ?
उसने मेरी ओर, और फिर दीवार पर लगे आइने में अपने पर नजर डालते हुए कहा,‘चलो आज अपनी बीती उम्र का मातम मनाने के लिए पीते हंै
मैंने बीयर का भरा गिलास उठाकर, उसके हाथ में लगभग आधे हुए गिलास से, टकराकर कहा‘चियर्स ! और फिर हम दोनों खोखली हँसी हँस पड़े।




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Wednesday, January 20, 2010

जीवन भी क्या खूब तमाशा है

पल में तोला,पल में माशा है
जीवन भी क्या खूब तमाशा है

मुंह में डालो बस घुल जाएगा
यारो ,ग़म क्या एक बताशा है

मेरे मन में तो है रहती हरदम
तुझसे मिलने की अभिलाषा है



वक्त बुरा है तब ही तो बैठी
हर इक मन में आज हताशा है

लौट सदा जो आ जाती मन में
वो दोशीजा ही तो आशा है


ना समझो को समझाना होगा
यार गजल उल्फ़तकी भाषा है

‘श्याम’तुझे हम मान गये,तूने
गज़लों में माहौल तराशा है


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Wednesday, January 13, 2010

कुछ फ़ुटकर शे‘र-११

यूं भला कब तक मेरा इम्तिहान लोगे तुम
इस तरह तो एक दिन मेरी जान लोगे तुम

है खड़ी इक फ़स्ल गम की दिल में मेरे
दर्द की इस फ़स्ल का भी लगान लोगे तुम

एक पैसा दे के मैने दुआ थी चाही जब
कह उठा तब था फकीर आसमान लोगे तुम ?


फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,मफ़ाइलुन,फ़ेलुन




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Monday, January 4, 2010

हम तुम्हारे है नहीं कुछ भी मगर

हम तुम्हारे है नहीं कुछ भी मगर
गर मिलें तो जिन्दगी जाये सँवर

बाँकी चितवन और थी तिरछी नजर
चढ़ गई तलवार ज्यों हो सान पर

घटता बढ़ता चाँद तो है बेवफ़ा
रात फ़िर भी है उसी की हमसफ़र

अब महाभारत रुके कैसे भला
आ खड़े हैं जब सभी मैदान पर

भूलना मुमकिन कहाँ है दोस्तो
देखना उसका मुझे यूं आँख भर

ख्वाब तो हैं मुफ़्त में ही बँट रहे
नींद लेकिन बिक रही है दाम पर

कौरवों में पाँडवो में था समर
आ गया इल्जाम लेकिन ‘श्याम‘पर



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