Tuesday, February 10, 2009

गज़ल बनाम गज़लकार

दोस्तो !
यह सर्वविदित तथ्य है कि कविता का जन्म संसार की सभी भाषाओं में छंद के रूप में हुआ तथा छान्दसिक कविता ने न केवल कविता को अपितु हर भाषा एवं संस्कृति को समृद्ध क्या और संस्कृतियों के इतिहास को भी सहेज-समेट कर रखा है।
पिछले कुछ बरसों से मुक्तछंद बनाम छंदमुक्त कविता ने श्रोता तथा पाठकों को कविता से इतना विमुख कर दिया था कि कविता की मृत्यु की घोषणा होने लगी थी ।
श्रोता,पाठकों को ही नहीं अपितु कविता तथा कवियों को भी नवजीवन देने का श्रेय निःसन्देह गज़ल को जाता है।आज हर भाषा में गज़ल लिखी जा रही है,सुनी-पढी जा रही है।
इसके पीछे एक कारण जहां इसका गेय होना है, वहीं गज़ल के हर शे’र में अलग बात कहने की सुविधा है और यह केवल सुविधा ही नहीं गज़ल का आवश्यक अंग भी है ।
एक और जहां गज़ल सर्वसाधारण की चहेती बन रही है ,वहीं गज़ल व उर्दू भाषा के तथाकथित पैरोकार या स्वयंभू ठेकेदार गज़ल को दुरूह बनाने में जुटे हैं और नवगज़लकारों को अरबी-फ़ारसी शब्दों के जाल में उलझाकर भटका रहे हैं।
यह ब्लाग गज़ल-प्रेमियों को न केवल एक मंच देने ,बल्कि गज़ल की बारीकियों को सरल सहज ढंग से समझाने का प्रयास भर है। आप सभी का इस पर स्वागत है ।हम यह भी चाहेंगे कि गज़ल के विद्वान अगर इसमें कुछ सुधार की जरूरत महसूस करें तो निसंकोच अपनी सलाह टिप्पणी में लिखें अगर ठीक पाई गई तो उसे मूल लेख में लिखा जायेगा और हम ऐसे विद्वानो के अनुग्रहित होंगे
हम शुरूआत गज़ल के प्रारूप से करेंगे

1 comment:

  1. आदरणीय ,
    मैं आप की बातो से पूरी तरह से सहमत हूँ मुझे भी ऐसा कई बार महसूस होता है की जान बूझकर ग़ज़ल को कठिन बताया जाता है ताकि नए फनकारों को रोक जा सके ये बहुत ही गलत है हम आशा करते हैं की ग़ज़ल की जो भी कठिनाइयाँ हैं उसे आसान बनाने आप का पूरा योगदान मिलेगा |

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