खुद से आखिर कितना बोलूं मैं
क्या बस अपना चेह्रा देखूं मैं
अपने भी दिखते हैं बेगाने
दोस्त किसे अपना समझूं मैं
आईनो की तन्हा मह्फ़िल में
खुद में खुद को कब तक ढूंढूं मैं
देख तुझे यह हाल हुआ है
जब भी सोचूं तुझको सोचूं मैं
‘श्याम’सखा गर हो जाये मेरा
निशिदिन रास-रचाऊं, नाचूँ मैं
मेरा एक और ब्लॉग http://katha-kavita.blogspot.com/
क्या बस अपना चेह्रा देखूं मैं
अपने भी दिखते हैं बेगाने
दोस्त किसे अपना समझूं मैं
आईनो की तन्हा मह्फ़िल में
खुद में खुद को कब तक ढूंढूं मैं
देख तुझे यह हाल हुआ है
जब भी सोचूं तुझको सोचूं मैं
‘श्याम’सखा गर हो जाये मेरा
निशिदिन रास-रचाऊं, नाचूँ मैं
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