Wednesday, March 16, 2011

कौन कहता है बुढापे में मुहब्ब्त का सिलसिला नहीं होता-----







देखूं जो तुमको भांग  पीके
अबीर गुलाल लगें सब फ़ीके














मोतियाबिन्दी नयनो  में काजल
्नित करता मुझको है पागल












अदन्त मुंह और हंसी तुम्हारी
इसमे दिखता ब्रह्माण्ड है प्यारी













तेरा मेरी प्यार है जारी
 जलती हमसे दुनिया सारी




क्या समझें ये दुध-मुहें बच्चे
कैसे होते प्रेमी सच्चे









दिखे न आंख को कान सुने ना
हाथ उठे ना पांव चले ना










पर मन तुझ तक दौड़ा जाए
ईलू-इलू का राग सुनाए




हंसते क्यों हैं पोता-पोती
क्या बुढापे में न मुहब्ब्त होती








सुनलो तुम भी मेरे प्यारे
कहते थे इक चच्चा हमारे













कौन कहता है बुढापे में मुहब्ब्त का सिलसिला नहीं होता
आम भी तब तक मीठा नहीं होता जब तक पिलपिला नहीं होता


होली में तो गजल-हज्ल सब चलती है
                                                      
जलने दो गर दुनिया जलती है
ही तो होली की मस्ती है 















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Saturday, March 12, 2011

उनकी बातें हुईं झिड़कियों की तरह------गज़ल

14

घूमना है बुरा तितलियों की तरह
घर भी बैठा करो लड़कियों की तरह

दिल में उतरी थी वो बिजलियों की तरह
जब गई तो गई,आँधियों की तरह

उनकी बातें हुईं झिड़कियों की तरह
जख्म मेरे खुले खिड़कियों की तरह


 





 

आ लिखें ,फ़िर से खत ,एक दूजे को हम
बालपन में लिखीं तख्तियों की तरह

देखकर,आपको धड़कने ,हैं हुई
कूदती,फाँदती हिरनियों की तरह

जल गये मेरे अरमां सभी के सभी
फूंक डाली गईं झुग्गियों की तरह

छोड़ कर चल दिये वो हमें दोस्तो
आम की चूस लीं गुठलियों की तरह

बात अपनी कहो कुछ मेरी भी सुनो
शोख चंचल खिली लड़कियों की तरह

जिन्दगी फिर रही है तड़पती हुई।
जाल में फँस गई मछलियों की तरह

प्यार करना ही है गर तुम्हें तो करो
मीरा, राधा या फिर गोपियों की तरह


काश हो जाते हम नामवर दोस्तो
मिट गई प्यार में हस्तियों की तरह

चाहते आप ही बस नहीं हैं हमें
घूमता है जहां फिरकियों की तरह

आज मायूस है क्यों वो, कल तक जो थी
खेलती कूदती हिरनियों की तरह

माफ कर दें इन्हें आप भी ‘श्याम’ जी
आपकी अपनी ही गलतियों की तरह


फ़ाइलुन,फ़ाइलुन,फ़ाइलुन,फ़ाइलुन




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Thursday, March 10, 2011

क्यों हैं करती,दुश्मनी खुद औरतों से औरतें---- gazal

 71/८९

औरत के बहुआयामी जीवन एवम्‌ व्यक्तित्व पर केन्द्रित एक गज़ल-
मेरा मानना है के स्त्री पृकृति की सबसे पूर्ण कृति है,पुरुष उसके सामने स्वय़ं को बौना पाता है,अधूरा महसूस करता है,
इसीलिये वह कभी एट्म बम,कभी चंद्र्यान ,कभी किले,महल तो कभी नये-नये धर्म ईजाद करता दिखता है,
जबकि स्त्री शिशु को जन्म देकर, उसका पालन-पोषण कर जीवन की पूर्णता, पाकर संतुष्ट् हो जाती है इसीलिए उसे कभी कोई धर्म ईजाद करने
की जरूरत महसूस नहीं हुई।
श्याम सखा ‘श्याम
1
काँच का बस एक घर है लड़कियों की जिन्दगी
और काँटों की डगर है लड़कियों की जिन्दगी
2
मायके से जब चले है सजके ये दुल्हिन बनी
दोस्त अनजाना सफर है लड़कियों की जिन्दगी
3
एक घर ससुराल    है तो दूसरा     है मायका
फिर भी रहती दर-ब-दर है लड़कियों की जिन्दगी
4
खूब देखा, खूब परखा, सास को आती न आँच,
स्टोव का फटना मगर है लड़कियों की जिन्दगी
5
पढलें लिखलें और करलें  नौकरी भी ये भले
सेज पर सजना मगर है लड़कियों की जिन्दगी
6
इस नई तकनीक ने तो है बना दी कोख भी
आह कब्रिस्तान भर है लड़कियों की जिन्दगी
7
कारखानों अस्पतालों या घरों में भी तो यह
रोज लड़ती इक समर है लड़कियों की जिन्दगी

8
लूटते इज्जत हैं इसकी मर्द ही जब, तब कहो
क्यों भला बनती खबर है लड़कियों की जिन्दगी
9
बाप मां के  बाद   अधिकार है भरतार का
फर्ज का संसार भर है लड़कियों की जिन्दगी
10
हो रहीं तबदीलियां दुनिया में अब तो हर जगह
वक्त की तलवार पर है लड़कियों की जिन्दगी
11
क्यों हैं करती दुश्मनी खुद औरतों से औरतें
बस दुखी यह जानकर है लड़कियों की जिन्दग+ी
12

13
किस धरम, किस जात में इन्साफ इसको है मिला
जीतती सब हार कर है लड़कियों की जिन्दगी
14
हो अहल्या या हो मीरा या हो बेशक जानकी
मात्र चलना आग पर है लड़कियों की जिन्दगी
15
द्रोपदी हो, पद्मिनी हो,  हो भले ही डायना
रोज लगती दाँव पर है लड़कियों की जिन्दगी
16
एक रजिया एक लक्ष्मी और इन्दिरा जी भला
क्या नहीं अपवाद-भर है लड़कियों की जिन्दगी
17
क्या जवानी क्या बुढ़ापा या भले हो बचपना
सहती हर दम बद नजर है लड़कियों की जिन्दगी
18
हों घरों में, आफिसों में, हों सियासत में भले
क्या कहीं भी मोतबर है लड़कियों की जिन्दगी
19
औरतों के हक में हों कानून कितने ही बने
दर हकीकत बेअसर है लड़कियों की जिन्दगी
20
तू अगर इसको कभी अपने बराबर मान ले
फिर तो तेरी हमसपफर है लड़कियों की जिन्दगी
21
घर भी तो इनके बिना बनता नहीं घर दोस्तो
क्यों भला फ़िर घाट पर है लड़कियों की जिन्दगी
22
आह धन की लालसा का आज ये अंजाम है
इश्तिहारों पर मुखर है लड़कियों की जिन्दगी
23
क्यों हैं करती,दुश्मनी खुद औरतों से औरतें
बस दुखी यह जानकर है लड़कियों की जिन्दगी
23/a
कर नुमाइश जिस्म की क्या खुद नहीं अब आ खड़ी
नग्नता के द्वार पर है लड़कियों की जिन्दगी
24
प्यार करने की खता करलें जो कहीं  ये कभी
तब लटकती डाल पर है लड़कियों की जिन्दगी
25
जानती सब, बूझती सब, फिर भला क्यों बन रही
हुस्न की किरदार भर है लड़कियों की जिन्दगी
26
ठीक है आजाद होना, हो मगर उद्दण्ड तो
कब भला पायी सँवर है लड़कियों की जिन्दगी
27
माँ बहन बेटी कभी पत्नी कभी,कभी है प्रेयसी
जानती क्या-क्या हुनर है लड़कियों की जिन्दगी

28
मुम्बई हो,    कोलकाता,    राजधानी देहली
चल रही दिल थामकर है लड़कियों की जिन्दगी
29
ले रही वेतन बराबर,हक बराबर, पर नहीं
इतनी सी तकरार भर है लड़कियों की जिन्दगी
30
आदमी कब मानता इन्सान इसको है भला
काम की सौगात भर है लड़कियों की जिन्दगी
31
शोर करते हैं सभी तादाद इनकी घट रही
बन गई अनुपात भर है लड़कियों की जिन्दगी

32

ठान लें जो कर गुजरने की कहीं ये आज भी
पिफर तो मेधा पाटकर है लड़कियों की जिन्दगी
33
क्यों नहीं तैतीसवां हिस्सा भी इसको दे रहे,
आधे की हकदार गर है लड़कियों की जिन्दगी
34
देवता बसते वहाँ है पूजते नारी जहाँ
क्यों धरा पर भार भर है लड़कियों की जिन्दगी
35
हाँ, कहीं इनको मिले गर प्यार थोड़ा दोस्तो
तब सुधा की इक लहर है लड़कियों की जिन्दगी
36
मैंने तुमने और सबने कह दिया सुन भी लिया
क्यों न फिर जाती सुधर है लड़कियों की जिन्दगी
37
माफ मुझको अब तू कर दें ऐ खुदा मालिक मेरे
हाँ यही किस्मत अगर है लड़कियों की जिन्दगी
38
‘कल्पना’ को ‘श्याम’ जब अवसर दिया इतिहास ने
उड़ चली आकाश पर है लड़कियों की जिेन्दगी


फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइ्लुन

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Monday, March 7, 2011

मौत से क्यों है डरे ’इतना जमाना-----गज़ल


बात इक मुझको बहुत भाती है यारब
याद उसको भी मेरी आती है   यारब

मोड़ बाकी हैं कई मंजिल तलक तो
ये हवा यूँ मुझको समझाती है यारब

मौजों से रंजिश, किनारों से अदावत
देखें कश्ती ले कहाँ जाती है यारब

पात झड़ने पर है क्यों मायूस गुलशन
रुत यही लेकर बहार आती है यारब

कैसे मसले जग के सुलझाएगा वो शख्स
रूह जिसकी जबकि जज्बाती है यारब

बैठे है हम तो दिये दिल के जलाकर
आंधी क्यों डर हमको दिखलाती है यारब

हैं गुजरते लम्हे जब सदियों की मानिन्द
तब कहीं शब वस्ल की आती है यारब

मौत से क्यों है डरे इतना जमाना
मौत के ही बाद जीस्त आती है यारब

फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,





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Tuesday, March 1, 2011

दिल बहलाने की इक तदबीर खरीदोगे---गज़ल

12
बेच रहा हूँ बिगड़ी-सी तकदीर खरीदोगे
है दिल बहलाने की इक तदबीर खरीदोगे

खौफ़े- जख्म जिसे  हो, घर अपने वो बैठ रहे 
बिखरी हैं बाजारों में  शमसीर खरीदोगे

बहुत सँभल के झांकें इस आईने में हमदम
दिखला देता है  सबको तस्वीर खरीदोगे   

 
आजादी के परचम तो नीलाम हुए सारे
शेष बची है जंग लगी जंजीर खरीदोगे


साथ समय के महल* किले* बारादरियां उजड़ीं ?
गम की इमारत* करता हूँ तामीर खरीदोगे *









 





गिरवी आज महाजन  घर है रौनक मौसम का
सस्ती बिकती खिलवत की जागीर खरीदोगे।।

‘श्याम’कहां अब हाथ तुम्हारे है आनेवाला।
बस है बाकी उसकी इक तहरीर खरीदोगे।।



 फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ेलुन.फ़ेलुन,फ़ेलुन,फ़ा
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Sunday, February 20, 2011

गर न समझे वो,--------gazal

 12 न.ह

वो जो उलझे हैं सुलझ भी जाऍँगे
बीते पल लेकिन न फिर आ पाएँगे

सर उठाकर जो नहीं चल पाएँगे ,
लोग वो सिक्कों मे ही ढ़ल जाएँगे


वे हमें ,हम भी उन्हें समझाएँगे
गर न समझे वो, समझ हम जाएँगे

अपना दामन साफ रखने के लिये
दाग़ दिल पर हाँ सभी तो खाएँगे

है बदलना,वक्त जिनको ‘श्याम’ जी
सामने आकर वही सर कटवाएँगे



फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलुन



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Friday, February 18, 2011

क्यों रुलाऊं धूप को- गज़ल किशन तिवारी

 आज मै अपने मित्र प्रसिद्ध गीतकार किशन तिवारी की गज़ल जो मुझे बहुत पसन्द है पोस्ट कर रहा हूं- देखें आपको कैसी लगती है

 चाहता हूँ भींचकर मुट्ठी में बांधू धूप को
धूप के बदले में केवल चाहता हूं धूप को

वो बुलाती   मुझको आंगन में कभी छत पर कभी
 सोचता हूं मैं कभी घर में बुलाऊं धूप को

 मुस्कराती है कभी हँसती ठहाका मारकर
मैं सुना अपनी कहानी क्यों रुलाऊं धूप को

मैं कभी बेचैन होता हूं  बहुत जब रात  को
है बहुत  हारी थकी अब क्यों जगाऊं धूप को

आपने चाहा मिटा दें रोशनी का ही वजूद
मेरी कोशिश है कि मैं बच्चों में बांटू धूप को




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Sunday, February 13, 2011

ये चुपके-चुपके ही आ बैठता है बस दिल में -गज़ल

१०n

उसे वहाँ कोई अपना नजर नहीं आता
तभी तो देर तलक वो भी घर नहीं आता

हमारे बीच ये दीवार क्यों है आन खड़ी
उधर मैं जाता नहीं,वो इधर नहीं आता

हमेशा जाती है मिलने नदी समुन्दर से
समुन्दर उससे तो मिलने मगर नहीं आता


 

तुझे है मुझसे मुहब्ब्त मैं मान लूँ कैसे
तेरी नजर में वो मंजर नजर नहीं आता

ये चुपके-चुपके ही आ बैठता है बस दिल में      
कि रंजो-ग़म कभी  देकर खबर नहीं आता

मैं खुद ही उससे मुलाकात को हूँ चल देता
कि मुझसे मिलने कभी ग़म अगर नहीं आता

हुई क्या बात कोई तो बताये ‘श्याम’ हमें
क्यों रात-रात तू घर लौटकर नहीं आता

 

मफ़ाइलुन. फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन

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Saturday, February 5, 2011

वक्त ने कुछ इस तरह मुझको छला था-gazal

 9[म.ऋ]

जिन्दगी को जिन्दगी से छीनना था
मौत का कैसा हसीं ये हौसला था


वक्त ने कुछ इस तरह मुझको छला था
था कभी मैं आदमी अब बुलबुला था

 हाय जादू कैसा ,तेरे हुस्न का था]
देखकर हर कोई जिसको मर मिटा था

थी जमीं महफ़िल वहाँ शे’रो-सुखन की
शे‘र जो भी था वो साँचे में ढला था   

रूठना मेरा      मनाना रोज उसका
सोचिये कितना हसीं वो सिलसिला था

बन रहा था सख्तजां बाहर से लेकिन
वो तो अन्दर से सरासर मोम सा था

थी हर इक रुख पर हँसी चिपकी हुई-सी
पर हर इक दिल में ही पसरा कर्बला था

उनकी महफिल का बयां अब क्या करें हम
जो भी था बजता हुआ इक झुनझुना था

सोचते होंगे     कभी वो भी तो यारब
‘श्याम’ को बरबाद करके क्या मिला था


फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,



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Sunday, January 30, 2011

तुम तो पहलू में थे मगर-gazal


इतने नाजुक  सवाल मत पूछो
क्यों हूँ   बरबादहाल मत पूछो

बात है    गाँव की तबाही की
बाढ़ थी या  अकाल मत पूछो

करो तदबीर   अब निकलने की
किसने डाला था जाल मत पूछो

तेग का वार,  गैर का था मगर
किसने छीनी थी ढाल मत पूछो

काम क्या आई धुप अँधेंरो में
जुगनुओं की मशाल मत पूछो

वक्त ने जिन्दगी को बख्शे हैं
कैसे -कैसे  वबाल मत पूछो

तुम भला क्या शिकस्त दे पाते
थी ये अपनों की चाल मत पूछो

देखकर    खुशगवार मौसम को
मन है कितना निहाल मत पूछो

तुम तो पहलू में थे मगर फिर भी
गम हुऐ   क्यों बहाल  मत पूछो

कैसे गुम हो गया शहर आकर
वो सितारों का थाल मत पूछो

श्यामसे पूछ लो जमाने की
सिर्फ उसका ही हाल मत पूछो 
[ फ़ाइलातुन,मफ़ाइलुन,फ़ेलुन ]



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Monday, January 24, 2011

उम्र गीली हो गई अपनी धुआं-सी जिन्दगी


7

भीड़ में रह कर भी है खाली मकां-सी जिन्दगी
दोस्तो हमको लगी है    इम्तिहां-सी जिन्दगी

लाश की मानिन्द ढोती   तू रही अक्सर मुझे
झाड़ कर पल्ला है क्यां हैरतकुनां-सी जिन्दगी

क्यों भटकती फिर रही है जा--जा कुछ तो बता
करके घर तामीर भी है   तू दुकां-सी जिन्दगी

गिर गये हैं जब से हम तेरी निगाहों से सनम
है लगे हमको तो अपनी  बदगुमां-सी जिन्दगी

गुफ्तगू जब से हुई है   खत्म अपनी, आपसे
रह गई है बन के गूंगे  का बयां-सी जिन्दगी

गाँव से आई थी, तोहफा सादगी का तब थी तू
शहर आकर  हो गई   तू हुक्मरां-सी जिन्दगी

थी तमन्नाश्यामकी बन शमअ-सा जलता रहे
उम्र गीली  हो गई अपनी     धुआं-सी जिन्दगी

फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलु


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Monday, January 17, 2011

इस जख्म से सीखा है क्या-क्या पूछ.......गज़ल

4
मिलना है गर तुझको कभी सचमुच ही ग़म से जिन्दगी
तो आके फिर तू मिल अकेले में ही हमसे जिन्दगी

हाँ आज हम इनकार करते हैं तेरी हस्ती को ही
खुद मौत माँगेंगे, जियेंगे अपने दम से जिन्दगी

हर बार ही देखा तुझे है दूर से जाते हुए
इक बार तो आजा मेरे आँगन में छम से जिन्दगी

सुलझा दिया इक बार तो सौ बार उलझाया हमें
पाएं हैं ग़म कितने तेरे इस पेचो-खम से जिन्दगी

नाहक नहीं हैं हम इसे सीने से चिपकाये हुए
इस जख्म से सीखा है क्या-क्या पूछ हमसे जिन्दगी

हैं ‘श्याम’ गर मेरा नहीं, तो है पराया भी नहीं
कट जाएगी अपनी तो यारो, इस भरम से जिन्दगी


मुस्तफ़इलुन= चार बार 


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Wednesday, January 12, 2011

यूँ थिरकती, महकती क्या ये हवा -gazal

6  [म.ऋ]

आस इक भी अगर फली होती
जिन्दगी तू बहुत भली होती

यूँ थिरकती, महकती क्या ये हवा
बगिया माली ने गर छली होती

मांग लेते तुझे सितारों से
उसके आगे अगर चली होती

ढलती आँसू की बूंद मोती में
जो न अच्छी घड़ी टली होती

स्नेह-भर जो हमें मिला होता 


फिर न कोई कमी खली होती

कोसता मैं न अपनी किस्मत को
गर मिली यार की गली होती

 शोख-चंचल मेरी तबियत हैं  
 लेखनी क्यों न  मनचली होती

कौन झुकता यूँ तेरे आगे ‘श्याम’
 उम्र तेरी जो न  ढली होती


फ़ाइलातुन,मफ़ाइलुन,फ़ेलुन


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Monday, January 10, 2011

फ़ुटकर शे‘र- श्याम सखा ‘श्याम’

जो शख्स दर्द की आबो-हवा को जानता है
वही तो आज के दौरे-खुदा को जानता है
है देखलेता है बिना खोले ही जो जख़्मो को
वही हरेक मरज़ की दवा को जानता है

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Tuesday, January 4, 2011

सादगी को कौन पूछे है यहाँ अब-gazal

 3

जिन्दगी है जब मियाँ तो गम भी होंगे
आज ज्यादा हैं तो कल ये कम भी होंगे

इन्तजार अब तो कयामत का हमें है
मौला होगा, तुम भी होंगे, हम भी होंगे

जिन्दगी होगी सुहानें गीत होंगे
आ गई गर मौत तो मातम भी होंगे

मेरे नग्मो में घुले- हैं रंजो-ग़म वो
सुनके जिनको नयन सबके नम भी होंगे

सादगी को कौन पूछे है यहाँ अब
गेसुओं में उसके पेचो-खम भी होंगे

है रकीबों का बसेरा गर यहाँ पर
साथ उनके  तो मेरे हमदम भी होंगे

हो गया चिथड़े सभी के साथ वो भी
बाँधे उसने तन पे अपने बम भी होंगे


फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन


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Thursday, December 30, 2010

है नया अन्दाज दिलबर तेरा--गज़ल

2

जिन्दगी से इक दुआ मांगी थी
मौत कब हमने भला मांगी थी

मौत से हमने दया मांगी थी
याने हाकिम से सजा मांगी थी

रूठ क्यों हमसे गई तू हवा
चुलबुली-सी इक अदा मांगी थी

है नया अन्दाज दिलबर तेरा
बेवफाई दी वफा मांगी थी

खिड़कियाँ सब खोल दीं उसने तो
रोशनी कुछ, कुछ हवा मांगी थी

बख्श दी क्यों मौत ही मौला
हमने तो तुमसे दवा मांगी थी

क्यों गिला तुमसे करेंश्याम हम
क्यों घुटन दे दी हवा मांगी थी
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Saturday, December 25, 2010

ख्वाब बेगाने न दे मौला -गज़ल

1
गर खुदा खुद से जुदाई दे
कोई क्यों अपना दिखाई दे

काश मिल जाये कोई अपना
रंजो-गम से जो रिहाई दे

जब न काम आई दुआ ही तो
कोई फिर क्योंकर दवाई दे

ख्वाब बेगाने न दे मौला
नींद तू बेशक पराई दे

तू न हातिम या फरिश्ता है
कोई क्यों तुझको भलाई दे

डूबने को हो सफीना जब
क्यों किनारा तब दिखाई दे

आँख को बीनाई दे ऐसी
हर तरफ बस तू दिखाई दे

साथ मेरे तू अकेला हो
अपनी ही बस आश्नाई दे


फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन


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Sunday, December 19, 2010

देख लो तुम मुझे सजा देकर- गज़ल

5 [म.ऋ]
आज कुछ कर गुजरने वाला हूँ
बन के खुशबू बिखरने वाला हूँ

तोड़ दो कसमें, दो भुला वादे
मैं तो खुद भी मुकरने वाला हूँ

टूटकर बिखरा हूं इस तरह यारो
अब कहाँ मैं संवरने वाला हूँ


जिन्दगी कर दे हसरतें पूरी
खुदकुशी अब मैं करने वाला हूँ

देख लो तुम मुझे सजा देकर
मै भला कब सुधरने वाला हूँ


फ़ाइलातुन,मफ़ाइलुन,फ़ेलुन



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Wednesday, December 1, 2010

गुल गुलामी करे है मौसम की- दो शे‘र

सुनते हैं दिल में प्यार रहता है
फ़िर भी दिल बेकरार रहता है
गुल गुलामी करे है मौसम की
मस्त हर वक्त खार रहता है

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Monday, November 29, 2010

एक फुट्कर शेर

सुनते हैं दिल में प्यार रहता है
फ़िर भी दिल बेकरार रहता है
गुल गुलामी करे है मौसम की
मस्त हर वक्त खार रहता है
 




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