Monday, June 6, 2011

खुद से आखिर कितना बोलूं मैं-- gazal shyaam skha shyam

खुद से आखिर कितना बोलूं मैं
क्या बस अपना चेह्‌रा  देखूं मैं

अपने भी दिखते हैं बेगाने
दोस्त किसे अपना समझूं मैं

आईनो की तन्हा मह्फ़िल में
खुद में खुद को कब तक ढूंढूं मैं

देख तुझे यह हाल हुआ है
जब भी सोचूं तुझको सोचूं मैं

‘श्याम’सखा गर हो जाये मेरा
निशिदिन रास-रचाऊं, नाचूँ मैं





मेरा एक और ब्लॉग http://katha-kavita.blogspot.com/

10 comments:

  1. आईनो की तन्हा मह्फ़िल में
    खुद में खुद को कब तक ढूंढूं मैं

    -बढ़िया.

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  2. chote bahar mein shaandaar ghazal hai bhai Sahab, zabardast samvedna se bhari hui...ek iltaja hai..Makta fir se dekhein...aakhiri line poori ghazal se ek dum juda hai...sadar

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  3. आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


    आज के खास चिट्ठे ...

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  4. अपने भी दिखते हैं बेगाने
    दोस्त किसे अपना समझूं मैं
    आईनो की तन्हा मह्फ़िल में
    खुद में खुद को कब तक ढूंढूं मैं..
    वाह! बहुत ही सुन्दर, शानदार और ज़बरदस्त ग़ज़ल लिखा है आपने!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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  5. मजा नहीं आया....कुछ टूटा-टूटा सा है...

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  6. सुन्दर डॉ साहब !लेकिन हमारे आग्रह करने पर भी आप कभी हमारे ब्लॉग पे नहीं आये .

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  7. RAGHUNATH MISHRA6/10/11, 6:02 PM

    kubsurat aur mukammal gajal-mukammal baat.shyam ji lakh lakh badhai.

    RAGHUNATH MISRA,KOTA(RAJ.)CONTACT:3-k-30,Talwandi,Kota-324005(RAJ.)Mob.09214313946

    E-mail:raghunathmisra@ymail.com

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