Friday, June 10, 2011

जिन्दगी-भर उदास रहना था ?-- gazal shyam skha shyam


24 .

जिन्दगी-भर उदास रहना था
फिर तो मेरे ही पास रहना  था

थे यहाँ तो महज अँधेरे ही
तुझको लेकर उजास रहना था

आमों मे वो तो हो गये हैं बबूल
उनको तो बन के खास रहना था



सब थे नंगे हमाम में फ़िर भी
तुमको तो बालिबास रहना था

देख कर तेरे हुस्न का जल्वा
किसको होशो-हवास रहना था

फ़ाइलातुन,मफ़ाइलुन,फ़ेलुन



मेरा एक और ब्लॉग http://katha-kavita.blogspot.com/

11 comments:

  1. आमों मे वो तो हो गये हैं बबूल
    उनको तो बन के खास रहना था

    -बहुत बेहतरीन!!!

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  2. वाह! क्या बात है! बहुत ही बढ़िया और शानदार ग़ज़ल लिखा है आपने!

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  4. RAGHUNATH MISHRA6/10/11, 5:57 PM

    chhota bahar,bari baat,mukammal gazal,dher seekhen-ham jaise navsikiyon ke liye.kya baat hai,maja aa gaya shyam ji ke andaj-e-bayan se.
    RAGHUNATH MISRA,KOTA(RAJ.)CONTACT:3-k-30,Talwandi,Kota(Raj.)

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  5. बेहद ख़ूबसूरत...मग़र जो होता ऐसा तो मैं अपनी तन्हाई से कैसे मिलता!

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  6. पूरी ग़ज़ल बहुत अच्छी

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  7. मेरे ब्लॉग पर आने के लिए हार्दिक आभार...

    सभी शेर एक से बढ़कर एक..... वाह! आपने भी क्या लाजवाब ग़ज़ल कही है.

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  8. देख कर तेरे हुस्न का जल्वा
    किसको होशो-हवास रहना था

    vaah!!kya baat hai.

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  9. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच

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  10. थे यहाँ तो महज़ अँधेरे ही ,तुझको लेकर उजास रहना था ,
    सब थे हमाम में नंगे फिर भी ,तुमको तो बा -लिबास रहना था ।
    हमेशा ही बेहतरीन अशार लिए रहते हैं आप -
    तुझे तो प्यारे हर घर द्वार होना था ।
    ग़ज़ल का हजारा बना लिया तूने ,
    तुझे तो हर द्वार होना था ।
    एक शैर आपकी नज़र -
    वो आये घर -ब्लॉग हमारे ,कभी हम उनको कभी अपने घर -ब्लॉग को देखतें हैं ।
    भाई डॉ . साहब रोहतकी ,बाहर निकलो ,बहुत से लोग आपकी बाटजोहतें हैं .

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