Monday, August 31, 2009

चुप भी तो रह पाना मुश्किल-gazal

अपनों को समझाना मुश्किल
चुप भी तो रह पाना मुश्किल

खोना मुश्किल पाना मुश्किल
खाली मन बहलाना मुश्किल

मौन रहें, तो बात बने कब
कहकर भी सुख पाना मुश्किल

बैरी सावन बरसे रिमझिम
रातों का कट पाना मुश्किल

सुलझों को उलझाना आसां
उलझों को सुलझाना मुश्किल

3-dbkgm se

Sunday, August 23, 2009

फ़रिश्ता खुद्कुशी करने लगा-श्याम सखा

बहुत लोगों ने बहुत कुछ कहा है गज़ल के बारे में। मुझे लगता है कि हिन्दी भाषा में गीत एक पारम्परिक छंद होने के कारण आम साहित्य अनुरागी गीत की परिभाषा जानता समझता है अत: हिन्दी गज़ल क्षेत्र के नवांगन्तुक को पहले गीत व गज़ल में क्या अन्तर है समझ लेना चाहिये तब गज़ल लेखन में आगे बढ़्ना चाहिये। संक्षिप्त आलेख इस ओर एक कदम है कुछ उदाहरणों से आरम्भ करते हैं इस अन्तर को समझने के लिये ,


१- बदला-बदला देख पिया को चुनरी भीगे सावन में

२-बस यह हुआ कि उसने तक्ल्लुफ़ से बात की
रो-रो के रात हमने दुपट्टे भिगो लिये
या

मेरी उम्र से दुगनी हो गई
बैरन रात जुदाई की


ये न थी हमारी किस्मत कि विसाले यार होता
अगर और जीते रहते ,यही इन्तजार होता

जाग-जागकर काटूँ रतियां
सावन जैसी बरसें अँखियां

२ उठाके पाय़ँचे चलने का वो हंसी अन्दाज
तुम्हारी याद में बरसात याद आती है

अब देखिये इन तीनो उदाहरणों मे नंबर १ या नीले रंग से अंकित पंक्तियां गीतांश हैं और अंकितनं २ या गेरूए रंग से पंक्तियां शे‘र हैं
जबकि भाव एक ही हैं।यानि हम कह सकते हैं
कि गीत में स्त्रैण कोमलता है
,जबकि गज़ल कहने में पुरुषार्थ झलकता है।
या गीत सीधे-सरल राह से अभिव्यक्ति का माध्यम है,
वहीं गज़ल एक पहाडी घुमावदार पगडंडी है।
जैसे पहाड़ी पगडंडी पर पहली बार सफ़र कर रहे मुसाफ़िर को यह पूर्व अनुमान नहीं होता कि
अगले मोड़ पर पगडंडी दाईं तरफ़ मुड़ेगी या बाईं तरफ़,ऊपर की और पहाड़ पर चढ़ेगी
या आगे ढ़्लान मिलेगा इसी तरह शे’र के पहले मिस्रे[पंक्ति] को सुन या पढकर श्रोता या पाठक जान ही नहीं पाता किअगले मिस्रे मेंशायर क्या कहेगा।और अनेक बार दूसरा मिस्रा श्रोता को चमत्कृत कर जाता और यह चमत्कृत करने का अन्दाज ही ग़ज़ल की खसूसियत है-इसे और महसूस करें

और चमत्कृत हुआ महसूस करें
ये शे’र वसीम बरेलवी साहिब के हैं।

अपनी सुबह के सूरज उगाता हूँ खुद
[अब थोड़ा रुक कर सोचिये कि आगे क्या कहा जा सकता है ?]

जब्र का जहर कुछ भी हो पीता नहीं
[अब थोड़ा रुक कर सोचिये कि आगे क्या कहा जा सकता है ?]




जमीन तो जैसी है वैसी ही रहती है लेकिन
[यहां भीथोड़ा रुक कर सोचिये कि आगे क्या कहा जा सकता है ?]

अब ये तीनो शे’र पूरे पढ़ें और देखें आप चमत्कृत होते हैं या नहीं

अपनी सुबह के सूरज उगाता हूं खुद
मैं चरागों की सांसो से जीता नहीं

जब्र का जहर कुछ भी हो पीता नहीं
मैं जमाने की शर्तों पे जीता नहीं

जमीन तो जैसी है वैसी ही रहती है लेकिन
जमीन बाँटने वाले बदलते रहते हैं

एक और बात


यति और गति या ग्त्यात्मकता और लयात्मक्ता के बिना गज़ल का अस्तित्व ही नहीं हो सकता।क्योंकि गज़ल की बुनियाद सरगम की तरह संगीत के आधार पर[और कहें तो गणित के आधार पर] टिकी है।गज़ल का हर शे‘र अपने आप में सम्पूर्ण तो होता ही है,
वह श्रोता या पाठक को अद्भुत,आकर्षक,अनजाने और एक निराले अर्थपूर्ण अनुभव तक ले आने में सक्षम होता है।
देखें कुछ उदाहरण

चाँद चौकीदार बनकर नौकरी करने लगा
उसके दरवाजे के बाहर रोशनी करने लगा

चाँद को चौकीदार केवल गज़ल का शायर ही बना सकता है

बाल खोले नर्म सोफ़े पर पड़ी थी इक परी
मेरे अन्दर एक फ़रिश्ता खुद्कुशी करने लगा

अब बतलाएं फ़रिश्ते को खुद्कुशी करवाना शायर ,गज़ल के शायर् के अलावा और किसके वश में है।
ऐसा विचित्र एवम चमत्कृत करने वाला अनुभव साहित्य की किस विधा में मिल सकता है
कुछ और उदाहरण देखें
तुझे बोला था आँखे बंद रखना
खुली आँखों से धोखा खा गया ना

मेरे मरने पे कब्रिस्तान बोला
बहुत इतरा रहा था आ गया ना
(जनाब-दिनेश दर्पण)
मित्रो एक बात और गज़ल की सारी कमनीयता,सौष्ठव व चमत्कृत करने की क्षमता बहर या छंद पर ही टिकी है.
हम कह सकते हैं कि गज़ल शब्दों की कलात्मक बुनकरी है ।
अगर हम उपरोक्त शेर को बह्र के बिना लिखें
मरने पे मेरे कब्रिस्तान बोला
इतरा रहा था बहुत आ गया ना

आप ही कहें सारे शब्द वही हैं ,केवल उनका थोड़ा सा क्रम बदलने से क्या वह आनन्द जो पहली बुनकरी में था,गायब नहीं हो गया।बस इसी लिये बहर का ज्ञान आवश्यक है।

[ मित्रो ! मैं अपनी यूरोपिय यात्रा के अन्तिम चरण में व्यस्त होने के कारण नई गज़ल पोस्ट नहीं कर पा रहा था अत: यह संक्षिप्त आलेख जो ब्लॉग जगत व अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ और पसन्द किया गया ,यहां दोबारा पोस्ट कर रहा हूं ३० अगस्त को भारत लौटकर नई ग़ज़ल नियमित पोस्ट होगी वादा रहा तब तक इस का लुत्फ़ उठाएं ]

Sunday, August 16, 2009

फ़ुटकर शे' र- 5


दोस्त तो सिर्फ़ दोस्त होता है
दोस्त खोटा खरा नहीं होता

संजीव गौतम said... अच्छा शेर है. पूरी ग़ज़ल भी कह डालिये

भाई संजीव गौतम जी ,फ़ुटकर शेर के अन्तर्गत मैं अपने वे शेर भर पोस्ट कर रहा हूं जो कम से कम १०-१५ वर्ष पूर्व हुए और जिन पर मैं आगे और कुछ नहीं लिख पाया,और मैने आमतौर पर कोई शब्द भी नहीं लिखता जब तक वह मन में आकर बगाव्त न करे बाहर आने की ३-४ अच्छी नामीगिरामी पत्रिकाओं ने समसामयिक लेख लिखने पत्रों ने फ़ीचर या कॉलम हेतु भी आमन्त्रण दिया पर मै नही कर पाया अत: गजल कभी पूरी हुई तो हो मैं कोशिश करने का वादा नहीं कर सकता और अब तो भाई दीक्षित दनकौरी ने इस जमीन पर एक बेहतर गज़ल लिख दी है अत; यह शेर लेकर गज़ल पूरी करना बेमानी व गल्त होगा,भाई दीक्षित दनकौरी का शेर देखें



या तो होता है या नहीं होता
शे’र अच्छा बुरा नहीं होता

Monday, August 10, 2009

सबका हिसाब रखता है/गज़ल


26
लिख के सबका हिसाब रखता है
दिल में ग़म की किताब रखता है


कोई उसका बिगाड़ लेगा क्या
खुद को खानाखराब रखता है



आग आँखों में और मुट्ठी में
वो सदा इन्किलाब रखता है



जो है देखें जमाने की सीरत
खुद को वो कामयाब रखता है



उसकी नाजुक अदा के क्या कहने
मुटठी में माहताब रखता है



बाट खुशियों की जोहता है तू
दिल में क्यों फिर अजाब रखता है


आइने से कर लड़ाई ,कि वो
कब किसी का हिजाब रखता है



उससे क्या गुफ़्तगू करोगे तुम
वो सभी का जवाब रखता है


श्यामचितचोर, है नचनिया है
कैसे-कैसे खिताब रखता है

फ़ाइलातुन,मफ़ाइलुन,फ़ेलुन

मेरा एक और ब्लाग
http://katha-kavita.blogspot.com/

Tuesday, August 4, 2009

मुझे दे के थपकी सुलाने लगी है-gazal


मुझे दे के थपकी सुलाने लगी है
हवा देखिये मुस्कराने लगी है

समन्दर मिला आसमां से उफ़नकर
नदी आज फ़िर खिलखिलाने लगी है

लिपटते जो देखा भंवर को कली से
नवेली सी दुल्हन लजाने लगी है

कभी दूर जाकर कभी पास आकर
मुहब्बत ग़ज़ल गुनगुनाने लगी है


न कोई रहा है,न कोई रहेगा
घड़ी हर घड़ी यह जताने लगी है

महकती,बहकती हवा कह रही है
मिलन यामिनी पास आने लगी है

हुई बन्द धड़कन,रुकी सांस मेरी
'सखा' याद तेरी यूं आने लगी है


गज़ल गीत सुनकर सखा जी[मेरी जां] तुम्हारे
जमाने पे मस्ती सी छाने लगी है

फ़ऊलुन,फ़ऊलुन,फ़ऊलुन,फ़ऊलुन

--

इस वादे के साथ कि आप का समय व्यर्थ न होगा
आप यहां भी आमन्त्रित हैं
http://katha-kavita.blogspot.com/

Sunday, August 2, 2009

एक फ़ुटकर शे'र/ श्याम सखा




यूं तो जब तब है घन बरसे
सावन तब है जब मन बरसे

मित्रो आज यहां जेनेवा जमकर बारिश हो रही है तो एक पुराना शे'र याद आया आपकी नजर कर रहा हूं

Wednesday, July 29, 2009

गज़ल - श्याम सखा श्याम



बने फिरते थे जो जमाने मे शातिर
पहाड़ों तले आये वे ऊंट आखिर

छुपाना है मुश्किल इसे मत छुपा तू
हुई है सदा ही मुह्ब्बत तो जाहिर

बना क़ैस ,रांझा बना था कभी मैं
मेरी जान सचमुच मैं तेरी ही खातिर

खुदा को भुलाकर तुझे जब से चाहा
हुआ है खिताब अपना तब से ही काफिर

बनी को बिगाड़े, बनाये जो बिगड़ी
कहें लोग हरफ़न में उस को तो माहिर

मुझे छोड़कर तुम कहां जा रहे हो
हमीं दो तो हैं इस सफर के मुसाफिर

तेरी खूबियां 'श्याम' सब ही तो जाने
खुशी हो कि हो ग़म तू हरदम है शाकिर

फ़ऊलुन,फ़ऊलुन,फ़ऊलुन,फ़ऊलुन
शाकिर _ शुक्रगुजार,हरबात पर गम या खुशी देने पर खुदा का शुक्र करने वाला

Friday, July 24, 2009

फ़ुटकर -शे‘र---4


न सुनना ही सीखा,न कहना ही आया
मुझे दिल मिला था,जुबां भी मिली थी


फ़ऊलुन,फ़ऊलुन,फ़ऊलुन,फ़ऊलुन

Monday, July 20, 2009

गज़ल श्याम सखा


तू आर हो जा या पार हो जा  
पर इक तरफ मेरे यार हो जा


या तो सिमट कर रह मेरे दिल में

या फैल इतना, संसार हो जा

जो जुल्म बढ़ जाये हद से ज्यादा

तजकर अहिंसा हथियार हो जा


गुल था शरारत करने लगा जब

तितली ने कोसा जा खार हो जा

सूखा है मौसम, सूखी हूँ मै भी

अब प्यार की तू रसधार हो जा


गर थी तुझे धन की कामना तो

किसने कहा था फनकार हो जा


राधा भी तेरी, मीरा भी तेरी

तू ‘श्याम’ मेरा इस बार हो जा



मुस्तफ़इलुन फ़ा ,मु्स्तफ़इलुन फ़ा

Monday, July 13, 2009

दिल ग़म से बेहाल रहा है

दिल ग़म से बेहाल रहा है
हाल ये सालों-साल रहा है

मौत न जाने कैसी होगी
जीवन तो जंजाल रहा है

शक तो है मन में बैठा फिर
घर को क्यों खंगाल रहा है

वक्त का कैसे करूँ भरोसा
चलता टेढ़ी चाल रहा है

हैं उस पर भी गम के साये
जो अब तक खुशहाल रहा है

क्या दिखलाऊँ दिल की दौलत
ग़म से माला -माल रहा है

दूर-दूर ही रहे अँधेरे
जब तक सूरज लाल रहा है

Thursday, July 9, 2009

फ़ुटकर -शे‘र---3




यूं तुझको भूल जाता इतना मैं नादान कब था
वैसे तुझको भुलाना मेरी जां आसान कब था

मफ़ाएलुन,मफ़ाएलुन,मफ़ाएलुन,फ़ऊलुन

गलतियां आखिर गलतियां ही होती हैं ना,अब देखिये गलतियां ड्राफ़्ट में पड़ीं थी अपनेआप गलती से दोबारा पोस्ट हो गई-असुविधा के लिये खेद है
श्याम

Monday, July 6, 2009

कौन करता नहीं गलतियां-गज़ल


करते तो हैं सभी गलतियां
ढूंढते बस मेरी गलतियां

सामने आएंगी एक दिन
दोस्तो, आपकी गलतियां

तल्खियां ही मुझे दे गईं
थीं बडी मतलबी गलतियां

लूटकर ले गईं चैन ही
ये मरीं दिलजली गलतियां

लडकियां जब हुई थीं जवां
तब हुई मतलबी गलतियां

खौफ़े औलाद ने दी छुडा
आपसे ’श्याम’ जी गलतियां

2

कौन करता नहीं गलतियां
हर तरफ ही खड़ीं गलतियां

ये असर सजा का हुआ
रोज बढ़ती गईं गलतियां

आदमी तो था मैं काम का
आप ने ढूंढ लीं गलतियां

हर कदम,हर दिवस, उम्र भर
साथ मेरे रहीं गलतियां

नासमझ मैं नहीं जब रहा
मुझको अपनी लगीं गलतियां

खूब है आपका ये हुनर
नाम मेरे लिखीं गलतियां

भागने जब लगेश्यामजी
सामने खड़ीं गलतियां

फ़ाइलुन,फ़ाइलुन,फ़ाइलुन

कुछ युवा मित्रों ने गज़ल छंद सीखने की इच्छा ज़ाहिर की है मैने उन्हे लिखा था कि वे प्रारम्भिक ज्ञान‘श्री सतपाल खयाल के ब्लॉग आज की गजल, पर श्री प्राण शर्मा के गज़ल संबंधी लेख पढ़ लें ,फिर कोई जिज्ञासा हो तो मुजे लिखें मैं यथा अपनी सामर्थ्य कोशिश करूंगा उन्ही हेतु यह प्रयोग है आज का
आज की गज़ल हेतु ,एक ही रदीफ़ व बहर की दो गज़ल पोस्ट कर रहा हूं।
जैसा आप देख लेंगे यहां एक गज़ल में काफ़िये में अनुस्वार है,दूसरी में काफ़िये
बिना अनुस्वार के हैं।इससे नव गज़लकारों को काफ़िये की इस विशेष स्थिति के बारे में पता लगेगा
यही नही दूसरी गज़ल का मक्ता यूं बेहतर दिखता
कौन करता नहीं गलतियां
हर तरफ हर कहीं गलतियां
मगर यहां काफ़िये हैं नहीं व कहीं अत: गजल की तहजीब के अनुसार आगे आने वाले हर शे‘र में काफ़िये में हीं शब्द अनिवार्य हो जाता अत: इसे बदलकर-वर्तमान रूप देना अनिवार्य हो गया था
कौन करता नहीं गलतियां
हर तरफ ही खड़ीं गलतियां

करते तो हैं सभी गलतियां-गज़ल


करते तो हैं सभी गलतियां-
ढूंढते बस मेरी गलतियां

सामने आएंगी एक दिन
दोस्तो, आपकी गलतियां

तल्खियां ही मुझे दे गईं
थीं बडी मतलबी गलतियां

लूटकर ले गईं चैन ही
ये मरीं दिलजली गलतियां

लडकियां जब हुई थीं जवां
तब हुई मतलबी गलतियां

खौफ़े औलाद ने दी छुडा
आपसे ’श्याम’ जी गलतियां

2

कौन करता नहीं गलतियां
हर तरफ ही खड़ीं गलतियां

ये असर सजा का हुआ
रोज बढ़ती गईं गलतियां

आदमी तो था मैं काम का
आप ने ढूंढ लीं गलतियां

हर कदम,हर दिवस, उम्र भर
साथ मेरे रहीं गलतियां

नासमझ मैं नहीं जब रहा
मुझको अपनी लगीं गलतियां

खूब है आपका ये हुनर
नाम मेरे लिखीं गलतियां

भागने जब लगेश्यामजी
सामने खड़ीं गलतियां

फ़ाइलुन,फ़ाइलुन,फ़ाइलुन

कुछ युवा मित्रों ने गज़ल छंद सीखने की इच्छा ज़ाहिर की है मैने उन्हे लिखा था कि वे प्रारम्भिक ज्ञानश्री सतपाल खयाल के ब्लॉग आज की गजल, पर श्री प्राण शर्मा के गज़ल संबंधी लेख पढ़ लें ,फिर कोई जिज्ञासा हो तो मुजे लिखें मैं यथा अपनी सामर्थ्य कोशिश करूंगा उन्ही हेतु यह प्रयोग है आज का
आज की गज़ल हेतु ,एक ही रदीफ़ बहर की दो गज़ल पोस्ट कर रहा हूं।
जैसा आप देख लेंगे यहां एक गज़ल में काफ़िये में अनुस्वार है,दूसरी में काफ़िये
बिना अनुस्वार के हैं।इससे नव गज़लकारों को काफ़िये की इस विशेष स्थिति के बारे में पता लगेगा
यही नही दूसरी गज़ल का मक्ता यूं बेहतर दिखता
कौन करता नहीं गलतियां
हर तरफ हर कहीं गलतियां
मगर यहां काफ़िये हैं नहीं कहीं अत: गजल की तहजीब के अनुसार आगे आने वाले हर शे में काफ़िये में हीं शब्द अनिवार्य हो जाता अत: इसे बदलकर-वर्तमान रूप देना अनिवार्य हो गया था
कौन करता नहीं गलतियां
हर तरफ ही खड़ीं गलतियां

Friday, July 3, 2009

फुटकर शे‘र-३





माना तेरे हा्थों में तब पत्थर था
पर क्या तेरी हर बात में नश्तर था

मुस्तफ़इलुन,मुस्तफ़इलुन,मुस्तफ़इलुन

Monday, June 29, 2009

गज़लनसीब ने नसीब में जो लिख दिया सो लिख दिया




हकीम ने तो कह दिया,दवा नहीं मरीज की
दुआ
भी गर करे नहीं करे भला क्या आदमी




gazal
बुझी-बुझी सी चाँदनी करे भला क्या आदमी
चिराग
जब जल सकें जले भला क्या आदमी

तुम्हीं
ने दर्द था दिया,तुम्हीं गम समझ सके
कि
ऐसे हाल में कहो,जिये भला क्या आदमी

भरी
-भरी सी दोपहर में आफ़ताब गुम हुआ
मशाल
हाथ में लिये चले भला क्या आदमी

स्वयम्
किया तो भोग ले,वो पुन्य हो कि पाप हो
किया
जो दूसरों ने हो भरे भला क्या आदमी

हैं
साँसे तो गिनी-चुनी,घटें-बढें कभी नहीं
तो
मौत की सदा को सुन,डरे भला क्या आदमी

हकीम
ने तो कह दिया,दवा नहीं मरीज की
दुआ
भी गर करे नहीं करे भला क्या आदमी

नसीब
ने नसीब में जो लिख दिया सो लिख दिया
कोई भी मिटा सके करे भला क्या आदमी

है
जिन्दगी तो चार दिन,कभी खुशी कभी है ग़म
बिला
वजह ही दुश्मनी करे भला क्या आदमी

कहो
जरा तो श्यामअब किधर चलें कहां चलें
कि
हर तरफ़ है आग जब करे भला क्या आदमी

मफ़ाइलुन,मफ़ाइलुन,मफ़ाइलुन,मफ़ाइलुन,72

Tuesday, June 23, 2009

गज़ल -श्याम






दूसरों के सर बचाने हैं तुझे गर
फिर तो तू अपनी ही जानिब मोड़ पत्थर

कौन पूछे है, लियाकत को यहाँ पर
पेट भरना है तुझे तो तोड़ पत्थर

देखकर हालत बुतों की, हैं लगाते
टूटने की आइने से होड़ पत्थर

चिड़िया मारीं जब अहेरी हाथ में था
तू हुआ इतिहास में चितौड़ पत्थर

है खड़ा चौराहे पर बेटा खुदा का
कायरों में तू भी है, चल छोड़ पत्थर

बीच इन्सानों के कैसे फँस गया है तू
दौड़ सकता है ,अगर तो,दौड़ पत्थर

श्याम जीसचमुच बुरा वक्त आने को है
छत
पे अपनी आप भी लें जोड़ पत्थर


फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन

Monday, June 15, 2009



जानेमन इतनी तुम्हारी याद आती है कि बस
रूह मिलने के लिये यूं कसमसाती है कि बस

तेरी सांसे जब मिलीं थी मेरी सांसों से सनम
वो घड़ी बिजली बनी सी कौंध जाती है कि बस

ये विरह का दुख सगा सा हो गया है दोस्तो
शूल सी इसकी चुभन इतना सताती है कि बस



रास्तो
की धूल ने मुझको सिखाए ये हुनर
आंधी तूफां बन के वो क्या-क्या उड़ाती है कि बस

देखता जब भी तुझे हूं सुन मेरी तू गुलबदन
साँस थमती और धड़कन लड़खड़ाती है कि बस

कारसाजी उसकी का अब जिक्र भी मैं क्या करूं
खुद ही देकर जख्म वो मरहम लगाती है कि बस

वक्त की रफ्तार बेढ़ब हैं सभी कहते यही
अपनो को भी यह पराए जो बनाती है कि बस

'श्याम' यूं है बस गया मेरे जिहन में दोस्तो
नाम लेते ही जुबां यूं लड़खड़ाती है कि बस


फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइ्लुन
photo by-shyam skha