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जिन्दगी को जब कभी सिक्कों से है आँका गया
यूँ लगा दोष आपका था और मुझे डाँटा गया
जब किसी कारण से भी घर था कभी बाँटा गया
दुख हमेशा क्यों मेरे ही वास्ते छांटा गया
शख्स जब कोई गिरा अपने उसूलों से कभी
समझो चाँदी की छड़ी से है हाँका गया
मुझमें और सुकरात में बस फ़र्क इतना ही रहा
पी गया वो जह्र पर मुझसे न विष फाँका गया
था गुजरता जब कभी उस शोख के कूचे से मैं
शोर मच जाता था, देखो वह गया, बाँका गया
हमने माना‘श्याम’फक्कड़’और है कुछ बदजुबाँ
पर खरा उतरा है जब परखा गया,जाँचा गया
फाइलातुन,फाइलातुन,फाइलातुन,फ़ाइलुन
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