
दिल में उतरी थी वो बिजलियों की तरह
जब गई तो गई आंधियों की तरह
जख्म मेरे खुले खिड़कियों की तरह।।
जल गये मेरे अरमां सभी के सभी।
फूंक डाली गई झुग्गियों की तरह।।
छोड़ कर चल दिये वो हमें दोस्तो।
आम की चूस लीं गुठलियों की तरह।।
बात अपनी कहो कुछ मेरी भी सुनो।
शोख चंचल खिली लड़कियों की तरह।।
जिन्दगी फिर रही है तड़पती हुई।
जाल में फँस गई मछलियों की तरह।।
प्यार करना ही है गर तुम्हें तो करो।
मीरा, राधा या फिर गोपियों की तरह।।
काश हो जाते हम नामवर दोस्तो।
कैस,मजनूं या फिर रोमियों की तरह
आ लिखें,फ़िर से खत,एक दूजे को हम
बालपन में लिखीं तख्तियों की तरह
देखकर,आपको धड़कने ,हैं हुई
कूदती,फाँदती हिरनियों की तरह
टूट ही तो गये मेरे सपने सभी
पनघटों पे टूटी मटकियों की तरह
चाहते आप ही बस नहीं हैं हमें।
घूमता है जहां फिरकियों की तरह।।
माफ कर दें इन्हें आप भी ‘श्याम’ जी।
आपकी अपनी ही गलतियों की तरह।।
घूमना है बुरा तितलियों की तरह।
घर भी बैठा करो लड़कियों की तरह।।














