Wednesday, January 12, 2011

यूँ थिरकती, महकती क्या ये हवा -gazal

6  [म.ऋ]

आस इक भी अगर फली होती
जिन्दगी तू बहुत भली होती

यूँ थिरकती, महकती क्या ये हवा
बगिया माली ने गर छली होती

मांग लेते तुझे सितारों से
उसके आगे अगर चली होती

ढलती आँसू की बूंद मोती में
जो न अच्छी घड़ी टली होती

स्नेह-भर जो हमें मिला होता 


फिर न कोई कमी खली होती

कोसता मैं न अपनी किस्मत को
गर मिली यार की गली होती

 शोख-चंचल मेरी तबियत हैं  
 लेखनी क्यों न  मनचली होती

कौन झुकता यूँ तेरे आगे ‘श्याम’
 उम्र तेरी जो न  ढली होती


फ़ाइलातुन,मफ़ाइलुन,फ़ेलुन


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Monday, January 10, 2011

फ़ुटकर शे‘र- श्याम सखा ‘श्याम’

जो शख्स दर्द की आबो-हवा को जानता है
वही तो आज के दौरे-खुदा को जानता है
है देखलेता है बिना खोले ही जो जख़्मो को
वही हरेक मरज़ की दवा को जानता है

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Tuesday, January 4, 2011

सादगी को कौन पूछे है यहाँ अब-gazal

 3

जिन्दगी है जब मियाँ तो गम भी होंगे
आज ज्यादा हैं तो कल ये कम भी होंगे

इन्तजार अब तो कयामत का हमें है
मौला होगा, तुम भी होंगे, हम भी होंगे

जिन्दगी होगी सुहानें गीत होंगे
आ गई गर मौत तो मातम भी होंगे

मेरे नग्मो में घुले- हैं रंजो-ग़म वो
सुनके जिनको नयन सबके नम भी होंगे

सादगी को कौन पूछे है यहाँ अब
गेसुओं में उसके पेचो-खम भी होंगे

है रकीबों का बसेरा गर यहाँ पर
साथ उनके  तो मेरे हमदम भी होंगे

हो गया चिथड़े सभी के साथ वो भी
बाँधे उसने तन पे अपने बम भी होंगे


फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन


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Thursday, December 30, 2010

है नया अन्दाज दिलबर तेरा--गज़ल

2

जिन्दगी से इक दुआ मांगी थी
मौत कब हमने भला मांगी थी

मौत से हमने दया मांगी थी
याने हाकिम से सजा मांगी थी

रूठ क्यों हमसे गई तू हवा
चुलबुली-सी इक अदा मांगी थी

है नया अन्दाज दिलबर तेरा
बेवफाई दी वफा मांगी थी

खिड़कियाँ सब खोल दीं उसने तो
रोशनी कुछ, कुछ हवा मांगी थी

बख्श दी क्यों मौत ही मौला
हमने तो तुमसे दवा मांगी थी

क्यों गिला तुमसे करेंश्याम हम
क्यों घुटन दे दी हवा मांगी थी
फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन, फ़ेलुन









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Saturday, December 25, 2010

ख्वाब बेगाने न दे मौला -गज़ल

1
गर खुदा खुद से जुदाई दे
कोई क्यों अपना दिखाई दे

काश मिल जाये कोई अपना
रंजो-गम से जो रिहाई दे

जब न काम आई दुआ ही तो
कोई फिर क्योंकर दवाई दे

ख्वाब बेगाने न दे मौला
नींद तू बेशक पराई दे

तू न हातिम या फरिश्ता है
कोई क्यों तुझको भलाई दे

डूबने को हो सफीना जब
क्यों किनारा तब दिखाई दे

आँख को बीनाई दे ऐसी
हर तरफ बस तू दिखाई दे

साथ मेरे तू अकेला हो
अपनी ही बस आश्नाई दे


फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन


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Sunday, December 19, 2010

देख लो तुम मुझे सजा देकर- गज़ल

5 [म.ऋ]
आज कुछ कर गुजरने वाला हूँ
बन के खुशबू बिखरने वाला हूँ

तोड़ दो कसमें, दो भुला वादे
मैं तो खुद भी मुकरने वाला हूँ

टूटकर बिखरा हूं इस तरह यारो
अब कहाँ मैं संवरने वाला हूँ


जिन्दगी कर दे हसरतें पूरी
खुदकुशी अब मैं करने वाला हूँ

देख लो तुम मुझे सजा देकर
मै भला कब सुधरने वाला हूँ


फ़ाइलातुन,मफ़ाइलुन,फ़ेलुन



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Wednesday, December 1, 2010

गुल गुलामी करे है मौसम की- दो शे‘र

सुनते हैं दिल में प्यार रहता है
फ़िर भी दिल बेकरार रहता है
गुल गुलामी करे है मौसम की
मस्त हर वक्त खार रहता है

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Monday, November 29, 2010

एक फुट्कर शेर

सुनते हैं दिल में प्यार रहता है
फ़िर भी दिल बेकरार रहता है
गुल गुलामी करे है मौसम की
मस्त हर वक्त खार रहता है
 




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Tuesday, September 21, 2010

बेवफ़ाई थी उसकी फ़ितरत में - gazal

 जिन्दगी कब है मो‘तबर बाबा
ये तो है आरज़ी सफ़र   बाबा

बेवफ़ाई थी उसकी फ़ितरत में
जान दी हमने  जानकर बाबा

मेरे अश्कों मेरे नालों का
आप पर भी हुआ असर बाबा

जिसके साये में प्यार पलता है
काट देंगे वही शजर  बाबा

खुशियां घटती नहीं हैं बँटने से
दर्द बढ़ता है   फ़ैलकर   बाबा

`श्याम’सच्चा है,सीधा सादा है
इसको आता नहीं हुनर बाबा

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Thursday, September 9, 2010

सबको खूब खला था वो- गज़ल

सबको खूब खला था वो
मानुष एक भला था वो

काटा जितनी बार गया
उतनी बार फला था वो

रीझ गई वृषभानुलली
आखिर नन्दलला था वो

जिसने जैसा ढाला था
वैसा ठीक ढ़्ला था वो

मन्जिल खुद ही आ पहुंची
गिर-गिर कर संभला था वो

सबके गम लेकर भागा
कह्ते सब पगला था वो

याद करे है अब भी ‘श्याम’
यू इक बार मिला था वो

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Thursday, August 26, 2010

दुनिया-भर के ग़म थे/ और अकेले हम थे-gazal


दुनिया-भर के ग़म थे
और अकेले हम थे

साथ न कैसे देते
ग़म भी आखिर ग़म थे

टीस बहुत थी सुर में
बस स्वर ही मद्घम थे

खुशियाँ दूर सदा ही
ग़म  मेरे हमदम थे

सपने भंग हुए क्या
दिल दरहम-बरहम थे

आँखें तो गीली थीं
सूखे मन-मौसम थे

'श्याम’ सँवरते कैसे
सब किस्मत के खम थे

७२ dbg
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Thursday, August 19, 2010

काश मिल जाये कोई अपना -gazal


1
गर खुदा खुद से जुदाई दे
कोई क्यों अपना दिखाई दे

काश मिल जाये कोई अपना
रंजो-गम से जो रिहाई दे

जब न काम आई दुआ ही तो
कोई फिर क्योंकर दवाई दे

ख्वाब बेगाने न दे मौला
नींद तू बेशक पराई दे

तू न हातिम या फरिश्ता है
कोई क्यों तुझको भलाई दे

डूबने को हो सफीना जब
क्यों किनारा तब दिखाई दे

आँख को बीनाई दे ऐसी
हर तरफ बस तू दिखाई दे

साथ मेरे तू अकेला हो
अपनी ही बस आश्नाई दे

फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन फ़ा



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Tuesday, August 10, 2010

मैं गुनहगार न होता तो फरिश्ता होता-गज़ल

ख्वाब हर हाल में है यार भला सा होता
मैं गुनहगार न होता तो फरिश्ता होता

टूटता घर न हमारा यूं कभी भी जानम
दिल में तेरे भी अगर प्यार जरा सा होता

चाँद जैसा है बदन झील सी तेरी आंखें
तुझ पे हर कोई फिदा होता न तो क्या होता

तू चली आती है छत पर जो अकेली जानम
चाँद को ख्वाब सरीखा सा है धोखा होता

जिन्दगी भर है जिसे ख्वाब में पूजा मैने
रूबरू होता अगर वो तो करिश्मा होता

यार इलजाम भला  क्या  तू लगाता मुझपर
झांक कर दिल में कभी अपने  जो देखा होता


क्या बिगड़ते यूं सभी काम तुम्हारे हमदम
बात करने का अगर तुमको सलीका होता

बेवफ़ा‘श्याम’अगर होता नहीं  जो यारो
आठवां फिर तो वो दुनिया  का अजूबा होता


फ़ाइलातुन,फ़इलातुन.फ़इलातुन ,फ़ेलुन


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Sunday, August 1, 2010

चल रहा हूं अकेला दोस्तो= गज़ल

 खुशबुओं का सफर है जिन्दगी
अजनबी सी मगर है जिन्दगी

फ़िक्र तेरी मेरी सभी की है
खुद से पर बेखबर है जिन्दगी

साँस धड़कन ही सिर्फ है नहीं
 है कलेजा जिगर है जिन्दगी

सुर्खियों की ललक ने दी बना
हादसों की खबर है जिन्दगी

 औरतों के नसीब से लगा
बेबसी का नगर है जिन्दगी

चल रहा हूं अकेला दोस्तो
अब कहां हमसफर है जिन्दगी

मौत मन्जिल अगर है”श्याम जी’
साँस की बस डगर है जिन्दगी



फ़ाइलुन,फ़ाइलुन,मफ़ाइलुन
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Saturday, July 17, 2010

सुलझा दिया इक बार तो सौ बार उलझाया हमें-gazal

मिलना है गर तुझको कभी सचमुच ही ग़म से जिन्दगी

तो आके फिर तू मिल अकेले में    यूं  हमसे जिन्दगी




हाँ आज हम इनकार करते हैं तेरी हस्ती से ही
खुद मौत माँगोगे, जियेंगे अपने दम से जिन्दगी




हर बार ही देखा तुझे है दूर से जाते हुए
इक बार तो आजा मेरे आँगन में छम से जिन्दगी



सुलझा दिया इक बार तो सौ बार उलझाया हमें
पाएं हैं ग़म कितने तेरे इस पेचो-खम से जिन्दगी




नाहक नहीं हैं हम इसे सीने से चिपकाये हुए
इस जख्म से सीखा है क्या-क्या पूछ हमसे जिन्दगी


हैं ‘श्याम’ गर मेरा नहीं, तो है पराया भी नहीं
कट जाएगी अपनी तो यारो, इस भरम से जिन्दगी





मुतफ़ाइलुन= चार बार











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Thursday, July 1, 2010

नहीं मिलती यहां पर मौत भी माँगे अगर कोई-गज़ल



   

चलो फूलों की इस बस्ती से  यूँ दो पल चुरा लें हम
कभी भँवरो की भी मस्ती से यूँ  दो  पल चुरा लें हम


नहीं मिलती यहां पर मौत भी माँगे  अगर  कोई
चलो फिर तो जबरद्स्ती से   यूँ दो पल चुरा लें हम

इशारे पर चलें जिसके हमेशा चाँद-तारे भी
भला क्यों आज उस हस्ती से यूँ  दो पल चुरा लें हम

 बहुत महंगी हुईं हैं खिलवतें  अबके बरस यारो
खड़ी इस भीड़ सस्ती यूँ दो पल चुरा लें हम

नहीं किस्मत हमारी ये कि हम पहुंचे किनारों पर
कि लहरों डूबती कश्ती से यूँ   दो पल चुरा लें हम

भला क्या कोई  पूछे है यहाँ ईमानदारी को
क्यों मतलब परस्ती से यूं दो पल चुरा लें हम

लगा हैश्यामतो करने खुराफाते नईं यारो
उसी की इस मटरगश्ती से यूँ दो पल चुरालें हम
मफ़ाईलुन,मफ़ाईलुन,मफ़ाईलुन,मफ़ाईलुन
कुछ दोस्तों को कश्ती व मटरगश्ती काफ़िये अटकेंगे वे इन्हे न पढें


 










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Tuesday, June 22, 2010

एक और इम्तिहान है-गज़ल

है जान तो जहान है
 फ़िर काहे का गुमान है

क्या कर्बला के बाद भी
 एक और इम्तिहान है

इतरा रहे हैं आप यूं
 क्या वक्त मेहरबान है

हैं लूट राहबर रहे
 जनता क्यों बेजुबान है

है ‘श्याम ’बेवफ़ा नहीं
हाँ इतना  इत्मिनान है





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Monday, June 14, 2010

हैं उठ रहीं मेरे मन में खराब-सी बातें-gazal


हैं उठ रहीं मेरे मन में खराब-सी बातें
थीं करनी तुमसे मुझे बेहिसाब-सी बातें

हो तुम  भी, हम भी हैं जब साफगो, उठीं फिर क्यों
हमारे बीच बताओ नकाब-सी बातें

बगैर जाम के मदहोश कर दिया उसने
रहा वो करता ही हर पल शराब-सी बातें

इलाही तुम ही हो क्या रूबरू मेरे ये कहो
हकीकतो में भी होती हैं ख्वाब-सी बातें

खुदा का जिक्र ही होता है कब जहाँ में अब
यहाँ तो होती हैं बस अब अजाब-सी बातें

समझनाश्यामको आसां नहीं कभी यारो
करे है वो तो सदा बस किताब-सी बातें

मफ़ाइलुन. फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन

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Friday, June 11, 2010

फ़ुटकर शे‘र-१२- श्याम सखा ‘श्याम‘

जिन्दगी भर जिन्दगी खेल दिखाती है रही
जीतकर भी हारना मुझको सिखाती है रही


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Friday, June 4, 2010

मर गया मैं तो कौन पूछेगा-gazal

चुप रहूँगा तो अनकही होगी
गर कहूँगा तो दिल्लगी होगी

आया होगा बुझाने को तब कौन
आग पानी में जब लगी होगी

सो रहा दिन है तानकर चादर
रात तो सारी शब जगी होगी

मर गया मैं तो कौन पूछेगा
जिन्दगी मिस्ले-खुदकुशी होगी

बम गिरेंगे कभी जो धरती पर
शोर के बाद खामुशी होगी

मौत पीछा करेगी निश्चय ही
साथ गर तेरे जि़न्दगी होगी

दिल रकीबों के जल गए होंगे
तुझसे जब भी नजर लड़ी होगी

प्यास जब जाएगी गुजर हद से
होगा सागर न फिर नदी होगी

जब भी देखेंगे 'श्याम’ की मैयत
दुश्मनों को बहुत खुशी होगी




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