Monday, June 27, 2011

छंद मन व तन में सकारात्मक संवाद करवाता है---श्याम सखा श्याम



                                            छंद  आनन्द का प्रतीक होता है।.
                                                           छंद का उल्लेख सबसे पहले वेदों में हुआ है। छंद से जुड़कर साधारण बातें  में गति व यति का आर्विभाव होने लगता है।
                      गति व यति से रस उत्पन्न होता है। यह रस ही आनन्द कहलाता है।
               संसार भर की सभी भाषाएं छंद में ही जीवित रह पाईं हैं- जैसे इजराइल के देश बनने से पहले हिब्रु भाषा ,दुनिया भर में बिखरे यहुदियों की प्राथना भजनो में ही बची थी। 
          आज देवभाषा संस्कृत भी उसी ओर जा रही है। कुछ दिनो बाद यह केवल वेद उपनिषदों, पौराणिक श्लोकों में ही बच पाएगी

                                         छंद, भाषा, संस्कृति, कविता या सभ्यता जितना ही पुराना है।

                                          छंद है क्या?
              आइये!  देखें \

     भारतीय  समय गिनने की प्रकिर्या को समझने का प्रयास करने से छंद को समझने में सहायक होगा।

   दस दीर्घमात्रिक शब्द बोलने पर जितना समय लगता है==== १ सासं या प्राण कहलाता है

                                  ६ प्राण=== १ पल

                                 ६० पल === १ घड़ी

                                ६० घड़ी==== १ दिन

                               २.५ घड़ी====== १ घंटा  === ९०० सांस या प्राण

                                 १ मिनट== १५ सांस

                    छ्ंद के उच्चारण से सांस की गति एक तान हो जाती है। 

                   मन स्थिर हो जाता है एवम्‌ ध्यान की क्षमता पा जाता है।

                    ध्यान से चेतना में नवांतर हो हो जाता है और फ़िर मस्तिष्क का अणु-अणु जीवंत हो उठता है।

                                             छंद  जब अन्तर्मन से उठता है तो जीवन अर्थवान होने लगता है।

                                       इस प्रकार छंद की पुनरावृति [ जाप ]नये अर्थ का वाहक बनकर प्रगट होती है।


                                    छंद की पुनरावृति से मानव की नकारात्मकता, सकारात्मकता में बदलने लगती है।

                                      इस अवस्था को ही समाधि कहा जाता है। 
    
                                  शरीर में प्राण व मन ही निर्णय करने वाले होते हैं।

                                जब मन गलत निर्णय लेता है तो प्राण [ सांस ] की गति बढ जाती है,

                               गुस्से व झूठ बोलते वक्त- [यही तथ्य लाई-डिक्टेटिंग मशीन का आधार है] 

                                 छंद के उपयोग से ही शरीर में सकारात्मक उर्जा उत्पन्न होती है- जो मन को नवान्तर या समाधि की अवस्था में ले जाता है

                                   लिपिबद्ध छंद ही मन्त्र कहलाता है। मन्त्र का शाब्दिक अर्थ है-- मन की बात

                                         छंद मन व तन में सकारात्मक संवाद करवाता है

                                            छंद [ मन्त्र ] के सस्वर उच्चारण से वातावरण में ऊर्जा उत्पन्न होकर वायुमंडल में फ़ैलती है।, जिससे तरंगे उत्पन्न होकर आसपास को अपने प्रभाव क्षेत्र में ले लेती हैं। ऐसा अनुभव सभी को, किसी संगीत के महफ़िल या भजन संध्या पर अकसर हुआ होगा।

                         छंदो के जाप से उत्पन्न ध्वनि ऊर्जा व तरंगे साफ़ अनुभव की जा सकती हैं। इस अनुभव की सतत अनूभूति ही समाधि की अवस्था कहलाती है।

     य़ही नही  इस अवस्था प्राप्त व्यक्ति के समीप भी इस ऊर्जा को अनुभव किया जा सकता है।

                 इसी वजह से संसार के सभी धर्मों में जाप का प्रचलन हुआ है








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Friday, June 24, 2011

जिन्दगी-भर उदास रहना था ?-- gazal shyam skha shyam


24


जिन्दगी-भर उदास रहना था
फिर तो मेरे ही पास रहना  था

थे यहाँ तो महज अँधेरे ही
तुझको लेकर उजास रहना था


आमों मे वो तो हो गये हैं बबूल
उनको तो बन के खास रहना था




सब थे नंगे हमाम में फ़िर भी
तुमको तो बालिबास रहना था


देख कर तेरे हुस्न का जल्वा
किसको होशो-हवास रहना था

फ़ाइलातुन,मफ़ाइलुन,फ़ेलुन




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Thursday, June 16, 2011

गुल गुलामी करे है मौसम की-----gazal shyam skha shyam

   जब कि हर दिल में प्यार रहता है
   दिल क्यों फिर बेकरार रहता है


  गुल गुलामी करे है मौसम की
 मस्त हर वक्त खार रहता है


 भूल जाते हैं दोस्त को हम लोग
 दिल पे दुश्मन सवार रहता है


वक्त तो लौटकर नहीं आता
शेष बस    इन्तजार रहता है



 ‘श्याम’ अहसान चीज है जालिम
   जिन्दगी भर उधार रहता है


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Friday, June 10, 2011

जिन्दगी-भर उदास रहना था ?-- gazal shyam skha shyam


24 .

जिन्दगी-भर उदास रहना था
फिर तो मेरे ही पास रहना  था

थे यहाँ तो महज अँधेरे ही
तुझको लेकर उजास रहना था

आमों मे वो तो हो गये हैं बबूल
उनको तो बन के खास रहना था



सब थे नंगे हमाम में फ़िर भी
तुमको तो बालिबास रहना था

देख कर तेरे हुस्न का जल्वा
किसको होशो-हवास रहना था

फ़ाइलातुन,मफ़ाइलुन,फ़ेलुन



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Monday, June 6, 2011

खुद से आखिर कितना बोलूं मैं-- gazal shyaam skha shyam

खुद से आखिर कितना बोलूं मैं
क्या बस अपना चेह्‌रा  देखूं मैं

अपने भी दिखते हैं बेगाने
दोस्त किसे अपना समझूं मैं

आईनो की तन्हा मह्फ़िल में
खुद में खुद को कब तक ढूंढूं मैं

देख तुझे यह हाल हुआ है
जब भी सोचूं तुझको सोचूं मैं

‘श्याम’सखा गर हो जाये मेरा
निशिदिन रास-रचाऊं, नाचूँ मैं





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Wednesday, June 1, 2011

कुछ न करने से तो जाये है हुनर-- gazal shyam skha shyam


23
आज कुछ नर्म-सी बातें कर लें
बैठ तो मर्म की बातें कर लें

हो चले ठण्डे सभी रिश्ते तो
आओ कुछ गर्म-सी बातें कर लें

ज्ञान की खुल ही न जाये कलई
आओ कुछ धर्म की बातें कर लें

कुछ न करने से तो जाये है हुनर
मुफ़्त ही कर्म की बातें कर लें

है न कोई कि जो फ़ेंके पत्थर
चुपके-से शर्म की बातें कर लें



फ़ाइलातुन फ़इलातुन,फ़ेलुन ४.४.९२ गोहाना ५ पी एम


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Sunday, May 29, 2011

जिस्म तो तूने नवाजा, खूबसूरत है उसे- gazal shyam skha shyam


कोई मेरे जख्म सी दे, चैन आये तब कहीं
कोई मेरे गम खरीदे, चैन आये तब कहीं


जिस्म तो तूने नवाजा, खूबसूरत है उसे 
गर कहीं से रूह भी दे, चैन आये तब कहीं


सूखकर सहरा हुए हैं, नैन मेरे देख तो 
इनको सुख की भी नमी दे, चैन आये तब कहीं


छू रहे हैं दुश्मनों वेफ हौसले आकाश को 
उनको भी तू इक गमी दे चैन आये तब कहीं


है लबालब झोली मौसम की गमों से भर रही
खारों को भी तू हँसी दे, चैन आये तब कहीं


हैं लगी लाशें भी अपना चैन खोने आजकल
मौत को भी जिं  दगी दे चैन आये तब कहीं


अश्क तो तूने बहुत मुझको दिये हैं ऐ खुदा 
पर लबों को तू हँसी दे चैन आये तब कहीं


है जहाँ मातम उन्हें तू हौसला कर अता
जो है माँगा वो सभी दे चैन आये तब कहीं 
फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ेलुन[ फ़ाइलुन]



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Saturday, May 14, 2011

मतलबी हैं लोग इन शहरों के-- gazal


21
जग-दिखावे की अदा मत करना
भूल जाना पर दगा  मत करना 


जख्म जो तुमने दिया,अब उस पर
अपने दामन से हवा मत करना


है नहीं ये जख्म भरने वाला
खामखा इसकी दवा मत करना


नेकियां तो हो गई गुम यारो
अब किसी का तुम भला मत करना


चाहो गर तुमको सताये न कोई
फिर किसी का तुम बुरा मत करना


अब कहां सुनता है वो फरियादें
तुम इबादत या दुआ मत करना


लोग पूछेंगे उदासी का सबब
हाशिये को तुम सफा मत करना


मतलबी हैं लोग इन शहरों के
इनसे तुम रस्मो-वफा मत करना


धन तो है ही चीज आनी जानी
धन पे झूठी तुम अना मत करना


दिल-फरेबों की है बस्ती ऐ ‘श्याम’
दिल किसी को भी अता मत करना


फ़ाइलातुन।फ़ाइलातुन।फ़ेलुन



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Tuesday, May 3, 2011

है घाटे का सौदा मुहब्बत सदा---gazal shyam skha shyam


20


मुहब्बत की वापिस निशानी करें।
शुरू फिर जो चाहें कहानी करें।।


है घाटे का सौदा मुहब्बत सदा।
हिसाब अब लिखें या जुबानी करें।।


चलो नागफनियाँ उखाड़ें सभी।
वहाँ फिर खड़ी रात-रानी करें।।


है रुत पर भला बस किसी का चला।
चलो बातें ही हम सुहानी करें।।


खरीदे बुढापे को कोई नहीं।
सभी तो पसन्द अब जवानी करें।।


बहुत जी लिये और मर भी लिये।
बता क्या तेरा जिन्दगानी करें।।


रवायत नहीं ‘श्याम’ जब ये भली।
तो फिर बातें क्यों हम पुरानी करें।

फ़ऊलुन।फ़ऊलुन।फ़ऊलुन।फ़ऊलुन


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Tuesday, April 12, 2011

हमारे आपके उस रूठने के दरमियां--gazal

19
हाँ हमारे आपके उस रूठने के दरमियां
चुपके-चुपके बोलती थीं बस हमारी चिटि~ठयां

जिन्दगी में जब कभी भी थीं बढ़ी यूँ तल्खियां
शहद कुछ-कुछ घोलती रहती थीं तब ये चिटिठयां

वक्त की मुटठी में बनकर जब महाजन आयीं ये
तोलती थीं ये कभी ज्यादा, कभी कम चिटिठयां

चाहता है दिल कभी जब उसको सहलाये कोई
खोलती हैं जख्म तब बस खामखा ये चिटिठयां

जब भी तनहाई का आलम यारो गहराता गया
आस-पास अपने लगीं तब डोलने ये चिटि~ठयां

आप हमको भूलने लगते हंै जब भी ‘श्याम’ जी
यादों के सन्दूक तब-तब खोलतीं ये चिटिठयां

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Thursday, April 7, 2011

हैं उठ रहीं मेरे मन में खराब-सी बातें--- gazal

 18

हैं उठ रहीं मेरे मन में खराब-सी बातें
 थीं करनी   तुमसे मुझे बेहिसाब-सी बातें



हो तुम  भी, हम भी हैं जब साफगो, उठीं फिर क्यों
हमारे बीच बताओ नकाब-सी बातें

बगैर जाम के मदहोश कर दिया उसने
रहा वो करता ही हर पल शराब-सी बातें

इलाही तुम ही हो क्या रूबरू मेरे सचमुच
हकीकतो में भी होती हैं ख्वाब-सी बातें

खुदा का जिक्र ही होता है कब जहाँ में अब
यहाँ तो होती हैं बस अब अजाब-सी बातें

समझना ‘श्याम’ को आसां नहीं कभी यारो
करे है वो तो सदा बस किताब-सी बातें


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Monday, April 4, 2011

तसुव्वरात में लाऊँ तेरा सलोना बदन

17

तसुव्वरात में लाऊँ तेरा सलोना बदन
कहो मै कैसे भुलाऊँ तेरा सलोना बदन

मगन यूँ होके तुझे मैं निहारूँ, मेरे बलम
पलक-पलक मैं छुपाऊँ तेरा सलोना बदन

नयन तेरे हैं ये मस्ती के प्याले मेरी प्रिया
मैं दिल में अपने बसाऊँ तेरा सलोना बदन

ढलकती-सी तेरी पलकें, ये बांकपन तेरा
नजर से जग की बचाऊँ तेरा सलोना बदन

किताब है ये ग़ज़ल की, कि है ये राग यमन
किसी को मै न सुनाऊँ तेरा सलोना बदन

बड़े कुटिल हैं इरादे जनाब ‘श्याम’ के तो
भला मैं कैसे बचाऊँ तेरा  सलोना बदन

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Tuesday, March 29, 2011

फुटकर शे‘र--श्याम सखा श्याम

 कोई अपना नहीं रहा
दुख: का दरिया नहीं रहा

थी तमन्ना जीऊं बहुत
अब इरादा नहीं रहा

देखकर उसको तो ‘सखा’
दिल ही अपना नहीं रहा





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Friday, March 25, 2011

कौन है अश्कों का सौदागर यहाँ पर दोस्तो --gazal-

 16

हैं अभी आये अभी कैसे चले जाएँगे लोग
हमसे नादानों को क्या और कैसे समझाएँगे लोग

है नई आवाज धुन भी है नई तुम ही कहो
उन पुराने गीतों को फिर किसलिए गाएँगे लोग

नम तो होंगी आँखें मेरे दुश्मनों की भी जरूर
जग-दिखावे को ही मातम करने जब आएँगे लोग

फेंकते हैं आज पत्थर जिस पे इक दिन देखना
उसका बुत चौराहे पर खुद ही लगा जाएँगे लोग

हादसों को यूँ हवा देते ही रहना है बजा
देखकर धूआँ, बुझाने आग को आएँगे लोग

हमको कुछ कहना पड़ा है आज मजबूरी में यूँ
डर था मेरी चुप से भी तो और घबराएँगे लोग

इतनी पैनी बातें मत कह अपनी ग़ज़लों में ऐ दोस्त
हो के जख्मी देखना बल साँप-से खाएँगे लोग

कौन है अश्कों का सौदागर यहाँ पर दोस्तो
देखकर तुमको दुखी, दिल अपना बहलाएँगे लोग

है बड़ी बेढब रिवायत इस नगर की ‘श्याम’ जी
पहले देंगे जख्म और फिर इनको सहलाएँगे लोग


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Monday, March 21, 2011

क्या धरा है भला प्यार में तू बता------gazal-गज़ल

15

खामखा हो दुखी तुम यू जाने-मन
खार तो  देते ही हैं सभी को चुभन

क्या धरा है भला प्यार में तू बता
अश्क, कुछ, कुछ धुआं और थोड़ी जलन

मजिंलों की तरफ है सभी की नजर
देखता  कौन है रास्तों की थकन

बेइमानी, दगा और झूठी कसम
है जमाने का यारो यही तो चलन

बच के रहना जरा ‘श्याम’ से दोस्तो
छल न जाये तुम्हें सांवरा बांकपन


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Wednesday, March 16, 2011

कौन कहता है बुढापे में मुहब्ब्त का सिलसिला नहीं होता-----







देखूं जो तुमको भांग  पीके
अबीर गुलाल लगें सब फ़ीके














मोतियाबिन्दी नयनो  में काजल
्नित करता मुझको है पागल












अदन्त मुंह और हंसी तुम्हारी
इसमे दिखता ब्रह्माण्ड है प्यारी













तेरा मेरी प्यार है जारी
 जलती हमसे दुनिया सारी




क्या समझें ये दुध-मुहें बच्चे
कैसे होते प्रेमी सच्चे









दिखे न आंख को कान सुने ना
हाथ उठे ना पांव चले ना










पर मन तुझ तक दौड़ा जाए
ईलू-इलू का राग सुनाए




हंसते क्यों हैं पोता-पोती
क्या बुढापे में न मुहब्ब्त होती








सुनलो तुम भी मेरे प्यारे
कहते थे इक चच्चा हमारे













कौन कहता है बुढापे में मुहब्ब्त का सिलसिला नहीं होता
आम भी तब तक मीठा नहीं होता जब तक पिलपिला नहीं होता


होली में तो गजल-हज्ल सब चलती है
                                                      
जलने दो गर दुनिया जलती है
ही तो होली की मस्ती है 















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Saturday, March 12, 2011

उनकी बातें हुईं झिड़कियों की तरह------गज़ल

14

घूमना है बुरा तितलियों की तरह
घर भी बैठा करो लड़कियों की तरह

दिल में उतरी थी वो बिजलियों की तरह
जब गई तो गई,आँधियों की तरह

उनकी बातें हुईं झिड़कियों की तरह
जख्म मेरे खुले खिड़कियों की तरह


 





 

आ लिखें ,फ़िर से खत ,एक दूजे को हम
बालपन में लिखीं तख्तियों की तरह

देखकर,आपको धड़कने ,हैं हुई
कूदती,फाँदती हिरनियों की तरह

जल गये मेरे अरमां सभी के सभी
फूंक डाली गईं झुग्गियों की तरह

छोड़ कर चल दिये वो हमें दोस्तो
आम की चूस लीं गुठलियों की तरह

बात अपनी कहो कुछ मेरी भी सुनो
शोख चंचल खिली लड़कियों की तरह

जिन्दगी फिर रही है तड़पती हुई।
जाल में फँस गई मछलियों की तरह

प्यार करना ही है गर तुम्हें तो करो
मीरा, राधा या फिर गोपियों की तरह


काश हो जाते हम नामवर दोस्तो
मिट गई प्यार में हस्तियों की तरह

चाहते आप ही बस नहीं हैं हमें
घूमता है जहां फिरकियों की तरह

आज मायूस है क्यों वो, कल तक जो थी
खेलती कूदती हिरनियों की तरह

माफ कर दें इन्हें आप भी ‘श्याम’ जी
आपकी अपनी ही गलतियों की तरह


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Thursday, March 10, 2011

क्यों हैं करती,दुश्मनी खुद औरतों से औरतें---- gazal

 71/८९

औरत के बहुआयामी जीवन एवम्‌ व्यक्तित्व पर केन्द्रित एक गज़ल-
मेरा मानना है के स्त्री पृकृति की सबसे पूर्ण कृति है,पुरुष उसके सामने स्वय़ं को बौना पाता है,अधूरा महसूस करता है,
इसीलिये वह कभी एट्म बम,कभी चंद्र्यान ,कभी किले,महल तो कभी नये-नये धर्म ईजाद करता दिखता है,
जबकि स्त्री शिशु को जन्म देकर, उसका पालन-पोषण कर जीवन की पूर्णता, पाकर संतुष्ट् हो जाती है इसीलिए उसे कभी कोई धर्म ईजाद करने
की जरूरत महसूस नहीं हुई।
श्याम सखा ‘श्याम
1
काँच का बस एक घर है लड़कियों की जिन्दगी
और काँटों की डगर है लड़कियों की जिन्दगी
2
मायके से जब चले है सजके ये दुल्हिन बनी
दोस्त अनजाना सफर है लड़कियों की जिन्दगी
3
एक घर ससुराल    है तो दूसरा     है मायका
फिर भी रहती दर-ब-दर है लड़कियों की जिन्दगी
4
खूब देखा, खूब परखा, सास को आती न आँच,
स्टोव का फटना मगर है लड़कियों की जिन्दगी
5
पढलें लिखलें और करलें  नौकरी भी ये भले
सेज पर सजना मगर है लड़कियों की जिन्दगी
6
इस नई तकनीक ने तो है बना दी कोख भी
आह कब्रिस्तान भर है लड़कियों की जिन्दगी
7
कारखानों अस्पतालों या घरों में भी तो यह
रोज लड़ती इक समर है लड़कियों की जिन्दगी

8
लूटते इज्जत हैं इसकी मर्द ही जब, तब कहो
क्यों भला बनती खबर है लड़कियों की जिन्दगी
9
बाप मां के  बाद   अधिकार है भरतार का
फर्ज का संसार भर है लड़कियों की जिन्दगी
10
हो रहीं तबदीलियां दुनिया में अब तो हर जगह
वक्त की तलवार पर है लड़कियों की जिन्दगी
11
क्यों हैं करती दुश्मनी खुद औरतों से औरतें
बस दुखी यह जानकर है लड़कियों की जिन्दग+ी
12

13
किस धरम, किस जात में इन्साफ इसको है मिला
जीतती सब हार कर है लड़कियों की जिन्दगी
14
हो अहल्या या हो मीरा या हो बेशक जानकी
मात्र चलना आग पर है लड़कियों की जिन्दगी
15
द्रोपदी हो, पद्मिनी हो,  हो भले ही डायना
रोज लगती दाँव पर है लड़कियों की जिन्दगी
16
एक रजिया एक लक्ष्मी और इन्दिरा जी भला
क्या नहीं अपवाद-भर है लड़कियों की जिन्दगी
17
क्या जवानी क्या बुढ़ापा या भले हो बचपना
सहती हर दम बद नजर है लड़कियों की जिन्दगी
18
हों घरों में, आफिसों में, हों सियासत में भले
क्या कहीं भी मोतबर है लड़कियों की जिन्दगी
19
औरतों के हक में हों कानून कितने ही बने
दर हकीकत बेअसर है लड़कियों की जिन्दगी
20
तू अगर इसको कभी अपने बराबर मान ले
फिर तो तेरी हमसपफर है लड़कियों की जिन्दगी
21
घर भी तो इनके बिना बनता नहीं घर दोस्तो
क्यों भला फ़िर घाट पर है लड़कियों की जिन्दगी
22
आह धन की लालसा का आज ये अंजाम है
इश्तिहारों पर मुखर है लड़कियों की जिन्दगी
23
क्यों हैं करती,दुश्मनी खुद औरतों से औरतें
बस दुखी यह जानकर है लड़कियों की जिन्दगी
23/a
कर नुमाइश जिस्म की क्या खुद नहीं अब आ खड़ी
नग्नता के द्वार पर है लड़कियों की जिन्दगी
24
प्यार करने की खता करलें जो कहीं  ये कभी
तब लटकती डाल पर है लड़कियों की जिन्दगी
25
जानती सब, बूझती सब, फिर भला क्यों बन रही
हुस्न की किरदार भर है लड़कियों की जिन्दगी
26
ठीक है आजाद होना, हो मगर उद्दण्ड तो
कब भला पायी सँवर है लड़कियों की जिन्दगी
27
माँ बहन बेटी कभी पत्नी कभी,कभी है प्रेयसी
जानती क्या-क्या हुनर है लड़कियों की जिन्दगी

28
मुम्बई हो,    कोलकाता,    राजधानी देहली
चल रही दिल थामकर है लड़कियों की जिन्दगी
29
ले रही वेतन बराबर,हक बराबर, पर नहीं
इतनी सी तकरार भर है लड़कियों की जिन्दगी
30
आदमी कब मानता इन्सान इसको है भला
काम की सौगात भर है लड़कियों की जिन्दगी
31
शोर करते हैं सभी तादाद इनकी घट रही
बन गई अनुपात भर है लड़कियों की जिन्दगी

32

ठान लें जो कर गुजरने की कहीं ये आज भी
पिफर तो मेधा पाटकर है लड़कियों की जिन्दगी
33
क्यों नहीं तैतीसवां हिस्सा भी इसको दे रहे,
आधे की हकदार गर है लड़कियों की जिन्दगी
34
देवता बसते वहाँ है पूजते नारी जहाँ
क्यों धरा पर भार भर है लड़कियों की जिन्दगी
35
हाँ, कहीं इनको मिले गर प्यार थोड़ा दोस्तो
तब सुधा की इक लहर है लड़कियों की जिन्दगी
36
मैंने तुमने और सबने कह दिया सुन भी लिया
क्यों न फिर जाती सुधर है लड़कियों की जिन्दगी
37
माफ मुझको अब तू कर दें ऐ खुदा मालिक मेरे
हाँ यही किस्मत अगर है लड़कियों की जिन्दगी
38
‘कल्पना’ को ‘श्याम’ जब अवसर दिया इतिहास ने
उड़ चली आकाश पर है लड़कियों की जिेन्दगी


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Monday, March 7, 2011

मौत से क्यों है डरे ’इतना जमाना-----गज़ल


बात इक मुझको बहुत भाती है यारब
याद उसको भी मेरी आती है   यारब

मोड़ बाकी हैं कई मंजिल तलक तो
ये हवा यूँ मुझको समझाती है यारब

मौजों से रंजिश, किनारों से अदावत
देखें कश्ती ले कहाँ जाती है यारब

पात झड़ने पर है क्यों मायूस गुलशन
रुत यही लेकर बहार आती है यारब

कैसे मसले जग के सुलझाएगा वो शख्स
रूह जिसकी जबकि जज्बाती है यारब

बैठे है हम तो दिये दिल के जलाकर
आंधी क्यों डर हमको दिखलाती है यारब

हैं गुजरते लम्हे जब सदियों की मानिन्द
तब कहीं शब वस्ल की आती है यारब

मौत से क्यों है डरे इतना जमाना
मौत के ही बाद जीस्त आती है यारब

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Tuesday, March 1, 2011

दिल बहलाने की इक तदबीर खरीदोगे---गज़ल

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बेच रहा हूँ बिगड़ी-सी तकदीर खरीदोगे
है दिल बहलाने की इक तदबीर खरीदोगे

खौफ़े- जख्म जिसे  हो, घर अपने वो बैठ रहे 
बिखरी हैं बाजारों में  शमसीर खरीदोगे

बहुत सँभल के झांकें इस आईने में हमदम
दिखला देता है  सबको तस्वीर खरीदोगे   

 
आजादी के परचम तो नीलाम हुए सारे
शेष बची है जंग लगी जंजीर खरीदोगे


साथ समय के महल* किले* बारादरियां उजड़ीं ?
गम की इमारत* करता हूँ तामीर खरीदोगे *









 





गिरवी आज महाजन  घर है रौनक मौसम का
सस्ती बिकती खिलवत की जागीर खरीदोगे।।

‘श्याम’कहां अब हाथ तुम्हारे है आनेवाला।
बस है बाकी उसकी इक तहरीर खरीदोगे।।



 फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन.फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ा
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