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Friday, November 6, 2009

दीवाने की कब्र खुदी तो-गज़ल

५२
लोग उसे समझाने निकले
पत्थर से टकराने निकले

बात हुई थी दिल से दिल की
गलियों में अफ़साने निेकले

याद तुम्हारी आई जब तो
कितने छुपे खज़ाने निकले

पलकों की महफि़ल में सजकर
कितने ख्वाब सुहाने नि्कले

आग लगी देखी पानी में
शोले उसे बुझाने निकले

दीवाने की कब्र खुदी तो
कुछ टूटे पैमाने नि्कले

सूने-सूने उन महलों से
भरे-भरे तहखाने नि·ले

'श्या्म’ उमंगें ले्कर दिल में
महफि़ल नई सजाने निकले



http://katha-kavita.blogspot.com/
अब घर कहां ?-कविता यहां पढें

27 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

Ek aur sundar rachnaa shyam ji

sada said...

सूने-सूने उन महलों से
भरे-भरे तहखाने निकले

हर बार की तरह यह भी एक बहुत ही सुन्‍दर रचना ।

नीरज गोस्वामी said...

एक और बेहतरीन ग़ज़ल श्याम जी..वाह...छोटे छोटे लफ्ज़ और गहरी गहरी बातें...सुभान अल्लाह...
नीरज

वन्दना said...

आग लगी देखी पानी में
शोले उसे बुझाने निकले
waah .........kya bhav hain...........lajwaab.

M VERMA said...

सूने-सूने उन महलों से
भरे-भरे तहखाने निकले
और फिर
आग लगी देखी पानी में
शोले उसे बुझाने निकले
क्या खूब अन्दाज है बयाँ करने का

Science Bloggers Association said...

बहुत ही प्यारी गजल कही है आपने, हमेशा की तरह।
------------------
परा मनोविज्ञान-अलौकिक बातों का विज्ञान।
ओबामा जी, 70 डॉलर में लादेन से निपटिए।

श्रद्धा जैन said...

लोग उसे समझाने निकले
पत्थर से टकराने निकले
kya baat hai

बात हुई थी दिल से दिल की
गलियों में अफ़साने निकले

waah waah

याद तुम्हारी आई जब तो
कितने छुपे खज़ाने निकले


पलकों की महफि़ल में सजकर
कितने ख्वाब सुहाने निकले


आग लगी देखी पानी में
शोले उसे बुझाने निकले

दीवाने की कब्र खुदी तो
कुछ टूटे पैमाने नि्कले
waah waah
सूने-सूने उन महलों से
भरे-भरे तहखाने निकले

bahut pyaari gazal

योगेश स्वप्न said...

wah shyaam ji , hamesha ki tarah lajawaab, har sher moti.

AlbelaKhatri.com said...

मज़ा आ गया .............
मतलब मज़ा ही आ गया..........
जब मज़ा ही आ गया ...............तो इससे ज़्यादा कहने को शेष क्या रह जाता है.........

ग़ज़ल मुबारक !

"अर्श" said...

dusaras she'r khas taur se badhaayee aur daad ke kabil... wese to aap ustaad hai hin magar dusare she'r ke baare me kya kahane waah kamaal hai ...



arsh

Yogesh said...

हर शेर बेहद खूबसूरत है

मज़ा आ गया पढ़ कर

वाह !!!

गौतम राजरिशी said...

इस बहर पे तो श्याम साब का कोई सानी नहीं...

राज भाटिय़ा said...

लोग उसे समझाने निकले
पत्थर से टकराने निकले
जरुर दिवाना होगा कोई...
बहुत सुंदर रचना धन्य्वाद

अवनीश एस तिवारी said...

सुन्दर शेर बने हैं |
मीटर में लगे |

बधाई |

अवनीश तिवारी

महावीर said...

श्याम जी
आज पहली बार ही आप की साईट पर आया हूँ . आपने बड़े ख़ूबसूरत ख़यालों से सजा कर एक निहायत उम्दा ग़ज़ल कही है। हर शे'र पर मस्तिष्क कुछ सोचने के लिए बाध्य हो जाता है और महसूस होता है कि यह ग़ज़ल सिर्फ़ मनोरंजन के ही लिए नहीं है। सहज शब्दों में एक सशक्त ग़ज़ल लिखने का हुनर आप की ख़ूबी है। यह तो बड़ा मुश्किल है कि किस शे'र की तारीफ़ की जाए। हर शे'र इस शे'र की ही तरह लाजवाब हैः-
दीवाने की कब्र खुदी तो
कुछ टूटे पैमाने नि्कले
बधाई.
महावीर शर्मा

सुलभ सतरंगी said...

वाह वाह !! बहुत खूब सर जी.

ये आपका अंदाजे ब्यान है - ग़ज़ले परवान चढ़ती है, ग़ज़ल के बहाने.
- सुलभ जायसवाल 'सतरंगी'

PRAN SHARMA said...

SHYAM SHAKHA JEE,AAPKEE GAZAL KAA LUTF LE
RAHAA HOO.

विनोद कुमार पांडेय said...

भाव और शब्दों से भरकर सुंदर ग़ज़ल सजाने निकले..

बढ़िया है श्याम जी ..बहुत बढ़िया ग़ज़ल प्रस्तुत की आपने..ढेर सारी शुभकामनाएँ

Dr. shyam gupta said...

खूब सूरत गज़ल।

दिगम्बर नासवा said...

आग लगी देखी पानी में
शोले उसे बुझाने निकले

दीवाने की कब्र खुदी तो
कुछ टूटे पैमाने नि्कले ..

Chote chote sher par kamaal ke .... Shyaam ji aapki gazal padh kar aksar sochne par majboor ho jaata hun ...har sher mein aap kaise kuch na kuch kahte dikhte hain .....
bahoot hi lajawaab ......

Babli said...

बहुत सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने शानदार ग़ज़ल लिखा है! बधाई!

Nirmla Kapila said...

लाजवाब गज़ल है बहुत बहुत बधाई

storyteller said...

दीवाने की कब्र खुदी तो
कुछ टूटे पैमाने नि्कले

bahut hi sundar gajal hai...jitni taarif ki jaaye kum hai...mujhe apke kahne ka ndaj bahut pasand aayya ....bahut khoob!!!!

रावेंद्रकुमार रवि said...
This post has been removed by the author.
रावेंद्रकुमार रवि said...

जब तुम हमें लुभाने निकले!
हम तुम पर मिट जाने निकले!

तुम पर अच्छी ग़ज़ल पढ़ी तो,
हम दिल से कुछ गाने निकले!

भूल सके ना अब तक जिसको,
फिर से उसे भुलाने निकले!

कल ही जिससे मुँह फेरा था,
उसको गले लगाने निकले!

जिस लौ में ना जले पतंगा,
उस लौ को जलवाने निकले!

"रवि" को जिसने याद किया है,
उसकी याद सजाने निकले!

- संपादक : सरस पायस

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

waah...waah...waah....

Dr. kavita 'kiran' (poetess) said...

आग लगी देखी पानी में
शोले उसे बुझाने निकले
achha vyangya hai shyam ji.achha laga.

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