Saturday, December 25, 2010

ख्वाब बेगाने न दे मौला -गज़ल

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गर खुदा खुद से जुदाई दे
कोई क्यों अपना दिखाई दे

काश मिल जाये कोई अपना
रंजो-गम से जो रिहाई दे

जब न काम आई दुआ ही तो
कोई फिर क्योंकर दवाई दे

ख्वाब बेगाने न दे मौला
नींद तू बेशक पराई दे

तू न हातिम या फरिश्ता है
कोई क्यों तुझको भलाई दे

डूबने को हो सफीना जब
क्यों किनारा तब दिखाई दे

आँख को बीनाई दे ऐसी
हर तरफ बस तू दिखाई दे

साथ मेरे तू अकेला हो
अपनी ही बस आश्नाई दे


फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन


मेरा एक और ब्लॉग http://katha-kavita.blogspot.com/

12 comments:

  1. ख्वाब बेगाने न दे मौला
    नींद तू बेशक पराई दे

    बहुत सुन्दर ।

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  2. जो हुनर श्‍याम को दिया उसने
    काश मुझमें कभी दिखाई दे।

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  3. `आँख को बीनाई दे ऐसी
    हर तरफ बस तू दिखाई दे'

    उठते नहीं है हाथ अब इस दुआ के बाद :)

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  4. बहुत खुब जी, धन्यवाद

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  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    एक आत्‍मचेतना कलाकार

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  6. अच्छी पोस्ट , शुभकामनाएं । पढ़िए "खबरों की दुनियाँ"

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  7. ख्वाब बेगाने न दे मौला
    नींद तू बेशक पराई दे

    बहुत मर्मस्पर्शी रचना..

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  8. "आँख को बीनाई दे ऐसी
    हर तरफ बस तू दिखाई दे

    साथ मेरे तू अकेला हो
    अपनी ही बस आश्नाई दे"

    बहुत खूब !

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