Thursday, May 21, 2009

मुक्तक...

मजहब ही मैं कोई जात लिखता हूं
जो आए है दिल में वही बात लिखता हूं
कोई और उम्मीद रखिये मुझसे आप
कि मैं दिन को दिन रात को रात लिखता हूं

13 comments:

  1. सुन्दर पंक्तियाँ। वाह। कभी मैंने भी लिखा था कि-

    लिखूँ जनगीत मैं प्रतिदिन ये सांसें चल रहीं जबतक।
    कठिन संकल्प है देखूँ निभा पाऊँगा मैं कबतक।
    उपाधि और शोहरत की ललक में फँस गयी कविता,
    जिया हूँ बेचकर श्रम को कलम बेची नहीं अबतक।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  2. सत्यम शरणम गछ्छामि...जय हो महाराज!!

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  3. यूँ तो आप दिन को दिन और रात को रात लिखते हैं
    पर हमारी उम्मीद पर हरदम खरे उतारते हैं
    आभार
    स्वप्न मंजूषा
    http://swapnamanjusha.blogspot.com/

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  4. न मजहब न ही मैं कोई जात लिखता हूं
    जो आए है दिल में वही बात लिखता हूं
    वाह! ईस शेर के कायल हो गये। सुब्हानअल्लाह।

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  5. दिन को दिन और रात को रात कहना आज के युग में बहुत हिम्मत का काम है...आप की हिम्मत की दाद देते हैं...लिखते रहिये...
    नीरज

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  6. hai likhna aapka jaise koi saugat likhte ho
    harek post men hardam anoothi baat likhte ho
    karen tareef kya teri, blogging ke sakha mere
    ye ham bhi maante hain tum gazab jazbaat likhte ho.

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  7. IS VISHESH MUKTAK PE VISHESH BADHAAYEE AAPKO...


    ARSH

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  8. क्या बात है श्याम साब...क्या बात है
    बहुत हे बेहतरीन

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  9. अगर सभी एक से होजायेंगे, न मज़हब न जाति ,तो आइडेन्टिटी कैसे होगी ? शेर,बकरी, नर-नारी , गधा-घोडा में ??????? अन्तर तो उसी ने बनाया है, आप्को शायर,किसी ओर को कुछ ओर , सच तो यह होना चाहिये कि---

    "" भेद बना ही रहेगा सदा,
    भेद-भाव व्यव्हार नहीं हो।""

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  10. डॉ० गुप्ता जी
    डॉ० साहिब मैने कब कहा है ,शेर,बकरी, नर-नारी , गधा-घोडा में ??????? न हों फिर आप लिखते हैं-अन्तर तो उसी ने बनाया है,
    मगर उसने मज़हब जाति तो नहीं बनाई यह तो केवल मानव नाम के ज्न्तो की देन हैं और मुझे तो इस पर भी एतराज नहीं है- मैने केवल यह कहा है के मैं सच को सच लिखने की कोशिश करता हूं

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  11. कि मैं दिन को दिन रात को रात लिखता हूं..
    bahut khoob .

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