Friday, February 19, 2010

जिसको भी मारा अपनो ने मारा है-gazal

१२१

खारा है सागर सचमुच खारा है 

नदिया ने फ़िर भी सब कुछ वारा है

सातों के सातों सुर हैं उसकी मुठ्ठी में
कहने को वो बेचारा इक तारा है

जीत सदा सच की होती कहने भर को
सच बेचारा द्वापर में भी हारा है

बेशक यह  सुन्दर और गठीली भी है
देह मगर कहते सांसो की कारा है


यह तो
कोई बात नहीं  है श्याम नई
जिसको भी मारा अपनो ने मारा है


फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ा

मेरा एक और ब्लॉग
http://katha-kavita.blogspot.com/

12 comments:

  1. खारा है सागर सचमुच खारा है
    नदिया ने फ़िर भी सब कुछ हारा है
    nice

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  2. waah.... har sher umda aur har sher me ek darshan....

    shukriya

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  3. यह तो कोई बात नहीं है श्याम नई
    जिसको भी मारा अपनो ने मारा है
    बहुत सुंदर लिखा आप ने धन्यवाद

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 20.02.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

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  5. खारा है सागर सचमुच खारा है
    नदिया ने फ़िर भी सब कुछ वारा है-ye aik talkh haqiqat hai syamji jise aapne rekhankit kiya hai.

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  6. ग़ज़ब सर जी ... कमाल के शेर हैं ...

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  7. जिसको भी मारा अपनो ने मारा है
    Waah :)

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  8. वाह ...बहुत बहुत सुन्दर....
    हर शेर लाजवाब ...बेहतरीन !!!

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  9. बहुत सुन्दर गजल है।बधाई।

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