जानेमन इतनी तुम्हारी याद आती है कि बस
रूह मिलने के लिये यूं कसमसाती है कि बस
तेरी सांसे जब मिलीं थी मेरी सांसों से सनम
वो घड़ी बिजली बनी सी कौंध जाती है कि बस
ये विरह का दुख सगा सा हो गया है दोस्तो
शूल सी इसकी चुभन इतना सताती है कि बस
रास्तों की धूल ने मुझको सिखाए ये हुनर
आंधी तूफां बन के वो क्या-क्या उड़ाती है कि बस
देखता जब भी तुझे हूं सुन मेरी तू गुलबदन
साँस थमती और धड़कन लड़खड़ाती है कि बस
कारसाजी उसकी का अब जिक्र भी मैं क्या करूं
खुद ही देकर जख्म वो मरहम लगाती है कि बस
वक्त की रफ्तार बेढ़ब हैं सभी कहते यही
अपनो को भी यह पराए जो बनाती है कि बस
'श्याम' यूं है बस गया मेरे जिहन में दोस्तो
नाम लेते ही जुबां यूं लड़खड़ाती है कि बस
फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइ्लुन
photo by-shyam skha












